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एनजेएसी पर बोले जेटली, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में संवैधानिक ढांचे की अनदेखी

एनजेएसी को निरस्त किए जाने पर कड़ी टिप्पणी करते हुए अरुण जेटली ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र में ‘‘ऐसे लोगों की निरंकुशता नहीं चल सकती..

Author नई दिल्ली | October 18, 2015 11:13 PM
वित्त मंत्री अरुण जेटली (पीटीआई फोटो)

राष्ट्रीय न्यायिक जवाबदेही आयोग (एनजेएसी) कानून को उच्चतम न्यायालय द्वारा निरस्त किए जाने पर कड़ी टिप्पणी करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने रविवार को कहा कि भारतीय लोकतंत्र में ‘‘ऐसे लोगों की निरंकुशता नहीं चल सकती जो चुने नहीं गए हों।’’

जेटली ने यह भी कहा कि न्यायपालिका को मजबूत बनाने के लिए किसी को संसदीय संप्रभुता को कमजोर करने की जरूरत नहीं है। एनजेएसी कानून, 2014 और 99वें संविधान संशोधन को असंवैधानिक करार देकर निरस्त करने वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ की ओर से बताए गए तर्कों को ‘‘त्रुटिपूर्ण तर्क’’ करार देते हुए जेटली ने चेतावनी दी कि यदि ‘‘चुने गए लोगों को कमजोर किया गया’’ तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा।

‘दि एनजेएसी जजमेंट – ऐन आॅल्टरनेटिव व्यू ?’ शीर्षक से फेसबुक पर किए गए एक पोस्ट में जेटली ने कहा, ‘‘भारतीय लोकतंत्र में ऐसे लोगों की निरंकुशता नहीं चल सकती जो चुने हुए नहीं हो और यदि चुने गए लोगों को कमजोर किया गया तो लोकतंत्र खुद ही खतरे में पड़ जाएगा।’’

पूर्व कानून मंत्री जेटली ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संसद की संप्रभुता के बारे में चिंतित होने के नाते उनका मानना है कि दोनों का सह-अस्तित्व हो सकता है और निश्चित तौर पर होना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान का एक अहम मूल ढांचा है। इसे मजबूत करने के लिए किसी को संसदीय संप्रभुता को कमजोर करने की जरूरत नहीं है। संसदीय संप्रभुता भी न सिर्फ एक जरूरी बुनियादी ढांचा है बल्कि लोकतंत्र की आत्मा भी है।’’

राजग सरकार को उस वक्त करारा झटका लगा जब उच्चतम न्यायालय ने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका की बड़ी भूमिका का प्रावधान करने वाले कानून से उच्चतर न्यायपालिका की ‘‘स्वतंत्रता’’ का उल्लंघन होगा।

न्यायाधीशों द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति करने वाली 22 साल पुरानी कोलेजियम प्रणाली की जगह लेने वाली एनजेएसी से जुड़े कानून को उच्चतम न्यायालय ने ‘‘निष्प्रभावी’’ कर दिया। न्यायालय ने कहा कि यह ‘‘शक्तियों के पृथक्करण’’ की संकल्पना और संविधान के ‘‘बुनियादी ढांचे’’ का उल्लंघन है।

इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए मोदी सरकार ने कहा था कि यह ‘‘संसदीय संप्रभुता के लिए झटका’’ है। विधि के क्षेत्र की बड़ी हस्तियों और राजनीतिक पार्टियों ने इस पर मिश्रित प्रतिक्रिया जाहिर की थी।

जेटली ने कहा कि नेताओं पर प्रहार इस फैसले का अहम पहलू है। उन्होंने कहा कि एक न्यायाधीश ने दलील दी कि भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि अब भी देश में आपातकाल जैसे हालात के खतरे बने हुए हैं। भारत में सिविल सोसाइटी मजबूत नहीं है और इसलिए आपको एक स्वतंत्र न्यायपालिका की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि एक और दलील यह है कि यह संभव है कि मौजूदा सरकार समलैंगिक व्यक्तियों को उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त न करे। उन्होंने कहा, ‘‘नेताओं पर प्रहार रात को 9 बजे प्रसारित होने टेलीविजन कार्यक्रमों की तरह है।’’

जेटली ने कहा कि फैसले में तर्क दिया गया है कि आयोग में कानून मंत्री की मौजूदगी और एक समूह, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश के अलावा प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष होंगे, द्वारा आयोग में दो गणमान्य लोगों की नियुक्ति न्यायिक नियुक्तियों में राजनीतिक संलिप्तता को जन्म देगी।

उन्होंने कहा कि फैसले में एक बुनियादी ढांचे – न्यायपालिका की स्वतंत्रता – की प्रधानता को बरकरार रखा गया है लेकिन संविधान के पांच अन्य बुनियादी ढांचों – संसदीय लोकतंत्र, एक निर्वाचित सरकार, मंत्री परिषद, एक निर्वाचित प्रधानमंत्री और निर्वाचित नेता प्रतिपक्ष – को संकुचित कर दिया गया है।

जेटली ने कहा कि पांचों न्यायाधीशों की राय पढ़ने के बाद उनके दिमाग में ‘‘कुछ मुद्दे’’ उभरे हैं। उन्होंने कहा, ‘‘क्या निर्वाचित सरकारों द्वारा नियुक्ति किए जाने के बाद भी चुनाव आयोग और सीएजी जैसी संस्थाएं पर्याप्त विश्वसनीय नहीं हैं?’’

उन्होंने कहा कि बहुमत वाली राय के पीछे प्रमुख तर्क यह लगता है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान के बुनियादी ढांचे का एक आवश्यक तत्व है। उन्होंने कहा, ‘‘निश्चित तौर पर यह मान्यता बिल्कुल सही है। लेकिन यह राय जाहिर करने पर बहुमत एक त्रुटिपूर्ण तर्क दे देता है।’’

जेटली ने कहा, ‘‘फैसले ने इस तथ्य की अनदेखी कर दी है कि संविधान में कई अन्य पहलू भी हैं जिनसे बुनियादी ढांचे का निर्माण हुआ है। भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे का सबसे अहम पहलू संसदीय लोकतंत्र है। भारतीय संविधान का दूसरा सबसे अहम बुनियादी ढांचा निर्वाचित सरकार है जो संप्रभु की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है।’’

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