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हरदिल अजीज कलाम

सत्ता का मर्म और सर्वोच्च पद की समझ किसी में भी हो सकती है पर उसके लिए ईमानदार आचरण के उदाहरण कम ही देखने को मिलेंगे। इस लिहाज से एपीजे अब्दुल कलाम का जीवन एक प्रेरक उदाहरण है।

Author Updated: December 9, 2020 1:05 AM
Presidentपूर्व राष्‍ट्रपति एपीजे अब्‍दुल कलाम । फइल फोटो।

पूरी दुनिया में सत्ता के लोकतांत्रिक गठन ने यह पाठ भी पढ़ाया है कि सत्ता कभी भी धन का पर्याय नहीं हो सकती है। यह समर्पण का नाम है और दायित्व इसका शृंगार है। इस लिहाज से ‘मिसाइल मैन’ की पहचान से लेकर ‘भारत रत्न’ के सम्मान तक पहुंचे डॉ एपीजे अब्दुल कलाम का जीवन और आचरण एक मिसाल है। उनका जीवन, उनका ज्ञान सब कुछ केवल देश के लिए था। वैज्ञानिक और शिक्षक के तौर पर उन्होंने देश को भी दिया और देश की भावी पीढ़ी को भी। देश के लिए कुछ सार्थक करने की उनकी यह शपथ राष्ट्रपति बनने से पहले और बाद एक जैसी बनी रही।

2007 में राष्ट्रपति पद से सेवानिवृत्त होने के बाद बिना रूके वे विद्यार्थियों और युवाओं के बीच व्याख्यान देते रहे। यदि यहां अमेरिका के राष्ट्रपति या ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की चर्चा करें तो कमाई का एक तथ्य सामने मुखर हो जाता है। पर कलाम साहब की चर्चा करें तो उन्होंने न तो राष्ट्रपति के रूप में वेतन लिया और न ही देश को देने में कोई कसर छोड़ी। बल्कि आखिरी समय में भी वे आइआइएम शिलांग में व्याख्यान दे रहे थे।

सत्ता का मर्म और सर्वोच्च पद की समझ किसी में भी हो सकती है पर उसके लिए ईमानदार आचरण के उदाहरण कम ही देखने को मिलेंगे। इस लिहाज से एपीजे अब्दुल कलाम का जीवन एक प्रेरक उदाहरण है। वैसे इस लिहाज से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम भी लिया जा सकता है, जिन्होंने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष, आरबीआइ के गवर्नर और प्रोफेसर, अथर्शास्त्री तक कई रूपों में अपनी सेवा और योग्यता से एक संयमित और मर्यादित आचरण की मिसाल रखी। खबर तो यहां तक आई कि एक बार सूचना के अधिकार के तहत यह तक पूछा गया कि क्या एक पूर्व प्रधानमंत्री विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य कर सकता है।

इस उदाहरण से यह लगता है कि यदि देने के लिए सर्वोच्च पदधारकों के पास कुछ अलग से है तो पद से विदा होने के बाद भी वे इस आतुरता से पीछे नहीं हटते। गौरतलब है कि मनमोहन सिंह ने पंजाब विश्वविद्यालय को 35 सौ किताबें भेंट की हैं।

कोई शख्सियत संवैधानिक पद पर हो या फिर किसी स्वायत्त संस्था के सर्वोच्च पद पर या फिर बड़ा नौकरशाह हो, यह लीक अब देश में नए सिरे से गाढ़ी होने लगी है कि जीवन में उपार्जन से ज्यादा जरूरी है आखिरी दम तक देश-समाज के लिए काम करना, अपने को सार्थक बनाए रखना। अच्छी बात यह कि प्रेरणा के ऐसे सुलेख लिखने वालों में आजादी के बाद की पीढ़ी के कई लोग हैं।

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