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भाजपा ने दिल्ली के मुख्यमंत्री व उनके परिवार और मंत्री सहयोगियों के बिना मास्क वाले शादी समारोह के फोटो पार्टी के ट्विटर हैंडल से साझा किए थे। इसके बाद खुद पार्टी के प्रदेश मुखिया समेत अन्य प्रदेश प्रभारियों के बिना मास्क वाला फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

Nationalदिल्ली मेरी दिल्ली।

फटाफट वायरल

सोशल मीडिया के दौर में लोग न आव देखते हैं और ताव। बस फटाफट मुद्दों को वायरल करना चाहते हैं और राजनेताओं के मामलों में तो और रस आ जाता है। अगर एक पार्टी दूसरी पार्टी के बारे में कुछ ट्वीट करेगी तो दूसरी पार्टी भी दूसरा ट्वीट तैयार रखेगी। ऐसा ही एक मामला पिछले दिनों दिखा। दरअसल दिल्ली में मास्क लगाने की व्यवस्था सख्ती से लागू हो इसके लिए दिल्ली सरकार ने जुर्माने का प्रावधान लागू किया है।

इसके बाद हाल ही में भाजपा ने दिल्ली के मुख्यमंत्री व उनके परिवार और मंत्री सहयोगियों के बिना मास्क वाले शादी समारोह के फोटो पार्टी के ट्विटर हैंडल से साझा किए थे। इसके बाद खुद पार्टी के प्रदेश मुखिया समेत अन्य प्रदेश प्रभारियों के बिना मास्क वाला फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसके बाद से ही दबी आवाज में अब मामले को दबाते नजर आ रहे हैं। इस मामले में आम आदमी पार्टी को घेरने की नीति भाजपा को ही भारी पड़ गई।

पसीने छूटे

औद्योगिक महानगर में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू होने के बाद दुर्घटना होने जैसे साधारण मामलों तक की प्राथमिकी तक दर्ज कराने में लोगों के पसीने छूट रहे हैं। थानों में बैठे मुंशी और सिपाही शिकायत दर्ज कराने वालों को चक्कर कटाकर थकाने की जुगत लगा रहे हैं। नतीजतन अधिकांश मामलों में प्राथमिकी दर्ज कराने वाले पीड़ित थककर बगैर मामला दर्ज कराए घर बैठने को मजबूर हैं।

हाल ही में ऐसे ही एक सड़क दुर्घटना के मामले में नोएडा के थाना सेक्टर-39 में पीड़ित दो दिनों से शिकायत दर्ज कराने के लिए धक्के खाता रहा। सहानुभूति पूर्वक राय देकर पुलिस कर्मी उसे थाने और चौकी के बीच दौड़ाते रहे। दुर्घटना के बाद अस्पताल में भर्ती पीड़ित के सहयोगी ने पहले शिकायत देकर चौकी के पुलिस कर्मियों से मामला दर्ज करने को कहा। चौकी पर तैनात पुलिस कर्मियों ने उसे थाने भेज दिया। थाने वालों ने वहां से चौकी दौड़ा दिया।

कई चक्कर काटने और किसी परिचित की मदद के बाद जब प्राथमिकी दर्ज होने की नौबत आई, तो पीड़ित द्वारा लिखित शिकायत की जरूरत बताई गई। उसके सहयोगी ने अस्पताल पहुंचकर जब पीड़ित द्वारा लिखित शिकायत थाने में दी, तो थाने पर तैनात मुंशी ने नया बहाना बनाकर लौटा दिया कि कोर्ट पूछेगा कि अस्पताल में भर्ती व्यक्ति कैसे थाने में शिकायत देने आया। फिर सहयोगी ने अपनी तरफ से शिकायत दी, तो यह कहकर मामला दर्ज नहीं किया चूंकि सहयोगी पीड़ित के साथ दुर्घटना के समय मौजूद नहीं था, लिहाजा कोर्ट में मदद नहीं मिलेगी। हारकर पीड़ित ने एचएसओ के परिचित से फोन कराया, तब जाकर शिकायत दर्ज हो सकी।

भाजपा की चिंता

दूर के ढोल सुहाने होते हैं। सच्चाई तो पास जाने वाला जानता है। देश को दिख रहा हा कि भाजपा में सभी की बल्ले-बल्ले है तभी तो पार्टी देश में परचम लहरा रही है। लेकिन जरूरी नहीं कि सामने से जो दिख रहा है वह सब ठीक ही है। नमूने के तौर पर भाजपा की स्थिति दिल्ली में देख सकते हैं। जैसे-जैसे निगम चुनाव नजदीक आ रहे हैं। भाजपा की चिंता बढ़ रही है।

इसमें सबसे बड़ी चिंता यह है कि खुद पार्टी के ही नेता मानते हैं कि स्थानीय स्तर पर संगठन व पार्टी के बीच काफी दूरियां हैं। ये दूरियां पाटना ही पार्टी के लिए परेशानियां खड़ी कर रही है। हाल ही में संगठन व पार्षदों की एक बैठक में संगठन ने दबी आवाज में अपनी यह शिकायत उठाई है।

धूल-मिट्टी से परहेज

देश की सबसे पुरानी पार्टी के नेताओं को जमीन पर उतरना अच्छ नहीं लगता। पार्टी भले ही दिल्ली में तीसरे नंबर पर पहुंच गई हो। पर पार्टी के अधिकतर वरिष्ठ नेता जमीन पर उतर कर काम करने को तैयार नहीं। माना जा रहा है कि इन नेताओं को आज भी धूल-मिट्टी से परहेज है। एक ओर देश के अन्नदाता कड़ाके की ठंड में सड़कों पर डटे हैं।

इस पार्टी के नेता सोशल मीडिया पर उनके समर्थन में अभियान चलाकर उनके साथ होने का आभास दिला रहे हैं। किसान नेताओं को लगा था कि भाजपा की केंद्र सरकार भले ही उनका साथ ना दे। पर विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस तो उनका साथ जरूर देगी। पर दिल्ली कांग्रेस के नेताओं का व्यवहार किसानों के समर्थन को लेकर जैसा रहा है।

उससे तो यही लगता है कि जमीन पर उतर कर काम करने वाले कम, दफ्तर में बैठकर राजनीति करने वालों की संख्या पार्टी में कहीं अधिक है। इससे तो यही लगता है कि नेता और कार्यकर्ता मानते हैं कि जमीन पर उतरने से कपड़े खराब होगें और दाग लगेंगे। अच्छा है वातानूकुलित रूम में बैठ कर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट कर दें।

जरा संभल के

राजधानी में किसानों का आंदोलन चल रहा है। किसानों के मामले पर चर्चाओं में सरकारी व गैर सरकारी दोनों तरह के वर्ग की राय एकदम अलग है। सरकारी महकमा खुल कर राय जाहिर करने से बच रहा है। अगर गलती से किसी किसान के पक्ष में बोल दिया तो दूसरे उसके बचाव में खडेÞ हो जाते हैं। एक वाक्या ऐसे ही एक सरकारी विभाग का देखने को मिला जिसमें एक कर्मी ने किसानों के पक्ष में कविता लिख दी तो उसके साथी ने तुरंत उसे टोकते हुए ध्यान दिलाया-अरे सरकारी महकमें में हो, जरा संभल के।

-बेदिल

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