डॉ. बी.आर. आंबेडकर के पोते और वंचित बहुजन अघाड़ी के अध्यक्ष प्रकाश आंबेडकर ने रविवार को दिल्ली में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई की आलोचना की। उन्होंने कहा कि जब सरकार में बैठे लोगों से जवाबदेही की मांग करने वाले शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को बलपूर्वक बेरहमी से दबा दिया जाता है, तो यह तानाशाही का संकेत देता है।

प्रकाश आंबेडकर ने शिक्षाविद और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से दिल्ली के अस्पताल ले जाने के तरीके पर भी कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि विरोध स्थल पर छात्रों पर पुलिस द्वारा किया गया लाठीचार्ज और भी भयावह था।

इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए आंबेडकर ने कहा कि हाल की घटनाएं असहमति को दबाने की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाती हैं।

उन्होंने कहा कि चाहे वह NEET पेपर लीक मामले में जवाबदेही की मांग को लेकर सोनम वांगचुक की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल हो, मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में केन-बेतवा लिंक परियोजना के कारण बेदखली के खिलाफ गोंड और कोल आदिवासियों का 15 दिवसीय विरोध प्रदर्शन हो, उचित पुनर्वास, पर्याप्त मुआवजे और अपने भूमि अधिकारों की सुरक्षा की मांग करने वाले लोगों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई हो या आवाज उठाने वाले छात्रों के खिलाफ बल का प्रयोग हो, ये सभी घटनाएं तानाशाही की ओर झुकाव, असहमति की आवाजों को दबाने, विरोध को कुचलने और गंभीर सवालों को नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति को दर्शाती हैं।

प्रकाश आंबेडकर ने 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में बाबासाहेब आंबेडकर के अंतिम भाषण का जिक्र करते हुए कहा कि उनके दादा ने इस बात पर जोर दिया था कि सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन प्राप्त करने के लिए लोकतंत्र संवैधानिक तरीकों पर निर्भर करता है।

उन्होंने कहा कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि लोकतंत्र में सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन लाने के लिए संवैधानिक तरीकों की आवश्यकता होती है। उन्होंने इन तरीकों को छोड़कर गैर-संवैधानिक साधनों का सहारा लेने के खिलाफ आगाह किया था। साथ ही यह भी स्पष्ट किया था कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को नागरिकों की आवाजों और शिकायतों के प्रति उत्तरदायी बने रहना चाहिए।

प्रकाश आंबेडकर कहा कि उनके दादाजी ने भी इस बात पर जोर दिया था कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के बिना राजनीतिक लोकतंत्र कायम नहीं रह सकता। बाबासाहेब के एक चिरस्थायी सिद्धांत का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की असली परीक्षा इस बात से नहीं होती कि वह सहमति को कैसे स्वीकारता है, बल्कि इस बात से होती है कि वह असहमति पर कैसी प्रतिक्रिया देता है।

पिछली सरकारों से तुलना करते हुए आंबेडकर ने तर्क दिया कि असहमति को दबाना लंबे समय में कभी कारगर साबित नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे पता चलता है कि असहमति को दबाने की रणनीति सत्ता में बैठे लोगों के लिए लंबे समय में कारगर साबित नहीं हुई है। कांग्रेस सरकार के समय भी ऐसा ही हुआ था। और अब भाजपा सरकार ने भी विपक्ष की आवाजों को सीमित कर दिया है और ब्रिटिश शासन की तरह असहमति को कुचल दिया है।

संसद मार्च, लाठीचार्ज और नड्डा से मुलाकात: CJP से बातचीत को सरकार क्यों हुई तैयार?

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने करीब तीन सप्ताह तक जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन और आमरण अनशन किया। इसके बाद केंद्र सरकार ने सोमवार को इस मामले में बातचीत की पहल की। सीजेपी के प्रतिनिधियों ने केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा ने मुलाकात कर एक पत्र सौंपा और अपनी प्रमुख मांगें उन्हें बताई। पढ़ें पूरी खबर।