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टीबी की मरीज को दे दी मां बनने की सलाह, कोख में मर गया बच्चा तो बर्बाद कर दिया यूट्रस, अब डॉक्टरों पर 25 लाख का जुर्माना

प्राइवेट अस्पताल के डॉक्टरों ने ऐसी लूट मचाई की महिला के भ्रूण को भी नहीं बख्शा। पहले तो टीबी के उपचार के दौरान बच्चा प्लान करने का सुझाव दिया। इसके बाद यहां से हर किसी ने मरीज को रुपये का खजाना समझ लिया।

इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक रूप में किया गया है। (फोटो सोर्स: द इंडियन एक्सप्रेस)

भारत में संगठित मेडिकल अपराधियों का जाल प्राइवेट अस्पताल के रूप में हर शहर और कस्बे में फैला है। डॉक्टर के वेश में अधिकांश गिद्ध मरीजों को इस कदर नोच खाते हैं कि उनकी जान पर बन आती है। कभी-कभी तो पैसे की लालच इस कदर सवार होती है कि इलाज के नाम पर मरीजों की हंसती-खेलती जिदंगी को उजाड़ दिया जाता हैं। ऐसा ही एक वाकया दिल्ली के प्राइवेट अस्पतालों में पेश आया है, जहां एक महिला के बच्चे को गर्भ में ही मार दिया गया। इसके बाद उपचार के नाम पर पीड़ित महिला से डॉक्टरों ने लाभ कमाने की भरसक कोशिश की। मामले में अदालती लड़ाई लड़ने के बाद कंजूमर कोर्ट ने पीड़ित महिला को मुआवजे के रूप में 25 लाख रुपये देने को कहा है।

28 साल की स्वप्निल मिश्रा को एक प्राइवेट अस्पताल ने टीबी के उपचार के दौरान ही बच्चा पैदा करने की सलाह दी। पहले अस्पताल ने जब लूट-खसोट मचाकर उनका स्वास्थ्य तबाह कर दिया तब दिल्ली के दूसरे अस्पताल ने भी लूटने में कसर नहीं छोड़ी और उनके यूट्रस में ऐसे घाव दे डाले कि उनके दोबारा मां बनने की उम्मीद खत्म हो गई। डॉक्टर ने गर्भ में मरे हुए बच्चे की सर्जरी की, फिर भ्रूण के कुछ अवशेष गर्भ में ही छोड़ दिए और फिर दोबारा सर्जरी कराने का दबाव बना दिया। इलाज के नाम पर यह गोरखधंधा नवंबर 2011 में गाजियाबाद के वैशाली स्थित पुष्पाजंलि हेल्थकेअर से शुरू हुआ। इस दौरान महिला को पहली बार पीरियड के दौरान असहनीय पीड़ा की शिकायत हुई। जिसके बाद उन्हें डॉक्टर शारदा जैन के पास रेफर किया गया। यहां उन्हें PAMP जांच कराने के लिए कहा गया। जांच में डॉक्टर जैन ने महिला को टीबी होने की पुष्टि की।

द हिंदू की एक रिपोर्ट में स्वप्निल मिश्रा का केस लड़ने वाले वकील वर्धमान कौशिक, कर्णदेव बघेल और निशांत गौतम का कहना है कि डॉक्टर शारदा जैन ने पीड़ित मरीज को टीबी की दवाई लेने के दौरान ही बच्चा प्लान करने के लिए कह दिया। उनका कहना था कि बच्चा अगर जल्दी नहीं पैदा किया गया तो आगे उनके लिए काफी मुश्किल हो जाएगी। गर्भवती होने के बाद महिला जरूरी टेस्ट के लिए दूसरे डॉक्टर के पास पहुंची, जहां पता चला कि बच्चे की ग्रोथ सही ढंग से नहीं हो पा रही है। इसके बाद वह दिल्ली के ग्रेटर कैलाश स्थित ‘फोर्टिस ली फेमे सेंटर फॉर विमन’ अस्पताल पहुंची। यहां उन्हें डॉक्टर नीना सिंह के यहां रेफर किया गया। डॉक्टर नीना ने मरीज स्वप्निल मिश्रा को 15 दिनों तक इंतजार करने को कहा। 15 दिनों के बाद जब दोबारा चेकअप हुआ तो पता चला उनका बच्चा गर्भ में ही मर चुका है। इस दौरान डॉक्टर ने उन्हें D&C (Dilation and curettage) का सुझाव दिया।

10 अप्रैल, 2012 को डॉक्टर नीना सिंह ने फिर इलाज की प्रक्रिया शुरू कि और नई तरह की मुसीबत सामने आ गई। तमाम अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट ने उजागर किया कि D&C सही तरके से नहीं किया गया और भ्रूड़ का काफी हिस्सा मां के गर्भ में ही छूट गया था। डॉक्टर नीना सिंह ने अपनी इस गलती के लिए माफी मांगी और दोबारा बिना पैसे के D&C करने के लिए कहा। इस दौरान उन्होंने यूट्रस में ऐसे घाव दे दिए जिससे उन्हें ऐसा रोग हो गया जो किसी को विरले ही होता है। इसके बाद मिश्रा अपने पति के साथ लगातार दो सालों तक डॉक्टरों के पास दौड़ती रहीं ताकि वह फिर से गर्भवती हो सकें। डॉक्टरों की इस अपराधिक कृत्य के खिलाफ मिश्रा ने मुआवजे के लिए कंजूमर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने माना कि टीबी के उपचार के दौरान महिला को बच्चे पैदा करने की सलाह दी गई, जो बिल्कुल ही उचित नहीं था। कंजूमर कोर्ट ने माना कि मामले में स्वास्थ्य संबंधी मानकों का उल्लंघन किया गया और मुआवजा देने के आदेश दिया। हालांकि, कोर्ट ने आरोपी डॉक्टरों के खिलाफ अदालत में आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग को खारिज कर दिया।

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