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रोहिंग्याओं के कैंप से कुछ ही दूर फेंका जाता है इलाज में इस्तेमाल हो चुका सामान, लेकिन यहां लोगों को किसी वायरस से ज्यादा भूख का डर

दिल्ली स्थित कालिंदी कुंज कैंप में सैकड़ों की संख्या में रोहिंग्या रिफ्यूजियों को रखा गया है, यह जगह इलाज में इस्तेमाल हो चुके सर्जिकल मास्क, ग्लव्स, खाली दवाइयों के पैकेट और इंजेक्शन का कूड़ाघर बन चुका है।

Author Edited By कीर्तिवर्धन मिश्र नई दिल्ली | Updated: April 1, 2020 10:00 AM
दिल्ली के कालिंदी कुंज के पास काली-नीली पन्नियों के बीच फैला मेडिकल वेस्ट। (फोटो- अभिनव साहा, एक्सप्रेस)

देशभर में कोरोनावायरस के कारण किए गए लॉकडाउन का असर गरीब और मजदूर वर्ग पर सबसे ज्यादा पड़ा है। जहां एक तरफ लॉकडाउन के ऐलान के कुछ ही घंटों बाद दिहाड़ी मजदूरों और कामगारों का एक बड़ा वर्ग पैदल ही दिल्ली छोड़ने पर अमादा हो गया, वहीं एक वर्ग ऐसा भी है जो चाहकर भी दिल्ली से बाहर नहीं जा सकता। यह वर्ग है रोहिंग्या शरणार्थियों का, जो देश के दूसरे हिस्से (असम, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश) से भागकर जान बचाने के लिए दिल्ली के कालिंदी कुंज स्थित कैंप साइट में रह रहे हैं। लॉकडाउन के चलते इनकी रोजी-रोटी पर भी संकट आ गया है।

दरअसल, कालिंदी कुंज के शरण विहार में स्थित इस कैंपसाइट के पास ही मेडिकल उपकरणों का डंपिंग यार्ड भी बन चुका है। ऐसे में यहां रहने वाले रोहिंग्या अब दोहरी समस्याओं से घिरे हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की एक टीम ने सोमवार को इस इलाके का दौरा किया और यहां मेडिकल वेस्ट की बड़ी-बड़ी कतारें देखीं। इनमें सर्जिकल मास्क, ग्लव्स और दवाइयों के खाली पैकेट भी शामिल थे। इसके चलते यहां रहने वाले लोगों पर सिर्फ रोजी-रोटी कमाने का संकट नहीं, बल्कि इस मेडिकल वेस्ट से पनपने वाली बीमारियों का संकट भी पैदा हो गया है। यह कूड़ा हर दिन बढ़ता जा रहा है और इसे आम लोगों के द्वारा नष्ट भी नहीं किया जा सकता।

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यहां रहने वाले शरणार्थी खराब मेडिकल उपकरणों को अस्पतालों से इकट्ठा कर उन्हें इसी डंपिंग यार्ड में फेंक देते थे। हालांकि, लॉकडाउन के चलते अब उनकी कमाई का यह जरिया भी बंद हो चुका है। कैंप में रहने वाले अनवर इस्लाम के मुताबिक, आखिरी बार वह स्थानीय अस्पताल में मेडिकल वेस्ट इकट्ठा करने एक महीने पहले गए थे। अस्पताल से मेडिकल वेस्ट इकट्ठा करने के बाद लोग इसके प्लास्टिक को अलग कर लेते हैं, जो कि बाद में 12 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बेचा जाता है।

अनवर की पत्नी अशादा बेगम के मुताबिक, उनका रोजाना की कमाई का जरिया काफी पहले ही बंद हो चुका है। पहले शाहीन बाग प्रदर्शनों की वजह से और अब लॉकडाउन के चलते। बेगम के मुताबिक, उन्हें इस बात की ज्यादा चिंता है कि उनके पांच बच्चे कहीं भूख से न मर जाएं।

बेगम के घर के करीब ही रहने वाले दिलशाद से जब कोरोनावायरस के खतरे के बारे में पूछा गया, तो उसका जवा था- “मेरे पास एक मास्क है, जो मुझे बचा सकता है। मेरे लिए चिंता की बात घर के पास पड़ा कूड़ा नहीं, बल्कि खाली थाली है।”

इंडियन सोसाइटी ऑफ हॉस्पिटल वेस्ट मैनेजमेंट के डॉक्टर अशोक अग्रवाल के मुताबिक, अस्पताल से इकट्ठा किए गए कचरे को 48 घंटे के अंदर नष्ट कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि इससे हेपटाइटस बी से लेकर एचआईवी तक का खतरा हो सकता है। इसके लिए प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टरों को जिम्मेदारी दी जाती है, जो इन्हें या तो कहीं गाड़ देते हैं या इन्हें मशीनों के जरिए तोड़ फोड़कर बर्बाद कर दिया जाता है।

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