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लोक मान्यता: राम कथा और स्त्री विमर्श के यक्ष प्रश्न

तुलसीकृत और वाल्मीकि के रामायण की कथा राम के लंका विजय के पश्चात समाप्त हो जाती है। उत्तर रामायण इन्होंने नहीं लिखी। उत्तर रामायण को संस्कृत के महान लेखक भवभूति ने अपने नाटक में रचा है।

आस्था, लोककथारामायण में महिला, ब्राह्मण और सत्य के प्रति सम्मान की भी व्याख्या की गई है।

राम और रामायण भारतीय सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन मूल्यों के वाहक है। हर घर में रामायण होती है। उसका पाठ नैतिक कर्म भी है। उसमें लिखित विसंगतियों की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। रामायण में सुनखा अर्थात सुंदर नैन-नक्श वाली स्त्री, जिसे शूर्पनखा कहा गया, वह वन में लक्ष्मण जैसे सुंदर युवकों को देख आकर्षित होती है और प्रेम निवेदन करती है। पर लक्ष्मण उसके नाक कान काट देता है। राम उसका विरोध नहीं करते। क्या स्त्री का प्रेम निवेदन अपराध है, जिसकी सजा उसे दी गई। सुनखा रावण की बहन थी। स्वाभाविक था भाई उसका प्रतिकार लेगा।

रावण सीता का अपहरण कर लेता है पर सीता को कभी कोई हानि नहीं पहुंचाता। दस माह वह अशोक वाटिका में मर्यादित और शांतिपूर्वक रहती हैं। उत्तर भारत में रावण को राक्षस कहा गया। दशहरे में रावण का पुतला फूंका जाता है। उसे असत्य पर सत्य की जीत, पाप पर पुण्य की विजय कहा जाता है। यह भी कि रावण तो शस्त्र-शास्त्रों का ज्ञाता, चारों दिशाओं और वेद-निगम-आगम का ज्ञानी था। उसकी लंका सोने की थी अर्थात उसके राज्य में धन-धान्य और वैभव था। फिर भी राम के साथ उसने युद्ध किया। अंत तक। अपने भाइयों और बेटों की बलि देकर भी समर्पण नहीं किया।

यह अहंकार क्यों? एक राजा का स्वाभिमान भी तो हो सकता है। पर नहीं, ऐसा सोचा ही नहीं गया। उपनिषद में एक वर्णन आता है कि राम युद्ध के दसवें दिन अपनी विजय के लिए यज्ञ करना चाहते हैं पर वहां पत्नी और ब्राह्मण के बिना यह यज्ञ कैसे हो, हनुमान संदेश लेकर जाता है। रावण स्वयं सीता को लेकर वहां आते हैं। रावण ब्राह्मण था। उसके पिता विश्वश्रवा थे। वे यज्ञ संपूर्ण करते हैं। राम को विजयीभव का आशीर्वाद देकर सीता को लेकर लौट जाते हैं। ये भी वर्णन रावण के बारे में ही है। सीता लगभग दस महीने रावण की अशोक वाटिका में रही पर उसके सम्मान पर वहां कभी आंच नहीं आई। ऐसे रावण को दशहरे के दिन सारे उत्तर भारत में अपमानित किया जाता है। यह एकतरफा सोच है।

दक्षिण भारत में ऐसा नहीं है। वहां रावण की ऐसी छवि नहीं है। उत्तर भारत में भी हरियाणा में दशहरे के दिन दोपहर में रावण की पूजा की जाती है। गोबर से दस गोले बनाए जाते हैं। उन्हें रखकर उन पर दूब, दही और दूध चढ़ाया जाता है। ये दस गोले रावण के दस सिर हैं। अर्थात जिसे दस दिशाओं का ज्ञान था। ऐसे रावण की पूजा करते हैं कि हमारा भी ज्ञानवर्धन करें। तुलसीकृत और वाल्मीकि के रामायण की कथा राम के लंका विजय के पश्चात समाप्त हो जाती है। उत्तर रामायण इन्होंने नहीं लिखी। उत्तर रामायण को संस्कृत के महान लेखक भवभूति ने अपने नाटक में रचा है।

रामानंद सागर ने ‘उत्तर रामायण’ पर टीवी धारावाहिक बनाया है जिसमें राम प्रजा के एतराज पर सीता को राज्य से निष्कासित कर देते हैं। यह कथा भवभूति ने कही है। सीता वाल्मीकि के आश्रम में आश्रय लेती है। वहीं लव-कुश का जन्म होता है। वाल्मीकि उन्हें शस्त्र-शास्त्र विद्याओं में पारंगत करते हैं। साथ ही रामकथा से भी परिचित करवाते हैं।

राम चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए अश्वमेघ यज्ञ करते हैं और अपना अश्वकीर्ति स्तंभ स्थापित करने के लिए भेजते हैं। सभी राज्य राम की पराधीनता स्वीकार कर लेते हैं। आश्रम में विचरते अश्व को लव-कुश पकड़ लेते हैं। आखिरकार वाल्मीकि के हस्तक्षेप से उसे राम को सौंप देते हैं। लव-कुश प्रश्न उठाते हैं कि राम ने अपनी निर्दोष पत्नी को वनवास क्यों दिया, यह प्रश्न लव-कुश का नहीं आज नारी विमर्श का आधार है। राम यदि न्यायप्रिय थे, मर्यादा पुरुषोत्तम थे तो सिर्फ कुछ लोगों के कहने से अपनी गर्भवती पत्नी को वन में भेज देना क्या न्यायोचित था? क्या यह मर्यादित आचरण था, किसी भी तर्क से नहीं।

उत्तर रामायण की कथा का अंत और भी हृदय विदारक है। लव-कुश उनके पुत्र हैं। राम को पता चलता है तो वे इसे सिद्ध करने के लिए सीता की शुचिता का प्रमाण मांगने के लिए सीता को दरबार में बुलाते हैं। सीता को अपनी पवित्रता की शपथ लेने के लिए कहते हैं। आहत सीता पृथ्वी में समा जाती है। ऐसा क्यों, यह सवाल आज भी स्त्री अस्मिता और संघर्ष का बड़ा सवाल है। दरअसल, यह सब पितृ सत्तात्मक समाज का रचा हुआ आादर्श है, जिस पर सवाल उठना लाजिम है। यहां एक अहम विचारणीय पक्ष यह भी है कि हमने कभी अपने पौराणिक ग्रंथों को स्त्रीवादी दृष्टि से देखा ही नहीं। न ही अपने आदर्श पुरुषों को स्त्रीवादी दृष्टि से जाना, न समझा।

उनकी महानता में स्त्रियों का कभी कोई स्थान रहा ही नहीं। हमारी सामाजिकता अनुकरण और अनुसरण की है। फिर चाहे धार्मिक चरित्र हो या समाज की विद्रूप विसंगत मान्यताएं हों। 21वीं शताब्दी तक आते आते समाज में बहुत से परिवर्तन आए हैं। महिलाओं ने अपनी राह बनाई है। अपना वर्चस्व हर क्षेत्र में स्थापित किया है। पर पितृसत्तात्मक समाज में घरों के भीतर की दुनिया अभी भी ज्यादा नहीं बदली है। फिल्म, मीडिया और टेलीविजन अभी भी एक सदी पीछे ही अटके हुए हैं।

इवान इलिच जो क्रांतिकारी विचारक था, उसने मानसिक जड़ता के विरुद्ध वैचारिक विद्रोह किया था- चाहे शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो या समाज में लिंगभेद की नीतियां और आचरण हो। चाहें भाषा ही क्यों न हो। हम भाषा में भी पुलिंग का प्रयोग करते हैं। स्त्रीलिंग को मुख्य संरचना का कर्ता या क्रिया नहीं मानते हैं। इसलिए लिंग भेद हमारी भाषा का ही नहीं, हमारे जीवन का भी हिस्सा बन गया है। जब तक इस मानसिकता से मुक्तिनहीं मिलती तब तक समाज में स्त्री कभी समता और समानता का अधिकार नहीं पा सकती। यही हमारे समाज में स्त्री का सच है।

राम कथा और कृष्ण कथा को पूर्वग्रह-रहित तर्क और विचार से नहीं समझा गया। ये भगवान जनजीवन में रचे-बसे हैं। आमजन इनके साथ रहता है, खाता-पीता है, सोता है, त्योहार-उत्सव मनाता है। इन्हें भूख लगती है तो छप्पन भोग बनते हैं। इस सोच में परिवर्तन आना मुश्किल है। यह एक सामूहिक बोध है। पर इन सबके बावजूद महिलाओं ने अपनी शिनाख्त के लिए जो संघर्ष किए हैं, वे आज इन पुराने आग्रहों पर भारी पड़ रहे हैं। समय अगर सबसे बड़ा सच है तो इस सच के साथ आने वाला बदलाव महिला हित के साथ तार्किक तौर पर खड़ा है।

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