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क्‍या चीन जमीन कब्जा कर लेगा तभी जागेगा भारत?

अरुणाचल प्रदेश स्थित ताकसिंग गांव तिब्बत सीमा के करीब स्थिति है। इस गांव तक भारतीय सैनिकों को जमीनी रास्ते से पहुंचने में तीन दिन लगेंगे।

चीन अरुणाचल प्रदेश के कुछ इलाकों पर दावा जताता रहा है। (चीनी सेना की फाइल फोटो)

चीन के साथ 1962 में हुए युद्ध में भारत की हार की एक बड़ी वजह ये मानी जाती है कि हमारे सैनिकों के पास जरूरी हथियार और अन्य सामग्रियां नहीं थीं। शून्य से नीचे तापमान वाले बर्फीले इलाके में साधारण जूते पहनकर लड़ते हुए शहीद हुए भारतीय सैनिकों की कहानियां सभी ने सुनी है। पिछले महीने से दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव बढ़ गया है। चीनी मीडिया बार-बार भारत को 1962 के युद्ध का सबक याद रखने की धमकी दे रहा है।  तो क्या भारत चीन के संग युद्ध के लिए तैयार है? भारत में रहने वाले फ्रांसीसी मूल के पत्रकार क्लॉड अर्पी की मानें तो भारत चीन से लगने वाली सीमा की सुरक्षा को लेकर बहुत ज्यादा लापरवाह है। क्लॉड ने एक लेख लिखकर भारत को आगाह करते हुए पूछा है कि “क्या भारत तब तक नहीं जागेगा जब तक चीन उसके कुछ इलाकों पर कब्जा नहीं कर लेता?”

क्लॉड तिब्बत विशेषज्ञ हैं। उन्होंने चीन, भारत, भूटान, तिब्बत इत्यादि के हिमालयी इलाकों की गहन छानबीन की है। क्लॉड की मानें तो चीन से लगे वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) रेखा के करीबी इलाकों तक भारतीय सेना के पहुंचने के लिए जरूरी सड़कें और रेल मार्ग नहीं हैं। डोकलाम में भारत और चीन के बीच ताजा विवाद भी सड़क निर्माण को लेकर ही शुरू हुआ है। चीन भूटान के डोकलाम में ऐसी सड़क बनाना चाहता है जिससे भारी सैन्य वाहन भी आ-जा सके। भारत ने इसका विरोध किया है जिसकी वजह से दोनों देशों के बीच गतिरोध बना हुआ है। चीन ने पिछले कुछ सालों में भारत से लगे इलाकों में सड़क और रेल मार्ग का जाल बिछा लिया है। क्लॉड लिखते हैं, “चीन का रवैया पहला कब्जा करो फिर उस पर बातचीत करो का रहा है।” चीन डोकलाम में भी यही करना चाह रहा है।

क्लॉड अरुणचल प्रदेश के एक गांव ताकसिंग का उदाहरण देते हैं। अरुणाचल प्रदेश और तिब्बत की सीमा पर स्थिति ये गांव भारत का आखिरी गांव है। चीन कई बार अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत का हिस्सा बताकर उस पर दावा जता चुका है। क्लॉड के अनुसार अगर चीन अरुणचाल प्रदेश में हमला करता है तो वो सबसे पहले इसी गांव पर कब्जा करेगा। तो क्या ऐसी स्थिति में भारत इस गांव को बचा पाएगा? इस इलाके में चीनी सैनिक नजर भी आ चुके हैं। स्थानीय ग्रामीणों ने गांव में घुसने वाले चीनी सैनिकों का वीडियो भी बना लिया था। क्लॉड के अनुसार अरुणाचल में तिब्बत सीमा के सबसे निकट स्थित भारतीय सैन्य चौकी से ताकसिंग तक पहुंचने में तीन दिन पैदल यात्रा करनी होगी। स्थानीय पिट्ठू ये दूरी दो दिन में तय कर लेते हैं। भारतीय सेना के लिए राहत की बात बस इतनी है कि इस इलाके में आपातकाल के लिए एक हेलीपैड बना हुआ है।

ऐसा नहीं है कि भारत सरकार अपनी इस कमजोरी से वाकिफ नहीं है।  1957 में नेफा के कैप्टन एलआर सैलो ने सीमावर्ती गांव लाइमकिंग का दौरा करके एक रिपोर्ट तैयार की थी और इस इलाके में संपर्क मार्ग की जरूरत पर जोर दिया था। लेकिन बीते पांच दशकों में इस दिशा में उम्मीद के अनुरूप प्रगति नहीं हुई है। चीन के संग ताजा विवाद शुरू होने के बाद 18 जुलाई को केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि भारत-चीन सीमा पर कुल 73 सड़कें बनाने की योजना है। गृह राज्य मंत्री किरेन रीजीजू ने लोक सभा में बताा कि इनमें से 46 सड़कें रक्षा मंत्रालय बनवा रहा है और 27 सड़कें गृह मंत्रालय। मंत्री ने बताया कि अभी तक 30 सड़कों का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है, जबकि सभी सड़कों को साल 2012-13 तक पूरा कर लिया जाना था।

केंद्र सरकार खराब मौसम, पहाड़ी इलाके में निर्माण सामग्री को पहुंचाने में आने वाली दिक्कत, प्राकृतिक आपदा, जमीन अधिग्रहण और वन और वन्यजीव विभागों से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने को सड़क निर्माण में देरी की वजह बताती रही है। क्लॉड अपने लेख में संदेह जताते हैं कि “ताकसिंग तक सड़क बनने में कम से कम पांच साल लगेंगे। लेकिन पांच साल ही लगें तो भी इसे गनीमत समझना चाहिए। और ऐसा नहीं है कि इसका कोई हल नहीं है।”

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