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कांग्रेस नेताओं ने लिखी हार की पटकथा, कमजोर नेतृत्व और आंतरिक कलह की हुई शिकार

मुख्यमंत्री केजरीवाल सरीखे मजबूत चेहरे को टक्कर देने के लिए कांग्रेस ने पूर्व सांसद व पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद को दिल्ली की बागडोर सौंपने का एक प्रकार से निर्णय कर लिया था।

rahul gandhiराहुल गांधी। (इमेज सोर्स- ट्विटर)

लगातार डेढ़ दशक तक हुकूमत चला चुकी कांग्रेस इस चुनाव के बाद सियासी तौर पर आइसीयू में पहुंच गई है। दिलचस्प यह भी है कि दिल्ली की इस करारी हार की पटकथा खुद पार्टी के ही दिग्गजों ने चुनाव से पहले ही लिख दी थी। रही सही कसर पार्टी के नेताओं की आपसी लड़ाई व कलह ने पूरी कर दी।
सेहत खराब होने का हवाला देकर जब अजय माकन ने 2018 में ही तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अपना इस्तीफा दिया, तो पार्टी कई महीने तक यह तय ही नहीं कर पाई कि अगला प्रदेश अध्यक्ष किसे बनाया जाए।

इस्तीफा स्वीकार करने के बाद पार्टी हाईकमान ने 80 साल की उम्र में पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पार्टी की कमान थमा दी गई। उसका असर भी दिखा और लोकसभा चुनाव में पार्टी दूसरे नंबर पर आ गई। लेकिन दीक्षित की मौत के बाद पार्टी एकबार फिर से लड़खड़ा गई। पार्टी हाईकमान एकबार फिर से महीनों तक इस फैसले को दबाकर बैठा रहा। फौरी तौर पर वही तीन कार्यकारी अध्यक्ष काम करते रहे जिनको शीला दीक्षित के सहयोग के लिए नियुक्त किया था।

सूत्रों की मानें तो मुख्यमंत्री केजरीवाल सरीखे मजबूत चेहरे को टक्कर देने के लिए कांग्रेस ने पूर्व सांसद व पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद को दिल्ली की बागडोर सौंपने का एक प्रकार से निर्णय कर लिया था। मूल रूप से बिहार से ताल्लुक रखने वाले कीर्ति को दिल्ली कांग्रेस का मुखिया बनाने के पीछे एक मजबूत दलील यह थी कि राजधानी में बड़ी संख्या में रहने वाले पूर्वांचल के वोटरों को वे कांग्रेस की ओर लाने में सक्षम होंगे। लेकिन दिल्ली के कांग्रेसी धुरंधरों को जैसे ही कीर्ति के नाम की जानकारी मिली, सभी उनके खिलाफ एकजुट हो गए और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के करीबी वरिष्ठ नेताओं को यह संदेश भेज दिया गया कि यदि पार्टी ने कीर्ति आजाद को कमान सौंपी तो दिल्ली में बगावत तय है।

ये वही नेता थे तो जो खुद किसी कीमत पर अध्यक्ष बनने या दूसरे शब्दों में कहें तो हार की टोपी पहनने को तैयार नहीं थे। चुनाव सामने देख पार्टी हाईकमान ने भी कदम वापस खींच लिए और 72 साल के सुभाष चोपड़ा को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया गया और आजाद की बगावत थामने के लिए उन्हें चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बना दिया गया।

चोपड़ा कहते हैं कि अध्यक्ष बनने के बाद वे ठीक से सोए नहीं, दिन रात मेहनत करते रहे। यह बात सही भी है लेकिन यह भी सच है कि नियुक्ति के चार दिन बाद से ही उनकी कीर्ति आजाद और दिल्ली के प्रभारी पीसी चाको से ठन गई थी। और तो और ये तीनों नेता कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के सामने ही लड़ पड़े थे। ऐसा कहा जा रहा है कि कांग्रेस को यह अंदेशा पहले से हो गया था कि उसके लिए अपने बूते दिल्ली का चुनाव जीतना संभव नहीं है और दम लगाकर चुनाव लड़ने का मतलब था, सीधे-सीधे भाजपा को फायदा पहुंचाना, जो उसे किसी भी सूरत में मंजूर नहीं था। यही वजह रही कि कांग्रेस के तमाम वरिष्ठ नेता चुनाव प्रचार में निकले ही नहीं। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि कांग्रेस कहीं चुनाव प्रचार भी कर रही थी।

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