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दफ्तरों में बढ़ सकता है कामकाज का समय! केंद्र सरकार ने बनाया 9 घंटे ड्यूटी का नियम, पर न्यूनतम वेतन पर साध ली चुप्पी!

ड्राफ्ट रुल्स के मुताबिक कामकाज के घंटे बढ़ाकर 9 घंटे करने पर विचार किया जा रहा है। हालांकि इसे लेकर अस्पष्टता भी है क्योंकि ड्राफ्ट में कहा गया है कि मासिक तौर पर प्रतिदिन कामकाज के 8 घंटों की 26 दिनों के आधार पर गणना की जाएगी।

working hourसरकार बढ़ा सकती है कामकाज के घंटे।

केन्द्र सरकार दफ्तरों में कामकाज का समय बढ़ाकर 9 घंटे कर सकती है। दरअसल सरकार ने ड्राफ्ट वेज कोड रूल्स (Drasft Wage Code Rules) पेश किया है, जिसमें दफ्तरों में कामकाज का समय 8 घंटे से बढ़ाकर 9 घंटे करने का प्रस्ताव रखा है। हालांकि सरकार ने न्यूनतम वेतन पर चुप्पी साधी हुई है और ड्राफ्ट में इसका जिक्र नहीं किया है। इस ड्राफ्ट में अधिकतर पुराने नियम ही रखे गए हैं और भौगोलिक आधार पर वेतन को भविष्य में तीन भागों में बांटने की बात कही है।

ड्राफ्ट रुल्स के मुताबिक कामकाज के घंटे बढ़ाकर 9 घंटे करने पर विचार किया जा रहा है। हालांकि इसे लेकर अस्पष्टता भी है क्योंकि ड्राफ्ट में कहा गया है कि मासिक तौर पर प्रतिदिन कामकाज के 8 घंटों की 26 दिनों के आधार पर गणना की जाएगी। वहीं न्यूनतम वेतन पर सरकार की तरफ से ‘लेबर कोड ऑन वेजेज’ की तरह ही ‘ड्राफ्ट रूल ऑन वेजेज’ में भी चुप्पी साधी गई है। ड्राफ्ट में कहा गया है कि विशेषज्ञों की कमेटी भविष्य में इस पर अपने विचार सरकार को देगी।

इस साल जनवरी में एक आंतरिक पैनल ने केन्द्रीय श्रम मंत्रालय को भेजी अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि भारत में राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन 375 रुपए प्रतिदिन होना चाहिए। इस तरह मासिक तौर पर यह वेतन 9,750 रुपए होगा। पैनल ने अपनी रिपोर्ट में 1430 रुपए का हाउसिंग अलाउंस भी देने का प्रस्ताव दिया था।

ड्राफ्ट में कहा गया है कि जब न्यूनतम वेतन पर कोई फैसला लिया जाएगा, तब देश को तीन भौगोलिक कैटेगरी में बांटा जाएगा। जिनमें मेट्रोपॉलिटिन एरिया, जिसकी जनसंख्या 40 लाख या ज्यादा, नॉन-मेट्रोपोलिटिन, जिसकी जनसंख्या 10-40 लाख और ग्रामीण इलाके शामिल होंगे। वहीं घर का किराया न्यूनतम वेतन के 10% के बराबर तय होगा। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि कैटेगरी के हिसाब से इसमें कोई बदलाव होगा या नहीं।

ड्राफ्ट में फ्यूल, बिजली और अन्य खर्चों को न्यूनतम वेतन के 20% माना गया है। साथ ही न्यूनतम वेतन तय करते वक्त प्रतिदिन 2700 कैलोरी, सालाना 66 मीटर कपड़ों के खर्च को भी शामिल किया जाएगा। बता दें कि साल 1957 में जब पहली बार न्यूनतम वेतन तय किया गया था, तब भी यह मापदंड ध्यान में रखे गए थे।

सेंटर फॉर इंडियन ट्रेड यूनियन के उपाध्यक्ष एके पद्मनाभन का कहना है कि “कुछ फैक्ट्रियां पहले से ही कर्मचारियों से 9 घंटे काम ले रही हैं। क्या इस वेज कोड रुल से इसे संस्थागत किया जा रहा है? हम इसका विरोध करेंगे क्योंकि इसमें कर्मचारियों के कल्याण की बात नहीं की गई है।” आरएसएस से संबद्ध भारतीय मजदूर संघ से जुड़े लोगों का भी कहना है कि इस वेज कोड रुल में नए इंडिया का विजन गायब है और हम इसका विरोध करेंगे। मजदूर संघ के लोगों का कहना है कि काम के घंटे 8 की बजाय 6 घंटे प्रतिदिन किए जाने चाहिए।

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