मध्य प्रदेश के दतिया में बीजेपी का प्रदर्शन कमजोर रहना बड़ा झटका माना जा रहा है। खास बात यह है कि जिन मतदान केंद्रों का संबंध भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा और पार्टी के जिला पदाधिकारियों से था, वहां भी पार्टी को उम्मीद के मुताबिक समर्थन नहीं मिला। यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इन नेताओं ने सालों तक दतिया में भाजपा के संगठन को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई थी।

कांग्रेस के 72 साल के अनुभवी उम्मीदवार और दतिया के पुराने शाही परिवार के सदस्य घनश्याम सिंह 6016 वोटों से जीत गए। उन्होंने बीजेपी के भरोसेमंद संगठनकर्ता और आरएसएस के अनुभवी नेता आशुतोष तिवारी को हराया।

मिश्रा को टिकट ना देना पार्टी के लिए मुश्किल साबित हुआ

बीजेपी के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने कहा कि जब पार्टी ने मिश्रा को टिकट देने से इनकार कर दिया और पहली बार चुनाव लड़ रहे तिवारी को मैदान में उतारा, तो यह इस बात की स्वीकारोक्ति थी कि 2023 के विधानसभा चुनाव ने पहले ही संकेत दे दिया था कि दतिया में पूर्व गृह मंत्री का राजनीतिक दबदबा अब जीत की गारंटी देने के लिए पर्याप्त नहीं था। लेकिन मिश्रा को टिकट न देना और उनके साये से मुक्त होकर चुनाव प्रचार करना मुश्किल साबित हुआ और पार्टी की हार का एक अहम कारण बना।

चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले ही अशांति फैलनी शुरू हो गई। तिवारी की उम्मीदवारी की घोषणा होते ही, मिश्रा के समर्थकों ने निर्वाचन क्षेत्र में सड़कें जाम कर दीं, पुलिस से झड़प की और पार्टी पदों से इस्तीफे की घोषणा कर दी। इस तरह आंतरिक मतभेद मतदान से कुछ दिन पहले ही सार्वजनिक तमाशा बन गया। भाजपा की मुख्य समस्या पहले से ही स्पष्ट थी, उसे एक ऐसे उम्मीदवार के लिए चुनाव प्रचार करना था, जिसकी अपनी उम्मीदवारी मिश्रा के समर्थकों के सार्वजनिक शोक प्रदर्शन के कारण धूमिल हो रही थी।

हम परिणामों का अध्ययन करेंगे- हेमंत खंडेलवाल

भारतीय जनता पार्टी की हार पर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने कहा, “हम परिणामों का अध्ययन करेंगे। इन निष्कर्षों के आधार पर पार्टी अपनी रणनीति तय करेगी।” उन्होंने चेतावनी दी कि पार्टी अनुशासन का पालन न करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करेगी।

मिश्रा ने आखिरकार पार्टी के लिए प्रचार किया, तिवारी की ओर से घर-घर जाकर वोट मांगे और मतगणना शुरू होते ही भाजपा की जीत की भविष्यवाणी की। बीजेपी नेताओं का कहना था कि तिवारी को उन वोटरों तक पहुंचने के लिए मिश्रा के नेटवर्क की जरूरत थी, जो पिछले दो दशकों से राजनीतिक फैसलों के लिए उन्हीं पर निर्भर थे। इस निर्भरता का मतलब यह था कि उम्मीदवार कभी भी खुद को उस नेता से अलग नहीं दिखा सकते थे, जिन्हें पार्टी ने हाल ही में हटा दिया था।

मिश्रा के समर्थकों को टिकट ना मिलना अपमान जैसा लगा

भारतीय जनता पार्टी के एक नेता ने कहा, “जो मतदाता चाहते थे कि भाजपा मिश्रा युग से आगे बढ़े, उनके लिए वोट न देने का यही पर्याप्त कारण था। मिश्रा के वफादार समर्थकों के लिए, जिन्हें टिकट न मिलना व्यक्तिगत अपमान जैसा लगा, तिवारी की उम्मीदवारी कभी भी मतपत्र पर उनके अपने नेता के नाम का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकती थी।”

कांग्रेस पार्टी ने सिद्धार्थ कुशवाहा को दिया जीत का श्रेय

राज्य कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा कि इस जीत का श्रेय कांग्रेस के सतना विधायक सिद्धार्थ कुशवाहा को जाना चाहिए, जो ओबीसी से उभरते हुए नेता हैं।

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, कुशवाहा ने दतिया में पार्टी के चुनाव प्रचार का पूरा समन्वय किया। विधायक ने बताया कि उन्होंने कई हफ्तों तक निर्वाचन क्षेत्र में डेरा डाला और एक छोटी टीम का नेतृत्व किया, जिसने बूथ-दर-बूथ काम करके कुशवाहा के वोटों को एकजुट किया। यह चुनाव क्षेत्र के लिए निर्णायक साबित हुए। इस जीत के साथ, कुशवाहा कांग्रेस में एक उभरते सितारे के रूप में सामने आए हैं। उन पर पार्टी अन्य क्षेत्रों में ओबीसी वोटों को एकजुट करने के लिए भरोसा करेगी।

कांग्रेस ने बीजेपी की हार के लिए क्या कारण बताया?

कुशवाहा ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि नरोत्तम मिश्रा के कार्यकाल में किए गए आचरण के खिलाफ असंतोष भाजपा की हार का प्रमुख कारण था। उन्होंने कहा, “सबसे बड़ा कारण नरोत्तम मिश्रा की दादागिरी थी। भाजपा सरकार ने लोगों को डराने-धमकाने के लिए अपने तंत्र का इस्तेमाल किया और भ्रष्टाचार भी खूब फैला हुआ था। लोग इससे तंग आ चुके थे।” उन्होंने निर्वाचन क्षेत्र से काम की तलाश में दूसरे राज्यों में लगातार हो रहे पलायन और मंदिर नगर के रूप में निर्वाचन क्षेत्र की पहचान का भी जिक्र किया।

यह चुनाव कांग्रेस के उस चुनावी अभियान के बीच हुआ जो खुद भी उथल-पुथल से अछूता नहीं था। मतगणना से एक दिन पहले ही, पूर्व विधायक राजेंद्र भारती को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। उन पर उम्मीदवार के खिलाफ काम करने का आरोप था। सिंह ने चुनाव प्रचार के दौरान आरोप लगाया था कि भारती का खेमा उन्हें कमजोर करने की कोशिश कर रहा है, हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के प्रयास से केवल कुछ ही वोट प्रभावित होंगे।

घनश्याम सिंह की जीत किसी लहर पर नहीं, बल्कि उन तीन फायदों पर टिकी थी जिन्होंने उन्हें बीजेपी के लिए एक मुश्किल प्रतिद्वंद्वी बना दिया था। सबसे पहली बात, वह कोई नया चेहरा नहीं थे। 72 साल की उम्र में घनश्याम सिंह इस इलाके के सबसे जाने-माने नेताओं में से एक हैं। पुराने शाही परिवार से ताल्लुक रखने वाले सिंह ने दो बार (1993 और 2003 में) दतिया और बाद में सेवढ़ा का प्रतिनिधित्व किया है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “तिवारी के उलट, जो अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ रहे थे, सिंह को किसी परिचय की जरूरत नहीं थी। उनके पास दशकों पुराने निजी नेटवर्क थे जो कांग्रेस संगठन से भी आगे तक फैले हुए थे।”

कांग्रेस के तंत्र पर निर्भर नहीं थे घनश्याम सिंह

पार्टी में आंतरिक विद्रोह के बावजूद घनश्याम सिंह पूरी तरह से कांग्रेस तंत्र पर निर्भर नहीं थे। नेता ने कहा, “उनकी व्यक्तिगत साख, शाही वंश और दतिया में उनके लंबे समय से चले आ रहे संबंधों के कारण वे कांग्रेस के कट्टर मतदाताओं के अलावा भी समर्थन जुटा सकते थे। इससे पार्टी के भीतर गुटबाजी से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिली।”

घनश्याम सिंह ने स्थानीय स्तर पर चुनाव प्रचार किया। राज्य सरकार पर जनमत संग्रह कराने के बजाय, कांग्रेस ने पलायन, बेरोजगारी, फर्टिलाइजर की कमी, अनियमित वर्षा और स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क के प्रति असंतोष पर ध्यान केंद्रित किया। ऐसा प्रतीत होता है कि यह संदेश ग्रामीण क्षेत्रों में प्रभावी रहा, जहां मतदान लगभग 78% रहा, जबकि शहरी दतिया में यह लगभग 62% था।

आशुतोष तिवारी ने हार के बाद क्या कहा?

हार स्वीकार करते हुए आशुतोष तिवारी ने संयमित स्वर में कहा, “मैं जनता के समक्ष नतमस्तक होता हूं। हम इस हार पर विचार करेंगे। मैं सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बना रहूंगा।” जीतू पटवारी ने इस नतीजे को तिवारी की व्यक्तिगत हार के बजाय राज्य सरकार पर एक करारा प्रहार बताया। पटवारी ने कहा, “मैं दतिया के लोगों को धन्यवाद देना चाहता हूं, जिन्होंने मध्य प्रदेश सरकार का असली चेहरा अहंकार और भ्रष्टाचार बेनकाब कर दिया। मैं उन्हें बधाई देना चाहता हूं। हम उनके ऋणी रहेंगे। उन्होंने बदलाव की नींव रखी है।”

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पार्टी के समर्थन में आई गिरावट से इनकार करते हुए पत्रकारों से कहा कि भाजपा को वास्तव में पिछले चुनाव की तुलना में अधिक वोट मिले हैं। उन्होंने कहा, “हम आने वाले चुनावों में और भी अधिक मजबूती से लड़ेंगे और जीतेंगे।”

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