दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में दहेज हत्या के मामले में आरोपी एक व्यक्ति और उसके माता-पिता की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने इस बात को गौर किया कि अपनी युवा बेटी की मौत के गम से जूझ रहे एक शोकाकुल पिता से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह हर आरोप को एक प्रशिक्षित जांचकर्ता की तरह सटीकता के साथ बताए।

जांच में देरी पर चिंता जताते हुए जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने 1 जून को मामले की सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि जितना समय लड़की की शादी को नहीं हुआ युवती की अप्राकृतिक मृत्यु से संबंधित एफआईआर दर्ज करने में उससे भी अधिक समय लग गया।

‘शोक में डूबे पिता से जांच अधिकारी जैसी उम्मीद नहीं’

आदेश में कहा गया, “एक पिता जिसने अभी-अभी अपनी जवान बेटी की मृत्यु देखी है, जिसका शव अभी भी मुर्दाघर में पड़ा है और जिसकी शादी उसने कुछ ही महीने पहले करवाई थी, उससे यह उम्मीद करना सही नहीं है कि वह अपनी बेटी के निधन के सदमे से उबरते हुए, उसके वैवाहिक जीवन का पूरा इतिहास सटीकता से बयान कर सके। कानून ऐसे दुखद हादसे के तुरंत बाद शोक संतप्त माता-पिता से किसी प्रशिक्षित जांचकर्ता की तरह शांत रहने या सब कुछ याद रखने की अपेक्षा नहीं कर सकता।”

अदालत ने गौर किया कि इस मामले का सबसे परेशान करने वाला पहलू यह था कि पीड़िता के पिता को शुरू में उसके ससुराल वालों ने बताया था कि वह सीढ़ियों से गिर गई थी लेकिन बाद में पता चला कि उसने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी। अदालत ने युवती की अप्राकृतिक मौत के मामले से निपटने में दिखाई गयी असंवेदनशीलता पर ध्यान दिया।

अदालत ने आगे कहा कि ये टिप्पणियां केवल इस आदेश की लंबाई बढ़ाने के लिए नहीं की जा रही हैं बल्कि व्यवस्था में ऐसे लोगों को स्पष्ट संदेश देने के लिए की जा रही हैं जो इस तरह की घटनाओं के प्रति असंवेदनशीलता दिखाते हैं कि न्याय व्यवस्था उनके प्रति कोई नरमी नहीं दिखाएगी। दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि दुर्भाग्यपूर्ण वास्तविकता यह है कि पीड़िता के पिता को अपनी युवा बेटी की अप्राकृतिक मौत के संबंध में एफआईआर दर्ज कराने और जांच कराने के लिए दर-दर भटकना पड़ा।

दिल्ली हाई कोर्ट ने FIR में देरी पर उठाए सवाल

अदालत ने यह भी कहा कि न तो कानून और न ही अदालतें इतनी असंवेदनशील हो सकती हैं कि शोक संतप्त माता-पिता को उनकी बेटी की असामयिक मृत्यु पर शोक मनाने के लिए समय से भी वंचित कर दें और उनसे हर आरोप को सटीकता और पूर्णता के साथ बयान करने की अपेक्षा की जाए। अदालत ने कहा कि शोक संतप्त माता-पिता से यह अपेक्षा नहीं की जाती है कि वे अपनी बेटी की मौत की अपूरणीय क्षति के कुछ ही घंटों के भीतर एक पूर्ण और सुव्यवस्थित मामला प्रस्तुत करें। अदालत ने कहा कि यह स्वाभाविक ही होगा कि पीड़िता के माता-पिता को यह जानकर गहरा सदमा लगा होगा कि उनकी बेटी जिसकी उन्होंने कुछ महीने पहले ही शादी की थी, उसने आत्महत्या कर ली है और अब वह जीवित नहीं है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि भविष्य में, विवाह के कुछ समय बाद ही हुई किसी युवती की अप्राकृतिक मृत्यु के संबंध में, विशेष रूप से जहां दहेज से संबंधित उत्पीड़न के आरोप लगाए गए हों, इन मामलों को कम समय सीमा में सूचीबद्ध किया जाना चाहिए ताकि एफआईआर दर्ज करने और जांच शुरू करने का मुद्दा महीनों तक अनसुलझा न रह जाए।

जमानत के केस में हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

कर्नाटक हाई कोर्ट ने हाल ही में कानून के पालन को लेकर सख्त टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि हाथ-पैर काट दिए जाएं शायद लोग तब कानूनों का पालन करेंगे। उच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी यौन उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में की। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें