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राजनीतिक प्रक्रिया की कवायद: कश्मीर में परिसीमन की क्या है तैयारी

प्रधानमंत्री की 24 जून को बुलाई गई बैठक के कारण कश्मीर का परिसीमन सबसे ज्यादा चर्चा में है। गुपकार के दल इस बैठक में अपनी क्या राय रखेंगे, इस पर मंथन जारी है।

(ऊपर) फारुख अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती,(नीचे) हसनैन मसूदी,अनंतनाग-पुलवामा के सांसद, जितेंद्र सिंह, केंद्रीय मंत्री। फाइल फोटो।

प्रधानमंत्री की 24 जून को बुलाई गई बैठक के कारण कश्मीर का परिसीमन सबसे ज्यादा चर्चा में है। गुपकार के दल इस बैठक में अपनी क्या राय रखेंगे, इस पर मंथन जारी है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल होगा? केंद्र शासित क्षेत्र जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक प्रक्रिया को तेज करते हुए केंद्र सरकार ने वहां के प्रमुख दलों को अगले सप्ताह परिसीमन से जुड़ी प्रक्रिया पर चर्चा और उस को आगे बढ़ाने के लिए न्योता दिया है। परिसीमन की प्रक्रिया लारा विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्गठन किया जा सकेगा। यह आगे इस क्षेत्र में विधानसभा चुनाव कराने की तरफ पहला कदम सिद्ध हो सकता है।

क्यों जरूरी है परिसीमन

जम्मू और कश्मीर में परिसीमन से राज्य के तीन क्षेत्रों जम्मू, कश्मीर और लद्दाख विधानसभा की सीटों में बदलाव हो जाएगा। इससे जम्मू और कश्मीर की राजनीति में भी बदलाव हो जाएगा। यहां का 58 प्रतिशत भू-भाग लद्दाख है। यह क्षेत्र बौद्ध बहुल है। राज्य में 26 फीसद भू-भाग जम्मू का है, जो कि हिंदू बहुल है। कश्मीर घाटी जहां का क्षेत्रफल 16 फीसद है और यह मुस्लिम बहुल क्षेत्र है।

कश्मीर घाटी में 10 जिले हैं, जिनमें से चार जिले ऐसे हैं, जहां अलगाववादी और आतंकवादी सक्रिय हैं। ये जिले हैं- शोपियां, पुलवामा, कुलगांव और अनंतनाग। इन चार जिलों को छोड़ दें तो संपूर्ण घाटी और जम्मू आतंकवाद और अलगाववाद से मुक्त है। जम्मू में सक्रिय राजनीतिक दलों, खासकर भाजपा के नेताओं ने यह मुद्दा बनाया कि जम्मू कश्मीर में विधानसभा के गणित की वजह से हर परिस्थिति में कश्मीर घाटी पर केंद्रित पार्टियों का ही वर्चस्व रहता है।

जनसंख्या के आंकड़े

वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में कश्मीर घाटी और जम्मू के बीच मतदाताओं की संख्या में सिर्फ दो लाख का फर्क था। जम्मू में 31 लाख मतदाता पंजीकृत थे और कश्मीर एवं लद्दाख को मिलाकर 29 लाख पंजीकृत मतदाता थे। आमतौर पर परिसीमन का आधार ही जनसंख्या होता है। जम्मू और कश्मीर में कुल 111 विधानसभा सीटें हैं।

अब तक जम्मू और कश्मीर की विधानसभा में कुल 87 सीटों पर चुनाव होता रहा, जिसमें से 46 सीटें कश्मीर में, 37 सीटें जम्मू में और 4 सीटें लद्दाख में हैं। 24 सीटें वह हैं जो पाक अधिकृत जम्मू और कश्मीर में हैं, जहां चुनाव नहीं होता। वतर्मान में 87 विधानसभा सीटों में से बहुमत के लिए 44 सीटों की जरूरत होती है। कश्मीर में 46 सीटें हैं, जहां से ही बहुमत पूर्ण हो जाता है। संविधान के अनुच्छेद 47 के मुताबिक 24 सीटें खाली रखी जाती हैं। जम्मू के लोगों की मांग रही है कि ये 24 सीटें जम्मू में जोड़ दी जाएं। 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा यहां कुल 37 में से 25 सीटें जीत गई थी।

नया प्रस्ताव क्या है

वर्ष 2019 में संसद द्वारा पारित ‘जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन कानून, 2019’ की धारा 60 के अनुसार, परिसीमन के बाद जम्मू-कश्मीर में विधानसभा सीटों की संख्या 107 से बढ़कर 114 की जाएगी। राज्य के पुनर्गठन के बाद जम्मू कश्मीर में लोकसभा की पांच सीटें होंगी जबकि लद्दाख में एक सीट। छह मार्च 2020 को जम्मू-कश्मीर के साथ साथ चार पूर्वोत्तर राज्यों के निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन के लिए सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में परिसीमन आयोग का गठन किया गया। अब आयोग के पास सिर्फ चुनावी कार्टोग्राफी (नक्शा बनाने) का काम बचा है।

राजनीतिक प्रक्रिया

पांच अगस्त 2019 को धारा 370 हटाने के बाद केंद्र सरकार ने राजनीतिक प्रक्रिया की बहाली की कवायद के तौर पर जिला विकास परिषद (डीडीसी) चुनाव कराए। अब अगला कदम विधानसभा चुनाव कराने और जम्मू एवं कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने का है। इसके लिए केंद्र सरकार ने वहां के राजनीतिक दलों से वादा भी कर रखा है। विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन की कवायद इसी के तहत की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में 24 जून को कश्मीर के क्षेत्रीय दलों के नेताओं को बातचीत के लिए दिल्ली आमंत्रित किया गया है। संभावना जताई जा रही है कि इस बैठक में राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने को लेकर तमाम मसविदों पर चर्चा होगी। परिसीमन आयोग की रिपोर्ट के साथ ही क्षेत्रीय दल अपने प्रस्ताव भी बैठक में रखेंगे।

टलता रहा परिसीमन

जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने के पहले वर्ष 2002 में नेशनल कॉन्फ्रेंस की फारूक अब्दुल्ला सरकार ने विधानसभा में एक कानून लाकर परिसीमन को वर्ष 2026 तक रोक दिया। इसके लिए नेकां सरकार ने ‘जम्मू एंड कश्मीर रिप्रेजेंटेशन आॅफ द पीपल एक्ट, 1957’ और जम्मू और कश्मीर के संविधान की धारा 42 (3) में बदलाव किया था। सेक्शन 42 (3) के बदलाव के मुताबिक, वर्ष 2026 के बाद जब तक जनसंख्या के सही आंकड़े सामने नहीं आते, तब तक विधानसभा की सीटों में बदलाव करने पर रोक रहेगी। वर्ष 2026 के बाद जनगणना के आंकड़े वर्ष 2031 में आएंगे। अब नए परिदृश्य में धारा 370 को लेकर ऐसी बाध्यता नहीं है।

क्या कहते
हैं जानकार

हम सैद्धांतिक तौर पर परिसीमन की प्रक्रिया के खिलाफ हैं, लेकिन जम्हूरियत का अपना एक तकाजा है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता कार्यकर्ताओं की फीडबैक के आधार पर मंथन कर रहे हैं, जिसका मसविदा प्रधानमंत्री की बैठक में रखा जाएगा।
– हसनैन मसूदी, अनंतनाग-पुलवामा के सांसद

परिसीमन चुनाव प्रक्रिया को और भी ज्यादा लोकतांत्रिक करने का उपाय है। समय के साथ जनसंख्या में हुए बदलाव के बाद भी सभी नागरिकों के लिए समान प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन क्षेत्र का पुनर्निधारण किया जाता है।
– जितेंद्र सिंह, केंद्रीय मंत्री

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