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दिल्ली मेरी दिल्ली

दिल्ली में निगम चुनाव को लेकर घमासान शुरू हो गया है। इसके लिए एक पार्टी ने सीधे तौर पर हमला बोला दिया है और एक विशेष नेता को केवल इसी काम के लिए तैनात किया है।

Author नई दिल्ली | September 14, 2020 5:24 AM
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ऐप का विरोध
स्वच्छता सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश में अव्वल आने के बाद देश के स्वच्छ शहरों की सूची में अग्रणी आने की कवायद में सफाई कर्मचारियों की मनमानी नोएडा प्राधिकरण के लिए कड़ी चुनौती पेश कर रही है। हालिया मामले में स्वास्थ्य कर्मी हड़ताल पर चले गए हैं। हड़ताल की वजह काम करने की निगरानी को बताया जा रहा है, जबकि सफाई कर्मचारी काम करने की निगरानी और हाजिरी लगाने की नई व्यवस्था के विरोध में हैं। कोरोना काल से पहले सफाई कर्मचारियों की बायोमेट्रिक हाजिरी दर्ज की जाती थी। संपर्क रहित व्यवस्था के तहत बायोमेट्रिक की जगह अब ऐप से उपस्थिति लगाने की व्यवस्था का सफाई कर्मचारी विरोध कर रहे हैं। इस प्रणाली में सफाई कर्मी का मौजूद होना अनिवार्य होगा, जबकि पूर्व की व्यवस्था में वह जुगाड़ से हाजिरी लगाकर घर बैठ सकता था। इससे साफ है कि सफाई कर्मचारी बगैर काम के तन्ख्वाह लेना चाहते हैं। काम करने के लिए वे तैयार नहीं हैं। अपनी इस नियम विपरीत मांग को मनवाने के लिए वे हड़ताल कर रहे हैं। हालांकि इस मर्तबा प्राधिकरण के अधिकारी भी अभी तक उनसे दो-दो हाथ कर नई व्यवस्था और स्वच्छता कार्य में सुधार लाने के लिए अड़े हुए हैं।

मन के विधायक
विधायकी गई, लेकिन सड़क पर नेताजी बतौर विधायक मौजूद हैं। जी हां, दिल्ली में ऐसे कई नाम सड़कों पर लगे स्थायी पट्टिकाओं पर बतौर विधायक लिखे इन दिनों देख जा सकते हैं। चुनाव हार चुके या बीते विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ने वाले नेताजी। मसलन, कालकाजी के पूर्व विधायक अवतार सिंह कालका हो या सुल्तानपुरी के पूर्व विधायक संदीप कुमार, वे अभी भी लोहे या पत्थर की पट्टिकाओं के जरिए बतौर विधायक लोगों का अभिवादन करते देखे जा सकते हैं। बीते दिनों जब एक राहगीर की नजर जलेबी चौक स्थित एक स्थायी बोर्ड पर पड़ी तो चर्चा ने कई आयाम ले लिए। मसलन, किसी ने चुटकी ली, कहा…चुवाव हार गए तो क्या हुआ, टिकट कट गई तो क्या हुआ, मन के विधायक तो हैं ही, जहां चाहेंगे डटे रहेंगे…। किसी ने मानो समझाने के लहजे में कहा-रस्सी जलने के बाद भी तो ऐंठन कहा जाती है भला। तो किसी ने पूर्व विधायक से ज्यादा सरकार के महकमा को जिम्मेदार ठहराया, क्योंकि नाम हटाने का काम तो उसी का है, कोई अपना चलता नाम क्यों हटाए भला।

चुनावी घमासान
दिल्ली में निगम चुनाव को लेकर घमासान शुरू हो गया है। इसके लिए एक पार्टी ने सीधे तौर पर हमला बोला दिया है और एक विशेष नेता को केवल इसी काम के लिए तैनात किया है। विरोधी पार्टी की यह तकनीक भाजपा को भी समझ आ रही है। यही वजह है कि ऐसे तेज तर्रार नेता तलाशे जा रहे हैं जो आगामी चुनाव में पार्टी का सही से पक्ष रख सकें और पार्टी की किरकिरी होने से बचा सकें। निगम में भाजपा एक लंबे समय से राज कर रही है।

सियासी झुग्गी
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी नजर ने राजनीतिक हलकों में बैचेनी बढ़ा दी है। दिल्ली के चुनावी घमासान में राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ा वोट बैंक झुग्गी बस्तियां इस समय निशाने पर हंै। इसके लिए भाजपा, कांग्रेस व आम आदमी पार्टी में वार-पलटवार तेज हो गया है। इस राजनीतिक घमासान ने पूरे मामले को इतनी बुरी तरह से फंसा दिया है कि मतदाताओं में असमंजस पैदा हो रही है। इसलिए उजड़ते आशियानों को लेकर ये दल भी अपनी राजनीतिक रोटियां गर्म करने में लग गए हैं और इस हालत के लिए एक दूसरी पार्टी की घेराबंदी कर रहे हैं।

मुद्दे की तलाश
पिछले कुछ दिनों से राजधानी में एक दल मुद्दे की तलाश में है। कभी निगम कर्मचारियों को कोरोना योद्धाओं का सम्मान दिलवाने के लिए सड़कों पर घेराव करती है तो कभी निगम कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन करती है, इस बार पार्टी के दिल्ली मुखिया ने रेलवे लाइन के आसपास बसी झुग्गी बस्तियों को मुद्दा बनाने में पर तुली है। पर कामयाबी मिलती दिखाई नहीं दे रही है। पार्टी के मुखिया की तबियत बिगड़ने के बाद कुछ गिनेचुने नेता ही विरोध प्रदर्शन में दिखाई देते हैं। अब तो पार्टी के अंदर से ही सवाल खड़े होने लगे हैं कि मुखिया के सलाहकार मुद्दों को समझ पाने में सफल नहीं हो रहे हैं। यही कारण है कि कुछ समय बाद पार्टी अपने मुद्दे बदलती रहती है, जिससे कुछ फायदा होता नजर नहीं आ रहा है।

महकमे में हड़कंप
दिल्ली पुलिस के एक अतिरिक्त उपायुक्त सीबीआइ के शिकंजे में क्या आए पूरे महकमे में हड़कंप मच गया है। मामला सीबीआइ के हाथ में है, लिहाजा कोई पुलिस अधिकारी इस बारे में अपनी प्रतिक्रिया भी नहीं दे रहे। बेदिल ने जब इस मामले की तहकीकात की तो पता चला कि दिल्ली पुलिस में आखिर किस तरह एक दानिप्स अधिकारी ऐसी जालसाजी की चपेट में आए हैं, इसकी जांच बारीकी से हो रही है और दिल्ली पुलिस के एक लाख से ज्यादा कर्मचारी और अधिकारी अब सीधे तौर पर जांच के घेरे में हैं, ताकि कोइ और इस तरह के मामले में फंस ना जाए।

बेदिल

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