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नोटबंदी के बाद सिर्फ पांच दिनों में सहकारी बैंकों में जमा हुए 9 हजार करोड़ रुपए, टॉप में रहा यह राज्य

नोटबंदी के फैसले के बाद देश के जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (DCCBs) में सिर्फ पांच दिनों के अंदर 9,000 करोड़ की रकम जम हो गई थी।

पुराने नोट जिनके बंद होने का ऐलान 8 नवंबर को किया गया था।

नोटबंदी के फैसले के बाद देश के जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (DCCBs) में सिर्फ पांच दिनों के अंदर 9,000 करोड़ की रकम जम हो गई थी। यह पैसा देश के अलग-अलग 17 राज्यों की ब्रांचों में हुआ। ये पैसा 10 से 15 नवंबर के बीच जमा हुआ था। यानी नोटबंदी का फैसला 9 नवंबर को लागू होने के अगले पांच दिनों में यह सब हुआ। यह हैरानी की बात इसलिए है क्योंकि नोटबंदी के पहले तक DCCB की सभी ब्रांच नुकसान में जा रही थीं। हालांकि, DCCB का उठाया जा रहा फायदा ज्यादा दिन तक नहीं चल पाया क्योंकि जैसे ही यह बात रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नोटिस में आई उन्होंने सभी DCCB के किसी भी खाते में पुराने नोट जमा करवाने पर रोक लगा दी। एक्सपर्ट का मानना है कि सिर्फ पांच दिन में ही यह साफ हो गया कि DCCB के ज्यादातर खातों का इस्तेमाल कालेधन को सफेद करने के लिए हुआ।

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक, NABARD के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर के जी कर्माकर ने बताया कि पिछले कई सालों से DCCB के खातों का प्रयोग राजनीतिक पार्टियों द्वारा किया जाता रहा है। कर्माकर के मुताबिक, पार्टियां किसानों के नाम पर अकाउंट खोलती हैं और उसे काले पैसे को सफेद करने के लिए इस्तेमाल करती हैं। कुछ अधिकारियों ने केरल का जिक्र खास तौर पर किया। क्योंकि केरल में खेती नाम मात्र को ही रह गई है लेकिन वहां की DCCB की ब्रांचों में 1,800 करोड़ रुपया जमा हुआ। वह भी उन्हीं पांच दिनों के अंदर। कुछ ऐसा ही पंजाब में हुआ। वहां 20 से ज्यादा DCCB के खातों में पांच दिनों के अंदर 1268 करोड़ रुपए के पुराने नोट जमा हुए। महाराष्ट्र DCCB खातों में जमा रकम के मामले में तीसरे नंबर पर रहा। वहां 10 से 14 के बीच 1128 करोड़ रुपए जमा हो गए। महाराष्ट्र के किसानों की हालत तो ऐसी है कि वे लोन ना चुका पाने की वजह से खुद कीटनाशक खाकर जान देने को मजबूर हैं। ऐसे में साफ होता है कि DCCB खातों का उपयोग राजनीतिक पार्टियों और बड़े लोगों द्वारा किया जा रहा था।

कर्माकर ने DCCB के खातों में जमा को रोकने के कदम को ठीक बताया और कहा कि यह सबसे अच्छा कदम था जो कि आरबीआई उठा सकती थी।

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