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‘दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की ‘मैरिटल रेप’ को तलाक का आधार बनाने की जनहति याचिका

याचिका में यह भी दलील दी गई कि देश की 100 में से पांच औरतों ने पति द्वारा शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने और सेक्स के लिए जोर-जबरदस्ती करने का आरोप लगाया।

delhi high courtतस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने मैरिटल रेप (पति द्वारा पत्नी का बलात्कार) को तलाक का आधार मानने की एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया। याचिका खारिज करते हुए उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस डीएन पटेल और जस्टिस सी हरिशंकर ने कहा कि अदालत के पास संविधान के आर्टिकल 226 के तहत शामिल विधान को बदलने की शक्ति नहीं है। न्यायालय में यह जनहित याचिका वकील अनूजा कपूर ने दाखिल किया था। गौरतलब है कि वर्तमान में मैरिटल रेप को हिंदू मैरिज एक्ट 1955, मुस्लिम पर्सन लॉ एप्लिकेशन एक्ट 1937 और स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 में तलाक आधार नहीं माना गया है।

जनहित याचिका में कोर्ट से यह भी फरियाद की गई थी कि वह केंद्र सरकार को मैरिटल रेप के मामलों को दर्ज करने संबंधी एक गाइलाइंस जारी करने के लिए भी कहा है। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उनकी याचिका दिल्ली सरकार की उस रिपोर्ट के आधार पर है जिसके बारे में हाईकोर्ट को बताया गया था कि भारतीय दंड संहिता के सेक्शन 498 A में मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इसके लिए याचिका में कई रिपोर्ट्स का हवाला दिया गया था। याचिका में कहा गया था कि भारत में 100 में से हर 18 पति अपनी पत्नी द्वारा सेक्स से इनकार करने पर उसके साथ जबरदस्ती करने का अधिकार रखता है। राज्यों के क्रम में ऐसे लोगों का प्रतिशत आंध्र प्रदेश में 43%, 42.6% तेलंगाना में, मिजोरम में 29.5%, जम्मू-कश्मीर में 21.75%, पश्चिम बंगाल में 20.3 प्रतिशत और कर्नाटक में 19.9 प्रतिशत है।

याचिका में यह भी दलील दी गई कि देश की 100 में से पांच औरतों ने पति द्वारा शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने और सेक्स के लिए जोर-जबरदस्ती करने का आरोप लगाया है। राज्यों के क्रम में बिहार में यह प्रतिशत 11.4 है। जबकि, मणिपुर में 10.16 प्रतिशत, त्रिपुरा में 9 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 7.4 प्रतिशत, हरियाणा में 7.3 प्रतिशत है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि मैरिटल रेप को हत्या के गुनाह से कम करके नहीं देखा जाना चाहिए। यह औरतों के दिलो-दिमाग पर काफी लंबे अर्से तक नकारात्मक प्रभाव रखता है।

इससे पहले दिल्ली जुलाई, 2018 में सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने मैरिटल रेप पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि शादी का मतलब यह नहीं कि कोई महिला शारीरिक संबंध बनाने के लिए हमेशा राजी हो और उसने अपना शरीर पति को सौंप दिया है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि जरूरी नहीं कि बलात्कार के लिए बल प्रयोग किया गया हो, यह दूसरे तरीके से भी दबाव बनाकर हो सकता है। इसके अलावा दिसंबर, 2015 में मोदी सरकार में तत्कालीन गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने राज्यसभा में कहा था कि केंद्र सरकार मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में लाने के लिए जल्द सख़्त क़ानून बनाएगी। उन्होंने कहा ता कि सरकार लॉ कमीशन की रिपोर्ट का इंतजार कर रही है, ताकि आईपीसी की पुरानी धाराओं को बदला जा सके।

दिसंबर, 2015 में रिजिजू ने सदन में कहा था, “मैरिटल रेप का मुद्दा बहुत ही जटिल है। इस पर विचार करते वक्त पारिवारिक और सामाजिक ढांचे को भी ध्यान में रखना होगा। इस पर संसदीय समिति और लॉ कमीशन विचार कर रहे हैं। अम्मीद है कि लॉ कमीशन कि रिपोर्ट हमें जल्दी ही मिल जाएगी।” वैसे ज्ञात हो कि महिलाओं के खिलाफ होने वाली क्रूरता से निपटने के लिए अभी भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A का प्रावधान मौजूद है।

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