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कोरोना काल में जहां समूचे देश की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर गई है। वहीं, पढ़ाई की दुकानदारी करने वालों ने कमाई गली-मौहल्ले में छोटे-छोटे पब्लिक स्कूल खोलने वाले इस माहौल में भी कमाई करने के नित नए हथकंडे अपना रहे हैं। इस दौरान लोगों के काम धंधे ठप होने या नौकरी जाने से जीवनयापन का संकट पैदा हो गया है।

Author नई दिल्ली | July 13, 2020 3:47 AM
crime, crime newsऑनलाइन जांच के दौरान इस मामले का खुलासा हुआ है। सांकेतिक तस्वीर।

शॉर्टकट का सहारा
दिल्ली-उत्तर प्रदेश की सीमा में प्रवेश के लिए शॉर्टकट लोगों का सहारा बन रहे हैं। दरअसल दिल्ली व एनसीआर के राज्यों से प्रतिदिन कामकाजी लोग अपने कामों के लिए दिल्ली व उत्तर प्रदेश जाते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने राज्य की सीमा को सील कर दिया है। लेकिन जो लोग प्रतिदिन आ जा रहे हैं उनकी परेशानी भी पुलिस वालों को समझ आ रही है। यही वजह है कि इन दिनों में बैरिकेट लगाने वाले पुलिस वाले ही भले ही मुख्य मार्गों से जाने से रोक रहे हों, लेकिन वाहन चालकों को खुद ही शॉर्टकट से एक राज्य से दूसरे राज्य जाने का रास्ता बता रहे हैं। ये पहल ही इन दिनों दोनों राज्यों को एक दूसरे से जोड़े हुए हैं।

अपनों को तवज्जो नहीं
भारतीय जनता पार्टी में दिल्ली भाजपा में नई कमान नए प्रदेश अध्यक्ष ने संभाल ली है। इसके बाद से ही प्रदेश कार्यालय में कई नेताओं ने भी चक्कर लगाना शुरू कर दिया है। हालत यह है कि पार्टी के नेता जन समस्याओं को लेकर अपने ही विशेष सेल को तवज्जो नहीं दे रहे हैं। यह नाराजगी हाल ही में आरडब्लूए सेल से सामने आई है। जहां पार्टी के सक्रिय नेताओं ने प्रदेश अध्यक्ष को सीधे नए आरडब्लूए संगठनों से जोड़ दिया। यहां बात शुरुआत के कुछ दिनों में ही इतनी खराब हो गई है कि पार्टी के आरडब्लूए सेल के समन्वयक ने नाराज होकर पार्टी प्रदेश अध्यक्ष को अपना इस्तीफा सौंप दिया है।

कोरोना : फिक्र कहां
एक तरफ दिल्ली में कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ इसे लेकर लापरवाही। खासकर सार्वजनिक परिवहन की बसों में। कड़ी चौकसी अब बीते दिनों की बात हो गई है। 20 यात्रियों की सीमा की बात हो या सामाजिक दूरी बनाने की या हो बसों के साफ सफाई व सेनेटाइजेशन की। इन सबकी मानों रस्म अदायेगी हो रही है और वो भी कुछ खास रूटों पर। बीते दिनों 567 नंबर रूट पर यात्रियों की बेबसी कुछ ऐसी दिखी। लोग कहते सुने जा रहे हैं कि ‘फिक्र किसे’! सरकार को लगता है कि टीवी और अखबारों पर आकर जनता को कोरोना से बचने की हिदायत व ज्ञान दे देने से उनके काम पूरे हो गए। लेकिन धरातल पर क्या हो रहा है, इसकी फिक्र कहां।

स्कूलों की मनमानी
कोरोना काल में जहां समूचे देश की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर गई है। वहीं, पढ़ाई की दुकानदारी करने वालों ने कमाई गली-मौहल्ले में छोटे-छोटे पब्लिक स्कूल खोलने वाले इस माहौल में भी कमाई करने के नित नए हथकंडे अपना रहे हैं। इस दौरान लोगों के काम धंधे ठप होने या नौकरी जाने से जीवनयापन का संकट पैदा हो गया है। ऐसे हालात में भी गांवों के छोटे-छोटे पब्लिक स्कूल संचालक अभिभावकों को बच्चे का नाम काटने या फेल होने का प्रमाण पत्र जारी करने की धमकी देकर जबरन फीस और नई कक्षा की किताबें खरीदने का दबाव बना रहे हैं।

ऐसे कई स्कूलों के संचालक इन दिनों सुबह ही स्कूल में पहुंचकर अभिभावकों को फोन कर धमकी देने का काम कर रहे हैं। बच्चे के भविष्य खराब होने से बचाने के लिए अभिभावक स्कूलों में पहुंचकर निजी प्रकाशकों की किताबें खरीदने को मजबूर हो रहे हैं। साथ ही आनलाइन पढ़ाई कराने के नाम पर विगत महीनों की भी आधी फीस भी मांगी जा रही है। जबकि ऐसे स्कूलों में आनलाइन पढ़ाई का कोई प्रबंध तक नहीं है। जो अभिभावक नई किताबें नहीं खरीद रहे या आधी फीस नहीं दे रहे हैं, उन्हें स्थानीय दबंगों से धमकी भी दिलाई जा रही है। अपने आप को पाक-साफ साबित करने के लिए ऐसे स्कूल संचालक अभिभावकों को प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायत करने से भी सचेत कर रहे हैं। कोरोना और भूख की मार झेल रहे आम आदमी ऐसे पब्लिक स्कूल संचालकों की मनमानी के बीच पिसने को मजबूर हैं।

पहले दूरी अब मिलाप
इस कोरोना के संकट में हर कोई डरा हुआ है। पर संक्रमण से ठीक होने वालों की संख्या बढ़ने के बाद लोगों में थोड़ा बहुत डर कम भी हुआ है। जहां पहले अपने ही विभाग के लोगों से कर्मचारी और अधिकारी दूरी बना कर रखते थे और डर के साए में जीते थे कि कहीं कोई कोरोना संक्रमित तो नहीं है। अब वहीं, कर्मचारी और अधिकारी के ठीक होकर लौटने पर उनका विभाग में स्वागत किया जा रहा है।

उन्हें फूल मालाएं पहनाई जा रही हैं और गले भी लगाया जा रहा है। बीते दिनों से संक्रमित लोग या तो घरों में रहकर या फिर अस्पताल में कोरोना को मात देने में सफल हुए हैं। पर जिस प्रकार से वह ठीक होकर लौट रहे हैं। उन्हें भी उम्मीद नहीं थी कि उनका इस प्रकार से स्वागत किया जाएगा। पर अब भी माना जा रहा है कि सतर्कता बरती जाए और बीमारी को लेकर कहीं अधिक जागरूक रहने की जरूरत है।
-बेदिल

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