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दिव्यांगों को सशक्त बनाने संबंधी विधेयक पास

दिव्यांगों से भेदभाव किए जाने पर दो साल तक की कैद और अधिकतम पांच लाख रुपए के जुर्माने का प्रावधान है।
Author नई दिल्ली | December 15, 2016 04:14 am
एक दिव्यांग शख्स अपनी ट्राईसाइकल पर जाते हुए। (Source: Express Photo by Sahil Walia)

दिव्यांगों से जुड़े विधेयक- नि:शक्त व्यक्ति अधिकार विधेयक 2014 (राइट्स आॅफ पर्सन दि डिसएबिलिटी बिल- आरपीडीबी) को राज्यसभा ने बुधवार को सर्वसम्मति से पारित कर दिया। इसमें दिव्यांगों से भेदभाव किए जाने पर दो साल तक की कैद और अधिकतम पांच लाख रुपए के जुर्माने का प्रावधान है। यह विधेयक फरवरी 2014 से लंबित पड़ा था। दिव्यांगों के अधिकारों को लेकर संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र पर भारत ने 2007 में दस्तखत किए थे। इस विधेयक को अगले दो दिनों में लोकसभा में पारित करा लिए जाने की उम्मीद केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने जताई है। उधर, इस मुद्दे को उठाने वाले सामाजिक संगठनों ने दिव्यांगों के लिए राष्ट्रीय आयोग और राज्य आयोग के गठन के प्रस्ताव को खारिज किए जाने पर चिंता जताई है।

इस विधेयक के तहत दिव्यांगों की श्रेणियों को सात से बढ़ा कर 22 कर दिया गया है। इन 22 श्रेणियों में तेजाब हमले के पीड़ितों, पर्किंसन, हीमोफीलिया, थेलेसीमिया, आॅटिजम, मानसिक विकार, सेरेब्रल पाल्सी, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, क्रोनिक न्यूरोलॉजिकल जैसी समस्याओं से पीड़ितों को भी शामिल किया गया है। विधेयक ने नि:शक्तजन मामलों के मुख्य आयुक्त और राज्य आयुक्तों को भी अधिक अधिकार दिए हैं, जो नियामक इकाई के रूप में काम करेंगे। केंद्र सरकार दिव्यांगता की नई श्रेणी सूची में जोड़ सकती है। दिव्यांग श्रेणी के लिए नौकरियों में चार फीसद आरक्षण का प्रावधान किया गया है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत के प्रस्ताव पर सदन ने संक्षिप्त चर्चा के बाद इस विधेयक को आमराय से पास कर दिया। सरकार के 120 संशोधनों को मंजूरी दी गई। विधेयक पर विभिन्न सदस्यों के स्पष्टीकरण के जवाब में गहलोत ने बताया कि इसमें नि:शक्तजनों से भेदभाव करने की स्थिति में छह महीने से लेकर दो साल तक की कैद और 10 हजार रुपए से लेकर पांच लाख रुपए तक के जुर्माने की सजा का प्रावधान है।

माकपा के सीताराम येचुरी और बसपा के सतीश मिश्र ने पूछा कि शारीरिक या मानसिक नि:शक्तता में श्रेणियां कौन सा प्राधिकरण परिभाषित करेगा। गहलोत ने जवाब दिया कि एक मेडिकल बोर्ड परिभाषित करेगा। कांग्रेस से विप्लव ठाकुर ने 18 साल से कम उम्र के नि:शक्त व्यक्तियों को पेंशन नहीं दिए जाने का मुद्दा उठाया। कांग्रेस के आनंद भास्कर रापोलू ने कहा कि बड़ी संख्या में संशोधनों के चलते एक समग्र विधेयक पर काम किए जाने की जरूरत है। कांग्रेस के मधुसूदन मिस्त्री के एक सवाल पर गहलोत ने कहा कि विधेयक में वही परिभाषा रखी गई हैं जिसका उल्लेख संयुक्त राष्ट्र संधि में किया गया है। गहलोत के अनुसार सरकार केरल में दिव्यांग विश्वविद्यालय बना रही है और यह अगले साल से शुरू हो जाएगा। विधेयक के कानून बनने के बाद निशक्जनों से संबंधित सभी समस्याओं का समाधान होने की उम्मीद है। 2014 में नि:शक्त जनों के लिए करीब 15,500 रिक्तियां थीं। जिनमें से 12,500 से ज्यादा रिक्तियों को भर दिया है।

चर्चा के दौरान कांग्रेस के कर्ण सिंह ने कहा कि नि:शक्तजनों के अधिकारों के बारे में लोगों को संवेदनशील बनाने के लिए एक सार्वजनिक शिक्षा अभियान भी चलाया जाना चाहिए। सपा के नरेश अग्रवाल ने कहा कि नि:शक्तता प्रमाणपत्र हासिल करने की प्रक्रिया को सरल बनाया जाना चाहिए। उन्होंने आरक्षण बढ़ाए जाने की भी मांग की। तृणमूल कांग्रेस के मोहम्मद नदीमुल हक ने कहा कि आरक्षण के तहत निर्धारित पदों में से कोई रिक्ति न रहे। माकपा के सीपी नारायणन ने कहा कि विधयेक में किए गए संशोधन नि:शक्त जनों के अधिकारों को कम करते हैं। इन्हें दुरुस्त करना चाहिए। बीजद के नरेंद्र कुमार स्वैन व बसपा के सतीश मिश्र ने भी विधेयक का समर्थन किया। मिश्र ने कहा कि मायावती सरकार ने लखनऊ में शकुंतला मिश्रा विश्वविद्यालय बनवाया था। जिसमें विशिष्ट रूप से सक्षम लोगों के लिए 50 फीसद आरक्षण की व्यवस्था की थी। सामाजिक संगठनों ने विधेयक का स्वागत किया है। इसमें संशोधन के लिए अभियान चला रही संस्था नेशनल प्लेटफॉर्म फॉर द राइट्स आॅफ डिस्एबल्ड (एनपीआरडी) के सचिव मुरलीधरन ने कहा कि उन लोगों ने कई सुझाव दिए थे, जिन्हें संशोधन में शामिल किया गया है। भेदभाव, प्रतिष्ठान और दिव्यांगों के बीच संवाद के तौर तरीकों का प्रावधान विधेयक में बाद में शामिल किया गया। महिलाओं और बच्चों के मामले में अलग से प्रावधान किए गए हैं। दिव्यांग कर्मचारियों की पदोन्नति का प्रावधान भी रखा गया है। मुरलीधरन और आॅल इंडिया डिसएबिलिटी एलायंस के एसके रुंगटा के अनुसार मूल विधेयक में पांच फीसद आरक्षण का प्रस्ताव था। चार फीसद का प्रावधन किया गया है। इन लोगों ने दिव्यांगों के लिए राष्ट्रीय आयोग और राज्य आयोग के गठन के प्रस्ताव को खारिज किए जाने पर चिंता जताई है। उधर, डिसेबल्ड राइट्स ग्रुप (डीआरजी) के समन्वयक जावेद आबिदी ने कहा, ‘नया नि:शक्त जन विधेयक आमूलचूल परिवर्तन वाला होगा और भारत में करोड़ों दिव्यांगों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डालेगा। स्वयं फाउंडेशन के संस्थापक ए जिंदल ने कहा, ‘विधेयक में कई तरह की विकलांगताओं पर विचार किया गया है जो पहले शामिल नहीं थीं।’

 

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