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दिल्ली मेरी दिल्ली

सप्ताह के पांच दिन नौकरीपेशा वर्ग को अपने कार्यालयों में जाना पड़ रहा है। खरीदारी करने के लिए शनिवार व रविवार को पूर्णबंदी के चलते बाजार बंद रहते हैं। बताया जा रहा है कि साप्ताहिक बंदी घोषित होने के बाद वाहनों की खरीदारी में काफी ज्यादा गिरावट दर्ज की गई है, जबकि सबसे अधिक वाहनों की खरीदारी रविवार को होती है।

Author Edited By Sanjay Dubey नई दिल्ली | August 10, 2020 5:13 AM
दिल्ली मेरी दिल्ली।

राम का नाम
अयोध्या में राम मंदिर का भूमि पूजन भाजपा ने अपने को दिल्ली वालों से जोड़ने का एक हथियार बना लिया है। इसी की आड़ में कोराना काल की वजह से जो नेता सक्रिय नहीं थे वे भी सक्रिय हो गए। अधिक से अधिक लोगों को अपने साथ जोड़ व पार्टी के मिशन से जोड़ा जा सके। इसके लिए तरह- तरह के आयोजन भी हुए। पार्टी के नेता भी मान रहे हैं कि राम जी के नाम पर भाजपा ने मैदान संभाल तो लिया है, लेकिन अब इसको पकड़े रखना है। वरना निगम में भाजपा की चुनौती अधिक कड़ी होगी।

दीया योजना नाकाम
इस बार अगस्त में ही दीपावली मनवाने की चुनौती थी। दरअसल राम जन्म भूमि पूजन के अवसर को एतिहासिक जो बनाना था। लेकिन इसके लिए हर कोई तैयार भी नहीं था। लिहाजा, इस बाबत दिल्ली के कारसेवक मोर्चा संभालने निकल पड़े। बस्ती-बस्ती, घर घर 5-5 दीए बांटे गए, लेकिन फिर भी ‘वो’ नजारा नहीं दिखा जिसकी वो आस लगाए बैठे थे। तफ्तीश में पता चला कि कुछ घर वैसे भी थे जिनको दीये तो दिए गए थे लेकिन वहां जलाए नहीं गए। बस क्या था, कुछ लोग मन ही मन मानो सर्वे पर निकल पड़े। उन्हें उन घरों से जो जवाब मिला वह चर्चा का विषय बनता दिखा। इतना ही नहीं कार सेवक उल्टे पांव लौटते भी नजर आए। क्योंकि लोगों ने उन्हें बताया कि बेमन से कुछ नहीं होता। और रही दिये कि बात तो सुनिए- बिना तेल या घी के दीपक नहीं जलते। इतना ही जरूरी था तो दीया-बाती के साथ एक तेल की शीशी भी रखते जाते। चले आते हैं अपनी सोच थोपने। पहले देशभक्ति का पैमाना तय किए और अब रामभक्ति का करने आ पहुचे, ये नहीं चलेगा। अब यह सब सुनकर दबे पांव ही तो लौटना बचता है।

पुराने बढ़ा रहे दूरी
भाजपा में नई टीम के इंतजार में पुराने नेता आजकल दूरी बढ़ाते नजर आ रहे हैं। सबको कम से कम इस बात का अनुमान हो गया है कि उसका पत्ता टीम में कट गया है। इस वजह से नई टीम के पुनर्गठन के पहले से ही भाजपा की अंदुरूनी तोड़फोड़ सामने आ रही है। यही वजह है कि संगठन में सक्रिय चल रहे नेताओं को घेरने के लिए भाजपा के पुराने नेता इन दिनों परोक्ष तौर पर राजनीतिक टिप्पणियां करते नजर आ हैं और छुपे अंदाज में संगठन से अपनी दूरियां भी बनाते दिख रहे हैं। हालांकि पुराने वरिष्ठ नेता विजय गोयल एक बार फिर बाबर रोड का नाम बदलने की सिफारिश के साथ भाजपा में सक्रिय नजर आए हैं।

प्रयासों में रुकावट
पूर्णबंदी में राहत के चौथे चरण में लोगों की दिनचर्या और आर्थिक स्थिति में सुधार के प्रयासों को उत्तर प्रदेश में लागू साप्ताहिक बंदी पलीता लगा रही है। कोरोना महामारी के कारण आई वैश्विक मंदी की मार के चलते औद्योगिक महानगर से लाखों की संख्या में श्रमिक अपने गांव चले गए हैं। वहीं, हजारों की संख्या में लोगों की नौकरी चली गई या तन्ख्वाह में कटौती हो गई है। इसके बावजूद आने वाले दिनों में सुधार की उम्मीद लगाकर अपने कारोबार को दोबारा जमाने की कोशिशों में साप्ताहिक बंदी बड़ी रुकावट साबित हो रही है। खास तौर पर वाहन उद्योग और रियल एस्टेट सेक्टर पर साप्ताहिक बंदी का सबसे बड़ा असर पड़ रहा है।

सप्ताह के पांच दिन नौकरीपेशा वर्ग को अपने कार्यालयों में जाना पड़ रहा है। खरीदारी करने के लिए शनिवार व रविवार को पूर्णबंदी के चलते बाजार बंद रहते हैं। बताया जा रहा है कि साप्ताहिक बंदी घोषित होने के बाद वाहनों की खरीदारी में काफी ज्यादा गिरावट दर्ज की गई है, जबकि सबसे अधिक वाहनों की खरीदारी रविवार को होती है। इसी तरह फ्लैट खरीदारों की सबसे अधिक भीड़ रविवार को ही बिल्डर कंपनियों के कार्यालयों में होती थी। खरीदार अपने परिवार के साथ आकर अपने बजट के आधार पर फ्लैटों का चयन कर बुक कराते थे। शनिवार और रविवार को बंदी के चलते रियल एस्टेट कारोबारियों के कार्यालय बंद होने से इस क्षेत्र पर काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

निगम चुनाव का रंग
कोरोना काल जैसे ही समाप्त होगा तो राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती निगम के चुनाव होंगे। निगमों के चुनाव के लिए जमीनी स्तर पर जनता के बीच पकड़ बनाई जा सके, इसके लिए भाजपा व कांग्रेस दोनों ही जनता के बीच अपना दम दिखाने में लगे हंै। इसके लिए धरने प्रदर्शन किए जा रहे हैं और लोगों को आप सरकार की खामियां बताई जा रही हैं ताकि इसका लाभ उनको आने वाले दिनों में निगम चुनाव में मिल सके।

अपने नाम पर जोर
पिछले कई महीनों से सरकार को घेरने में जुटे विपक्ष के एक नेता इन दिनों केवल अपने नाम पर ही जोर दे रहे हैं। भले ही वीडियो कॉन्फ्रेंस में पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता शामिल रहे हों। पर प्रदेश की जिम्मेदारी संभाल रहे नेता अपने नाम पर अधिक जोर देते हैं। बीते दिनों कई बार प्रदेश अध्यक्ष के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन किया गया। पर उन्होंने जो बयान जारी किया। उसे केवल अपने स्तर पर जारी किया। यही कारण है कि अब पार्टी के अंदरखाने इसको लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। अब देखना बड़ा ही दिलचस्प होगा कि यह सिलसिला कब तक चलता है।

मौत पर राजनीति
मौत पर राजनीति तो सुनी होगी, लेकिन कोरोना काल में हुई असामयिक मौत के बाद जिस तरह मुआवजे देने और लेने के लिए घोषणाएं हो रही हैं और उसकी नकल भी की जा रही है, वह दुखद है। कोरोना के समय में नेताओं को सबसे ज्यादा परेशानी यह हो रही है कि उनकी बात दूसरे लोग मुंह से छीन रहे हंै। बेदिल को एक नेता ने बताया कि जबसे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक करोड़ की घोषणा की तबसे मौत पर राजनीति शुरू है। पहले तो नेता इसे मानने को तैयार नहीं थे, लेकिन जब मुख्यमंत्री पीड़ित के घर जाकर एक करोड़ का चेक देने लगे तो दूसरी पार्टियों ने भी दस लाख और पांच लाख देना शुरू कर दिया। आलम ये है कि पीड़ित के घर चेक लेकर जाने वाले नेताओं का मजमा लग जाता है और फिर यही चर्चा होती है कि मौत पर तो राजनीति बंद हो।
-बेदिल

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