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निगम उप चुनाव टला

नगर निगमों के 13 सीटों के उप चुनाव टल गए। दिल्ली चुनाव आयोग पहले खुद उप चुनाव करवाने के लिए बेताब था, अब इस बारे में दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका लंबित होने के बहाने चुनाव न करवाने की पूरी भूमिका बना ली। उसके लिए निगम की सीटों का परिसीमन करने की प्रक्रिया शुरू कर दी।

Author नई दिल्ली | Updated: September 30, 2015 3:34 PM

नगर निगमों के 13 सीटों के उप चुनाव टल गए। दिल्ली चुनाव आयोग पहले खुद उप चुनाव करवाने के लिए बेताब था, अब इस बारे में दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका लंबित होने के बहाने चुनाव न करवाने की पूरी भूमिका बना ली। उसके लिए निगम की सीटों का परिसीमन करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। मुख्य चुनाव आयुक्त राकेश मेहता ने कहा कि परिसीमन करने के लिए शुरूवाती काम करने के बाद कमेटी बनाने का काम होगा। इसे जुलाई 2016 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

यह परिसीमन 2006 में हुए परिसीमन के बाद होगी। तब 2001 की जनगणना के हिसाब से परिसीमन हुआ था इस बार 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का परिसीमन होगा। वैसे तो दिल्ली की आबादी दो करोड़ के करीब मानी जा रही है लेकिन 2011 की जनगणना में आबादी 1,67,52,894 बताई गई है। इस हिसाब से नई दिल्ली और दिल्ली छावनी विधान सभा सीटों को छोड़कर दिल्ली भर में 61591 की औसत से सीटों का परिसीमन होने वाला है। इसमें दस फीसद की छूट रहती है। नए परिसीमन के आधार पर ही 2017 के शुरू में नगर निगमों के चुनाव करवाने होंगे।

चुनाव आयोग ने तीनों निगमों की 2013 और 2015 के विधान सभा चुनावों में 13 निगम पाषदों के विधायक बनने से खाली हुई सीटों पर उप चुनाव करवाने की काफी दिनों से तैयारपी कर रखी थी। चुनाव के लिए करीब दो हजार कर्मचारियों और बीस करोड़ रूपयों की जरूरत होगी। इसके लिए उन्होंने फाइस दिल्ली के मुख्यमंत्री के पास काफी समय पहले भेज दी थी। आयोग चाहता था कि सितंबर के शुरू में ही उप चुनावों की अधिसूचना जारी हो जाए ताकि पर्वों का सिलसिला शुरू होने से पहले चुनाव संपन्न हो जाएं। 2012 के आम चुनाव में तीनों निगमों में भाजपा की जीत हुई थी। 2013 के विधान सभा चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला और 2014 के लोक सभा चुनाव में दिल्ली की सातों सीटें भाजपा जीती लेकिन 2015 के विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी(आप) को 70 में से 67 सीटें मिली थी।

2013 के विधान सभा चुनाव में निगम के छह पार्षद- महेन्द्र नागपाल(वजीरपुर),राम किशन सिंघल(शालीमार बाग),राजेश गहलौत(मटियाला),अनिल शर्मा(नानक पुरा), जितेन्द्र सिंह शंटी(झिलमिल) और विनोद कुमार बिन्नी(खिचड़ी पुर) के विधायक बनने से ये सीटें खाली हुई थी।

निगम के विधान में लोक सभा और विधान सभा जैसी अधिकतम छह महीने में उप चुनाव करवाने की बंदिश नहीं है लेकिन जल्दि से जल्दि चुनाव करवाने का विधान है। राकेश मेहता ने कहा कि दिसंबर 2013 में नई सरकार बनने और थोड़े ही दिनों में राष्ट्रपति शासन लगने के चलते उन्होंने नई विधान सभा चुनाव की इंतजार करना तय किया था। फरवरी 2015 में विधान सभा के मध्यावधि चुनाव में सात और पार्षद -सहीराम पहलवान(तेखंड),नरेश बालियान(नवादा),प्रमिला टोकस(मुनीरका),करतार सिंह तंवर(भाटी), महेन्द्र यादव(विकास नगर), रघुविंदर शौकीन(कमरूद्दीन नगर) और इमरान हुसेन(बल्ली मरान)के विधायक बनने से सात और सीटें खाली हो गई।

उन्होंने अप्रैल में दिल्ली सरकार को उप चुनाव को लिखा तो कहा गया कि अभी बजट आना बाकी है। जून में बजट आने के बाद से वे 13 सीटों के उप चुनाव करवाने के लिए दिल्ली सरकार के हरी झंडी के इंतजार में थी। चुनाव आयोग तो स्वतंत्र रूप से चुनाव का फैसला करता है लेकिन चुनाव के लिए पैसे और कर्मचारी तो सरकार ही उपलब्ध कराती है। विधान में यह भी है कि अगर आम चुनाव में छह महीने से कम का समय हो तो उप चुनाव को टाला जा सकता है लेकिन अभी आम चुनाव में डेढ़ साल का समय है। इसी बीच इन उप चुनावोंके बारे में दिल्ली हाई कोर्ट में डली एक निजी याचिका पर सुनवाई शुरू हुई। उसकी अगली तारीख 2 नवंबर है। वैसे अदालत के निर्देश के हिसाब से चुनाव आयोग या दिल्ली सरकार को फैसला लेना पड़ेगा लेकिन इसी दौरान नए परिसीमन का काम शुरू होने से उप चुनाव टलते दिख रहे हैं।

चुनाव आयुक्त सीधे तौर पर तो यही कह रहे हैं कि उप चुनाव का मामला अदालत में लंबित है इसलिए फैसला आने तक चुनाव के बारे में कुछ नहीं किया जा सकता है। फैसला आने से पहले नए परिसीमन की तैयारी शुरू करके उप चुनाव की संभावनों को पूरी तरह से खारिज करने पर राकेश मेहता सीधे तौर पर कुछ कहने के बजाए कहते हैं कि विधान के मुताबिक 2017 का निगम चुनाव नए परिसीमन के हिसाब से किया जाना है। उसकी प्रक्रिया में काफी समय लगता है, इसलिए शुरूवाती काम किया जा रहा है। वैसे माना जा रहा है कि आम आदमी पार्टी(आप) की सरकार पहले दिन से ही उप चुनाव करवाने के पक्ष में नहीं थी। इतना ही नहीं इस बार परिसीमन की प्रक्रिया में भी कई बदलाव होने वाले हैं।

मनोज मिश्र

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