कर्नाटक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डी के शिवकुमार को देश के ‘सबसे रईस मुख्यमंत्री’ बनने के लिए तैयार हैं। डीकेएस के नाम से लोकप्रिय कांग्रेस नेता ने साल 2023 में विधानसभा चुनाव में हलफनामा दायर किया था। शिवकुमार और उनके डिपेंडेन्ट्स की कुल नेट वर्थ 1,413.78 करोड़ रुपये है। खास बात है कि साल 2018 के चुनावों में उनकी नेट वर्थ 840.08 करोड़ रुपये थी। वहीं डी के शिवकुमार के भाई और पूर्व सांसद डी के सुरेश ने 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में अपने हलफनामे में 593 करोड़ रुपये की कुल संपत्ति होने की जानकारी दी थी।
शिवकुमार के राजनीतिक विरोधियों, जिनमें जेडी(एस) नेता और केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी भी शामिल हैं। कर्नाटक के इन नेताओं ने बार-बार उनकी संपत्ति के स्रोतों पर सवाल उठाए हैं। सालों से उन पर पद के दुरुपयोग और ज्ञात आय के स्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित करने के कई आरोप लगते रहे हैं। हालांकि, उनके खिलाफ दर्ज कई मामलों को बंद कर दिया गया है या अदालतों द्वारा खारिज कर दिया गया है लेकिन कुछ मामले अभी भी न्यायालयों में लंबित हैं।
लेकिन डीके शिवकुमार पर अभी भी कई मामले दर्ज हैं और लंबित हैं…
2017 का आयकर (आई-टी) मामला
शिवकुमार के खिलाफ लंबित मामलों में सबसे महत्वपूर्ण मामलों में से एक 2017 में की गई आयकर (आई-टी) विभाग की छापेमारी से जुड़ा है। इन छापों के दौरान अधिकारियों ने अलग-अलग जगहों से 8.59 करोड़ रुपये बरामद किए थे। यह कार्रवाई उस समय हुई थी जब शिवकुमार, राज्यसभा चुनावों के दौरान गुजरात के कांग्रेस विधायकों को कथित ‘तोड़फोड़’ (पोचिंग) से बचाने के लिए अपने संरक्षण में रखे हुए थे। इसके चलते विपक्ष ने राजनीतिक प्रतिशोध और निशाना बनाए जाने के आरोप लगाए थे।
अदालत में दाखिल दस्तावेजों में आयकर विभाग ने आरोप लगाया कि शिवकुमार ने दिल्ली और बेंगलुरु में व्यक्तियों और परिसरों का एक व्यापक नेटवर्क स्थापित किया था जिसका इस्तेमाल बेहिसाब नकदी के परिवहन और इस्तेमाल के लिए किया जाता था।
इसके बाद विभाग द्वारा बेंगलुरु की आर्थिक अपराधों से संबंधित विशेष अदालत में आरोपपत्र (चार्जशीट) दाखिल किए जाने पर,प्र वर्तन निदेशालय (ईडी) ने उनके खिलाफ धनशोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) का मामला दर्ज किया। इसी मामले में ईडी ने 2019 में शिवकुमार को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद उन्होंने तिहाड़ जेल में 50 दिन बिताए जिसके बाद उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया।
उसी साल कर्नाटक में तत्कालीन भाजपा सरकार ने सीबीआई को एक बड़ी अनुमति दी। सरकार ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत शिवकुमार के ज्ञात आय स्रोतों से अधिक संपत्ति (आय से अधिक संपत्ति) रखने के आरोपों की जांच करने की अनुमति सीबआई को दी थी।
वर्ष 2023 में कांग्रेस के दोबारा सत्ता में आने के बाद, सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने सीबीआई को दी गई यह सहमति वापस ले ली और मामले को कर्नाटक लोकायुक्त को सौंप दिया।
इसके बाद कर्नाटक हाई कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा सहमति वापस लेने के फैसले को चुनौती देने वाली सीबीआई की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने एजेंसी को सुप्रीम कोर्ट का रुख करने का निर्देश दिया। इसके बाद सीबीआई ने 2024 में सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले से जुड़े प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की धनशोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) संबंधी कार्यवाही को निरस्त (खारिज) कर दिया।
भूमि अधिसूचना-निरस्तीकरण (Land Denotification) मामला
एक अन्य मामला जो शिवकुमार का पीछा करता रह सकता है- वह बेन्निगनहल्ली (Benniganahalli) भूमि अधिसूचना-निरस्तीकरण मामला है। उन पर आरोप है कि उन्होंने कर्नाटक भूमि सुधार अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए अधिसूचित भूमि के 4.2 एकड़ हिस्से की खरीद की थी।
इस मामले में भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदिरुप्पा का नाम भी शामिल किया गया था। आरोप था कि उन्होंने इस भूमि की अधिसूचना (नोटिफिकेशन) रद्द की थी। उनके खिलाफ भी कर्नाटक लोकायुक्त ने चार्जशीट दायर की थी।
साल 2015 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस मामले की कार्यवाही को रद्द (क्वैश) कर दिया था। इसके बाद शिकायतकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया लेकिन बाद में उन्होंने अपनी याचिकाएं वापस ले लीं।
हालांकि, भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता एस. आर. हीरेमठ ने इसी साल सर्वोच्च न्यायालय में एक विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition – SLP) दायर कर इस मामले को फिर से शुरू करने की मांग की है।
अन्य मामले
शिवकुमार पर कई और आरोप भी लग चुके हैं। साल 2014 में सिद्धारमैया की कैबिनेट में एंट्री से पहले हीरेमठ के संगठन ‘समाज परिवर्तन समुदाय’ ने राज्यपाल और प्रधानमंत्री कार्यालय के समक्ष एक याचिका दी जिसमें डीकेएस के खिलाफ कई शिकायतों को हाइलाइट किया गया था।
इन आरोपों में यह भी शामिल था कि शिवकुमार ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए राज्य सरकार के स्वामित्व वाली कंपनी मैसूर मिनरल्स लिमिटेड से रियायती दरों पर लौह अयस्क लिया और उसे खुले बाजार में अधिक कीमत पर बेच दिया। इस कथित अनियमितता से सरकारी खजाने को लगभग 300 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया था।
कांग्रेस नेता शिवकुमार को उनके समर्थक ‘कनकपुरदा बंडे’ (कनकपुरा की चट्टान) कहकर बुलाते हैं। यह उपाधि उनके निर्वाचन क्षेत्र तथा वोक्कालिगा बहुल इलाके में उनके मजबूत राजनीतिक प्रभाव को दर्शाने के लिए प्रयोग की जाती है।
हालांकि, उनके आलोचक इसी उपनाम का इस्तेमाल कनकपुरा और सथनूर क्षेत्रों में कथित अवैध खनन (क्वारींग) से जुड़े आरोपों की ओर संकेत करने के लिए करते रहे हैं। साल 2012 में तत्कालीन वन मंत्री सी. पी. योगेश्वर ने वन क्षेत्रों में अवैध खनन की जांच के लिए एक स्पेशल सेल गठित करने की घोषणा की थी।
इसके अतिरिक्त, शिवकुमार और उनके भाई पर उनके राजनीतिक विरोधियों द्वारा धमकाने, दबाव बनाने तथा राजनीतिक प्रभाव का दुरुपयोग करने के आरोप भी लगाए गए हैं। हालांकि, उन्होंने इन सभी आरोपों का लगातार खंडन किया है।
शपथ ग्रहण से पहले बोलीं डीके शिवकुमार की टीचर
कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में डीके शिवकुमार बुधवार को शपथ लेने वाले हैं। इससे पहले उनकी स्कूल टीचर पार्वती ने उनके बचपन को याद किया और उन्हें शरारती बच्चा बताया। साथ ही बताया कि वे पढ़ाई में औसत दर्ज के थे लेकिन नेता वाले सभी गुण उनमें मौजूद थे।
