Delhi PG Building Tragedy: देश के तमाम छोटे-बड़े शहरों में ढांचागत विकास के साथ-साथ जर्जर और कमजोर इमारतों की समस्या भी भयावह रूप अख्तियार कर रही है। देश के अनेक शहरों में ऐसी इमारतें मौजूद हैं, जिनकी दीवारों में दरारें हैं, छतें कमजोर हो चुकी हैं और सुरक्षा के माकूल बंदोबस्त भी नहीं हैं।

इसके बावजूद इनमें लोग रह रहे हैं, दुकानें, कार्यालय और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। इन इमारतों की वजह से जब कोई बड़ा हादसा होता है, तो शासन-प्रशासन अचानक सक्रिय हो जाता है।

जांच के आदेश दिए जाते हैं, कुछ कर्मियों का निलंबन होता है और मुआवजे की घोषणा की जाती है। फिर धीरे-धीरे सब कुछ उसी ढर्रे पर लौट आता है और इंतजार किया जाता है किसी दूसरे हादसे का। राष्ट्रीय राजधानी के सत्य निकेतन में एक छात्रावास की इमारत के ढहने से विद्यार्थियों समेत सात लोगों की मौत की घटना के बाद भी यही सब हो रहा है।

दिल्ली सरकार ने एलान किया है कि पेइंग गेस्ट (पीजी) को कानूनी दायरे में लाने के लिए सुरक्षा नीति बनाई जाएगी। साथ ही शहर में अवैध निर्माणों को गिराने के आदेश जारी किए गए हैं। अहम सवाल यह है कि हादसे के बाद हरकत में आने वाले सरकारी अमले को पहले कुछ दिखाई क्यों नहीं देता है?

जर्जर एवं असुरक्षित भवनों के संभावित खतरे का पता लगाने और उनकी नियमित निगरानी करने पर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता! बड़े शहरों में तो किसी इमारत का नक्शा पास होने से लेकर उसके बनने तक एक लंबी विभागीय प्रक्रिया होती है। नियमानुसार संरचनात्मक स्थिरता प्रमाण-पत्र और अग्नि सुरक्षा अनापत्ति प्रमाण पत्र समेत कई निर्धारित मानकों की जांच के बाद किसी इमारत के इस्तेमाल की अनुमति दी जाती है।

इसके बाद भी भवनों की सुरक्षा एवं मजबूती को लेकर समय-समय पर उनकी जांच करने का प्रावधान है। अगर कोई इमारत जर्जर हालत में पाई जाती है, तो उसे असुरक्षित घोषित कर खाली कराया जाता है। जाहिर है कि इन तमाम नियमों का कड़ाई से पालन नहीं हो रहा है। समस्या केवल भवन मालिकों की लापरवाही तक सीमित नहीं है। स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। भवनों की नियमित जांच, संरचनात्मक सुरक्षा का आकलन और असुरक्षित इमारतों को समय रहते खाली कराने की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए।

सरकार अब पीजी सुरक्षा नीति लागू करने की तैयारी कर रही है। हालांकि राजधानी में इस तरह के प्रयास वर्ष 1993 से जारी हैं, लेकिन अभी तक ठोस नियम जमीनी स्तर पर लागू नहीं हो पाए हैं। ऐसे में जरूरत सिर्फ नीतियां या कानून बनाने की नहीं हैं, बल्कि उनका प्रभावी असर दिखे, यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है। पीजी में रहने वालों से मोटी रकम किराए में वसूली जाती है, लेकिन उनकी सुरक्षा को हाशिए पर डाल दिया जाता है।

खासकर विद्यार्थियों को इस तरह की जोखिम भरी परिस्थितियों में इसलिए रहना पड़ता है, क्योंकि शिक्षा संस्थान उन्हें अपने स्तर पर छात्रावास उपलब्ध कराने में विफल रहते हैं। अगर दिल्ली विश्वविद्यालय की बात की जाए, तो इससे संबद्ध 77 में से 57 कालेजों में छात्रावास की सुविधा नहीं है।

सवाल सिर्फ किसी एक शहर का नहीं है, बल्कि देश भर में उन हजारों जर्जर इमारतों का है, जिनका नियमों की परवाह किए बगैर व्यावसायिक इस्तेमाल हो रहा है। यही वजह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने बीते मंगलवार को स्पष्ट तौर पर कहा कि वह देश भर में भवनों की सुरक्षा जांच के मसले पर विचार करेगा।

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