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व्यक्तित्व: शकील अहमद- शीर्ष वैज्ञानिकों की सूची में बना ली जगह

अहमद ने देश के सुदूरवर्ती इलाके में स्थानीय लोगों को पढ़ाने के लिए कई बड़े आॅफर ठुकरा दिए। वे पुंछ जिले के मेंढर के सरकारी डिग्री कॉलेज में केमिस्ट्री पढ़ाते हैं। वह अपने परिवार की पहली पीढ़ी के शिक्षित शख्स हैं। अहमद का कहना है कि वह अपने समुदाय को कुछ वापस देना चाहते हैं। वे कहते हैं, 'मैं अच्छी शिक्षा के लिए संघर्ष के बारे में जानता हूं। जब मेरे पिता का निधन हुआ तब मैं मुश्किल से एक साल का था। मैं केवल स्कॉलरशिप की मदद से ही अपनी पढ़ाई पूरा कर पाने में सक्षम था। मैं राजौरी में पला बढ़ा, जहां सीमित साधन थे।

जम्मू कश्मीर के रहने वाले डॉ. शकील अहमद भारत के उन दो हजार 313 वैज्ञानिकों में शुमार हैं, जिन्हें स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी ने शीर्ष वैज्ञानिक चुना हैं। मशहूर स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी ने दुनिया भर के शीर्ष दो फीसद वैज्ञानिकों की सूची जारी की है, जिनमें पहली बार इतनी बड़ी संख्या में भारतीयों के नाम शामिल किए गए हैं। इन वैज्ञानिकों में डॉ. शकील की खास तौर पर चर्चा की जा रही है। क्या है उनमें खास?

अहमद ने देश के सुदूरवर्ती इलाके में स्थानीय लोगों को पढ़ाने के लिए कई बड़े आॅफर ठुकरा दिए। वे पुंछ जिले के मेंढर के सरकारी डिग्री कॉलेज में केमिस्ट्री पढ़ाते हैं। वह अपने परिवार की पहली पीढ़ी के शिक्षित शख्स हैं। अहमद का कहना है कि वह अपने समुदाय को कुछ वापस देना चाहते हैं। वे कहते हैं, ‘मैं अच्छी शिक्षा के लिए संघर्ष के बारे में जानता हूं। जब मेरे पिता का निधन हुआ तब मैं मुश्किल से एक साल का था। मैं केवल स्कॉलरशिप की मदद से ही अपनी पढ़ाई पूरा कर पाने में सक्षम था। मैं राजौरी में पला बढ़ा, जहां सीमित साधन थे।

अहमद साल 2017 में आइआइटी दिल्ली में थे, जब उन्हें अपने गृह जिले में पढ़ाने का आॅफर मिला था। उन्होंने कहा कि मैं यही करना चाहता था कि अपने घर वापस जाऊं और छात्रों को उच्च सिक्षा में विज्ञान पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करूं। अहमद के प्रयासों के परिणाम भी दिखाई दे रहे हैं। तीन साल पहले कुछ ही छात्र थे, जो केमिस्ट्री में विशेषज्ञ थे। आज उनके पास केमिस्ट्री के छात्रों का बड़ा बैच है। खास बात यह है कि इनमें 50 फीसद लड़कियां हैं।

अहमद जब कॉलेज में नहीं पढ़ा रहे होते हैं तो ज्यादातर समय अपने शोध का काम करते हैं। फिलहाल, वह पॉलिमर्स विकसित करने पर काम कर रहे हैं। अपने शोध के कामों के लिए अहमद को सुसज्जित प्रयोगशालाओं की जरूरत पड़ती है, जिसके लिए उन्हें दिल्ली जाना पड़ता है। वह आधिकारिक छुट्टियों पर इसके लिए जामिया मिल्लिया इस्लामिया में जाते हैं।

अहमद ने कहा कि ऐसी प्रयोगशालाएं बनाने के लिए करोड़ों की लागत आती है। इतना फंड नहीं है। उन्होंने बताया कि जामिया से पीएचडी और आइआइटी दिल्ली से शोध करने की वजह से उन्हें दोनों ही संस्थानों की प्रयोगशालाओं में जाने की अनुमति है। अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में अहमद के तीस से ज्यादा शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। वैज्ञानिक बिरादरी में वह एक स्थापित नाम बन चुके हैं। वह अमेरिका के केमिकल सोसाइटी और रॉयल सोसाइटी आॅफ केमिस्ट्री के भी सदस्य हैं। उनका कहना है कि उन्होंने पालिमर्स, नैनो मैटीरियल और ग्रीन मैटीरियल के क्षेत्र में पंद्रह किताबें लिखी हैं।

अहमद के अलावा जम्मू-कश्मीर के दो डॉक्टरों को भी उनके शोध के लिए विश्व के प्रमुख वैज्ञानिकों में जगह मिली है। शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेस के पूर्व निदेशक डॉ. एमएस खुरू और इंटरनल-पुलमोनरी मेडिसीन विभाग के डॉ. परवेज ए कौल को भी स्टेनफोर्ड की सूची में जगह मिली है। डॉ. एमएस खुरू को हेपाटाइटिस-ई में उनके शोध के लिए विश्व भर में जाना जाता है।

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