डीएमआरसी सुप्रीम कोर्ट मेट्रो स्टेशन का नाम ‘सर्वोच न्यायालय’ में बदलने के पक्ष में नहीं है। दिल्ली मेट्रो रेल निगम (DMRC) ने मंगलवार को दिल्ली हाई कोर्ट को बताया कि वह ‘सुप्रीम कोर्ट’ मेट्रो स्टेशन के हिंदी साइनबोर्ड को देवनागरी लिपि में ‘सर्वोच न्यायालय’ में बदलने के पक्ष में नहीं है, क्योंकि इससे सरकारी खजाने पर वित्तीय बोझ पड़ेगा।

दिल्ली मेट्रो रेल निगम के वकील ने मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ के समक्ष प्रस्तुत किया कि इस तरह के बदलाव में 40-45 लाख रुपये का खर्च आएगा। उन्होंने बताया कि स्टेशन पर लगे साइनबोर्ड के अलावा, रोड मैप, मोबाइल एप्लिकेशन में भी कई अन्य बदलाव करने होंगे।

एक स्टेशन का नाम बदलने में 40-45 लाख रुपये का खर्च

वकील ने कहा, “यह एक वित्तीय बोझ है। एक स्टेशन पर इस तरह के एक बदलाव में 40-45 लाख रुपये का खर्च आएगा। यह एक सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है।” डीएमआरसी के वकील ने आगे कहा कि एक स्टेशन का नाम बदलने से इसका दूर तक असर पड़ सकता है, जिसके चलते अन्य मेट्रो स्टेशनों के लिए भी इसी तरह के मुकदमे हो सकते हैं।

‘सुप्रीम कोर्ट’ मेट्रो स्टेशन का हिंदी नाम ‘सर्वोच न्यायालय’ किया जाए

अदालत ने जवाब दिया कि कई मुकदमों की आशंका याचिका का विरोध करने का आधार नहीं हो सकती और डीएमआरसी को अपना हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत उमेश शर्मा द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें हिंदी साइनबोर्ड के लिए मेट्रो स्टेशन का नाम ‘सर्वोच न्यायालय’ के बजाय ‘सुप्रीम कोर्ट’ रखने पर आपत्ति जताई गई थी।

अपने दावे के समर्थन में याचिकाकर्ता ने बताया था कि ‘केंद्रीय सचिवालय’ मेट्रो स्टेशन को हिंदी में ‘केंद्रीय सचिवालय’ कहा जाता है। याचिकाकर्ता ने पहले यह भी कहा था कि राजभाषा अधिनियम और उसके नियमों के अनुसार, केंद्र सरकार के कार्यालयों में सभी नियमावली, साइनबोर्ड और नामपट्टियाँ अंग्रेजी और हिंदी में होनी चाहिए और हिंदी का प्रयोग देवनागरी लिपि में ही होना चाहिए। याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर उसका हिंदी नाम ‘भारत का सर्वोच न्यायालय’ है। मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में होगी।

शक्तियों और अधिकार का घोर दुरुपयोग: सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने भाई-भतीजावाद और खुदगर्जी को लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अभिशाप बताते हुए हरियाणा सरकार की एक आवासीय समिति द्वारा शासी निकाय के एक सदस्य और उनके अधीनस्थ को दो फ्लैटों का आवंटन रद्द कर दिया है। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें

(इनपुट- पीटीआई)