नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने सोमवार (6 अप्रैल,2026) को नवादा का दौरा किया। वे झारखंड से लौटते समय पूर्व राज्य मंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के नेता राजबल्लभ प्रसाद यादव के पथरा इंग्लिश स्थित आवास पर पहुंचे। यहां उन्होंने राजबल्लभ और जनता दल यूनाइटेड से विधायक विभा देवी के बेटे अखिलेश कुमार के असामयिक निधन पर शोक संतप्त परिवार से मुलाकात कर संवेदना व्यक्त की।
अब इस मुकालत का राजनीतिक विश्लेषण शुरू हो गया है। आरजेडी के कद्दावर नेता और लालू यादव के पुराने सहयोगी शिवानंद तिवारी ने मुलाकत पर टिप्पणी की है। उन्होंने अपनी फेसबुक पोस्ट में इस मुलाकात का जिक्र करते हुए एक कहानी बताई है कि कैसे राजबल्लभ जैसे पार्टी के पुराने नेताओं के सुझाव को दरकिनार करके पार्टी सुप्रीमो लालू यादव द्वारा साल 2003 में अप्रैल में की गई तेल पिलावन लाठी घुमावन रैली उनके राजनीतिक अपकर्ष का कारण बनी।
अपनी पोस्ट में उन्होंने रैली और उसके बाद राजबल्लभ से मुलाकात का जिक्र किया है। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि कैसे रैली को लेकर राजबल्लभ की बातों को लालू यादव ने खारिज दिया था। पोस्ट के अनुसार जब शिवानंद ने उन्हें पिछड़ी जातियों के नाराज होने की बात कही थी तो उन्होंने कहा था – “ठीक हुआ, ये लोग बहुत फड़फड़ा रहे थे।”
शिवानंद के अनुसार लालू यादव की गिरावट की वहीं से शुरुआत हुई। उनके मुताबिक – मंडल कमीशन की वजह से अपर कास्ट लालू यादव के विरुद्ध था ही। कुर्मी और कोईरी जैसी मध्य जातियां यादव के साथ कभी नहीं रहीं और अति पिछड़ों को तो खुद लाठी से भगा दिया गया जो आज तक लालू यादव के साथ नहीं आ पायीं।

दरअसल, साल 2003 में 30 अप्रैल को आरजेडी प्रमुख लालू यादव ने राजधानी पटना में तेल पिलावन लाठी घुमावन रैली का आयोजन किया था। राज्य की मुख्यमंत्री तब उनकी पत्नी राबड़ी देवी थीं। इस रैली का मुख्य उद्देश्य राज्य में साल 2005 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के जनाधार को दिखाना था। इस रैली को लेकर काफी राजनीतिक विवाद हुआ था।
हालांकि, तब आजेडी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन इस रैली का परिणाम साल 2005 और उसके बाद से सभी विधानसभा चुनावों में देखने को मिला। 2005 में पार्टी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। साल 2000 के चुनाव में पार्टी को 124 सीटें मिली थीं, लेकिन राजनीतिक जोड़-घटाओ करके पार्टी सत्ता में आने में कामयाब रही थी। राबड़ी देवी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।
आरजेडी के जनाधार पर असर
हालांकि, 2005 के चुनाव में 215 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली राजद केवल 75 सीटें ही ला पाई। यह संख्या बहुमत के आंकड़े से बहुत दूर थी। जबकि, जदयू ने 138 सीटों पर चुनाव लड़कर 55 सीटें जीतीं और भाजपा 103 में से 37 सीटें लेकर आई। वहीं, बिहार में एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस भी इन चुनावों में 84 में से 10 सीटें ही जीत पाई थी। इन चुनावों में 122 सीटों का स्पष्ट बहुमत ना मिल पाने के कारण कोई भी सरकार नहीं बन पाई और कुछ महीनों के राष्ट्रपति शासन के बाद अक्टूबर-नवंबर में फिर से विधानसभा चुनाव हुए।
दूसरे विधानसभा चुनावों में जदयू 88 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। जदयू ने 139 सीटों पर चुनाव लड़ा था। भाजपा ने 102 में से 55 सीटें हासिल की थीं। वहीं, राजद ने 175 सीटों पर चुनाव लड़कर 54 सीटें जीतीं, लोजपा को 203 में से 10 सीटें मिलीं और कांग्रेस 51 में से नौ सीटें ही जीत पाई। साल 2000 में ही लोजपा का गठन हुआ था। इन चुनावों में नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी।
इस चुनाव के बाद राजद के जनाधार में लगातार कमी आई और वो कभी स्वतंत्र रूप से सत्ता में नहीं आ पाई। पार्टी को लोग मुस्लिम और यादवों की पार्टी के तौर पर देखने लगे। साल 2020 के विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन सरकार बनाने का सपना अधूरा रह गया। जबकि, साल 2025 के विधानसभा चुनाव में तो पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। पार्टी को केवल 25 सीटें ही मिलीं।
चुनाव का विश्लेषण करने वालों यह निष्कर्ष निकाला कि 2025 बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की हार के प्रमुख कारणों में यादवों को अत्यधिक टिकट (52 सीटों पर) देना, 10 लाख नौकरियों के वादे को व्यावहारिक न मानना, लालू यादव के टिकट वितरण में हस्तक्षेप से आंतरिक असंतोष, भ्रष्टाचार के आरोप, और एनडीए का मजबूत ‘वोट बैंक’ समीकरण शामिल रहे।
अब पार्टी एक बार फिर से आने वाले चुनाव के लिए तैयारी में जुटी नजर आ रही है। तेजस्वी का राजबल्लभ के घर जाने को इसी दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। हालांकि, शिवानंद की पोस्ट ने इसे थोड़ा जटिल बना दिया है। इस संबंध में बात करते हुए बिहार के वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी ने कहा, “तेजस्वी का राजबल्लभ यादव के घर जाना कहीं से भी गलत नहीं है। राजनीति में मतभेद होते ही हैं, लेकिन इसे दुश्मनी मानना सही नहीं है। वो उनके बेटे के निधन पर शोक व्यक्त करने और सांत्वना देने गए थे। इस पर चर्चा इसलिए हो रही क्योंकि राजवल्लभ की पत्नी विभा देवी जेडीयू से विधायक हैं।”
भेलारी कहते हैं, “शिवानंद तिवारी साफगोई से अपनी बातों को रखते हैं। लेकिन मैं उनकी बातों से सहमत नहीं हूं। रैली की वजह से पार्टी का घाटा होने की बात से मैं सहमत नहीं हूं। लालू यादव में जनता से जुड़ने का एक अलग ही हुनर था। यह रैली उन्होंने अपने जनाधार को संघटित करने की नियत से किया था।”
उन्होंने कहा, “लालू यादव केवल मुस्लिम और यादव के नेता नहीं है। उन्हें गरीबों का भी मसीहा कहा जाता है। आम जनता उन्हें अपना नेता मानती हैं। उन्होंने दबे-कुचलों को जो आवाज दिलाई वो कोई और नहीं कर पाया। दूसरे नेताओं ने भले ही और काम किए, विकास किया, लेकिन वो लालू यादव जैसी भूमिका नहीं निभा पाए।”
वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण बागी ने इस संबंध में कहा, “शिवानंद तिवारी पुराने समाजवादी नेता हैं। बिहार की सक्रिय राजनीति में शामिल कई नेताओं से वो वरिष्ठ हैं। चाहे वो नीतीश कुमार हों, या लालू यादव। दो टूक बातें करना उनकी खासीयत है। यह उनके चरित्र की विशेषता है। इस बार भी उन्होंने ठीक ही कहा है।”
प्रवीण कहते हैं, “लालू यादव के पतन के जो कारण रहे हैं, उनमें एक कारण यह भी है। लालू के साथ रहते हुए भी तिवारी अपनी बातें कहने से नहीं हिचकते थे। राजद प्रमुख भी उनका सम्मान करते थे और उनकी कही बातों को ध्यान में रखकर रणनीति बनाते थे। लेकिन कई बार वो अपनी बातों पर अडिग रहते थे, जिससे विवाद भी हुआ और फिर पार्टी फेरबदल हुई।”
उन्होंने कहा, “इनदिनों राजनीतिक गुरु की भूमिका निभा रहे तिवारी ने सत्य कहा है। लाठी घुमावन रैली जो हुई थी, उसमें आतंक का माहौल था। पटना में सारी दुकानें बंद हो गई थीं, जरूरी काम के सिलसिले में ही लोग बाहर निकल रहे थे। पूरी राजधानी पर लाठीधारियों का कब्जा हो गया था। लोग डरे-सहमे थे। यह सब लालू यादव के खिलाफ गया। और ऐसी कई रैलियां हुईं। अक्सर राजद की रैलियों में अप्रिय घटनाएं हो जाती थीं। इससे पार्टी की छवी को नुकसान हुआ।”
उन्होंने कहा, “आज भी दूसरी पार्टियां चुनाव में राजद के खिलाफ इन मुद्दों को भुनाती हैं। जनता के जहन में जंगलराज की बात ला देती हैं। ऐसे में राजद के सामने यह बड़ी चुनौती है कि वो अपनी इस छवी से बाहर कैसे आएगी।”
