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प्रदूषण बनाम राजनीति: क्‍या वोट बैंक बचाने को 67 लाख टू-व्‍हीलर्स को ऑड-ईवन से बाहर रख रहे हैं केजरीवाल

दिल्ली में कार चलानेवालों के लिए 15 दिनों की शामत आ गई है। कारों को वैकल्पिक दिन चलवाने की ऑड-ईवन योजना 15 अप्रैल से लागू हो रही है। पहले की तरह रविवार को योजना से छूट मिली हुई है।

Author नई दिल्‍ली | April 15, 2016 13:25 pm
दिल्‍ली में ऑड ईवन का पहला चरण जनवरी में लागू किया गया था। Express photo by Oinam Anand

आज से फिर दिल्ली में कार चलानेवालों के लिए 15 दिनों की शामत आ गई है। कारों को वैकल्पिक दिन चलवाने की ऑड-ईवन योजना आज से लागू हो रही है। पहले की तरह रविवार को योजना से छूट मिली हुई है। योजना के शुरुआती दो दिन शुक्रवार, शनिवार को दफ्तरों और स्कूलों में छुट्टी होने से लोगों को असली दिक्कत सोमवार से होगी। लेकिन इस बार स्कूल खुले हुए हैं और इन 15 दिनों में शादी के मुहुर्त भी हैं। अब तो यह आरोप लगने लगा है कि आम आदमी पार्टी गरीबों और बे-कार निम्न मध्यमवर्ग के लोगों की सहानुभूति लेने के लिए केवल कारों को निशाना बना रही है। जबकि यह साबित हो चुका है कि पहले ऑड-ईवन से प्रदूषण ज्यादा कम नहीं हुआ, हां सड़कों पर भीड़ कम दिखी।

योजना का बड़ा लाभ यह हुआ कि लोग तमाम समस्याओं को भूल कर वैकल्पिक इंतजाम में जुट जाते हैं। दिल्ली में वाहनों की तादात एक करोड़ के आस-पास है। उसमें करीब 28 लाख कार हैं। उन कारों में से सीएनजी से चलने वाली करीब चार लाख कारों को छूट है। इसके अलावा और भी कई तरह से छूट दी गई। एक अनुमान के मुताबिक उस दौरान 40 फीसद कारों के बजाए महज 15-20 फीसद कारें कम सड़क पर आएंगी। इससे ज्यादा प्रदूषण में कमी तब होगी जब, 67 लाख दोपहिया वाहनों को भी इस योजना में शामिल किया जाएगा। लेकिन ऐसा करने से तो सड़कों पर अफरातफरी ज्यादा हो जाएगी और आप का वोट बैंक ही टूट जाएगा।

स्कूली बच्चों से बातचीत में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने स्वीकार किया कि कारों से बच्चों को स्कूल छोड़कर अभिभावक घर कैसे आएंगे या दोबारा उन्हें लेने कैसे जाएंगे, के बारे में सरकार के पास कोई योजना नहीं है। इसके अलावा पहले के तमाम सवाल अपनी जगह पर कायम हैं कि बिना विकल्प दिए इस योजना को लागू करने का क्या मतलब है। तब यह सवाल ज्यादा अहम हो जाता है जब यह कहा जा रहा है कि इससे प्रदूषण का स्तर ज्यादा कम नहीं हो पा रहा है। प्रदूषण नियंत्रण पर सरकार 14 महीने के शासन के दौरान कोई ठोस कदम उठाती नहीं दिख रही है। सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि दोबारा इस योजना को शुरू करने से पहले सालों से दिल्ली की सड़कों से बेदखल किए गए बस आपरेटरों को मौका देने की पेशकश तक नहीं की जबकि वे सरकार की शर्तों पर बस चलाने के लिए बार-बार सरकार को ज्ञापन दे चुके हैं।

डीटीसी के दावों के मुताबिक कुल 4461 बसें उनके पास हैं। लेकिन उनमें कई बसें सड़कों पर नहीं आ पा रही हैं। दिल्ली मेट्रो अपनी क्षमता से अधिक करीब 27-28 लाख तक हर रोज यात्री ढो रही है। तीसरा चरण भले ही देरी से चल रहा है लेकिन उसके 2017 में पूरा होने पर मेट्रो चार सौ किलोमीटर तक चलने लगेगी। सरकार का दावा है कि इससे लोगों को और सुविधा होगी।

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खुद मुख्यमंत्री भी स्वीकार रहे हैं कि बिना सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को ठीक किए हर महीने सम-विषम लागू किया जाना ठीक नहीं है। बावजूद इसके वे हर महीने इसे लागू करने की बात करते हैं। पिछली बार तो सीधे तौर पर आरोप लगाया गया कि यह अभियान ही संशोधित जनलोकपाल बिल और विधायकों के वेतन में बेहिसाब बढ़ोतरी से ध्यान हटाने के लिए किया गया। पिछला अभियान सफल होने के लिए चाहे जो दावे किए जाएं, लेकिन लोगों ने तो जुर्माना और परेशानी के डर से ही अपने वाहन कम निकाले।

सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि बे-कार लोगों में यह हवा बनाई गई कि सरकार उन्हें ज्यादा तवज्जो देने के लिए ऐसा कर रही है। इस दौरान आप सरकार और सम-विषम योजना ने सर्वाधिक सुर्खियां बटोरी। इसलिए यह मुद्दा बनता जा रहा है कि सरकार की यह योजना प्रदूषण के बजाए राजनीतिक समीकरण मजबूत करने के लिए ही इस योजना को पहले भी ले आई थी और आगे भी लाने को बेताब है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन कहते हैं कि इसमें लोगों ने अपनी भूमिका निभा दी लेकिन सरकार तो प्रदूषण कम करने और सार्वजनिक परिवहन प्रणाली के लिए कुछ तो करती हुए दिखे।

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