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दिल्ली चुनाव: दीवाने-खास से पहुंचे दीवाने-आम तलक

बजट के महीने में देश के वित्त मंत्री को अगर दिल्ली चुनाव के लिए भाजपा मुख्यालय में बैठना पडे, सरकार की नीतियां चकाचौंध भारत के सपनों को उड़ान देने लगें और चुनावी प्रचार की जमीन, पानी-सड़क, बिजली से आगे बढ़ नहीं पा रही हो तो संकेत साफ है- उपभोक्ताओं का भारत दुनिया को ललचा रहा […]

बजट के महीने में देश के वित्त मंत्री को अगर दिल्ली चुनाव के लिए भाजपा मुख्यालय में बैठना पडे, सरकार की नीतियां चकाचौंध भारत के सपनों को उड़ान देने लगें और चुनावी प्रचार की जमीन, पानी-सड़क, बिजली से आगे बढ़ नहीं पा रही हो तो संकेत साफ है- उपभोक्ताओं का भारत दुनिया को ललचा रहा है और न्यूनतम की जरूरत का संघर्ष सत्ता को चुनाव में बहका रहा है।

दोनों खेल एक साथ कैसे चल सकते है या दो भारत को एक साथ जीने की कला जिस महारथी में होगी वहीं मौजूदा वक्त में सबसे ताकतवर राजनेता होगा। सरकार उसी की होगी, क्योंकि यह वाकई कल्पना से परे है कि दिल्ली चुनाव के हर मुद्दे बिजली, पानी, सड़क, घर, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर केबिनेट मंत्री हर प्रेस कांफ्रेंस करने के लिए उपलब्ध है। महीने भर बाद जिस बजट का इंतजार देश कर रहा है, उससे उस भारत को कुछ भी लेना-देना नहीं होता है जो चुनाव में जीत-हार तय करता है। जो मंत्री रायसीना हिल्स पर नार्थ या साउथ ब्लाक में बैठकर दुनिया को जिस भारत से रूबरू कराता है, वही जब चुनाव के लिए सड़क पर प्रचार के लिए उतरता है तो उसकी भाषा उस दुनिया से बिल्कुल अलग होती है, जिसके बीच भारत चहक रहा है।

संकेत साफ है कि चुनावी जीत सरकार का पहला धर्म है। चुनाव की जीत-हार देश के लिए मर मिटने की सियासत है। यानी सत्ता की ताकत सत्ता में बने रहने के उपाय खोजने से आगे जाएगी नहीं। भारत में राजनीतिक सत्ता के आगे सारा ज्ञान बेमानी है और चुनाव जीतना ही ज्ञान के सागर में डुबकी लगाना है।

यह साफ है कि भारत की मौजूदा सत्ता जनादेश के आसरे कोई भी निर्णय लेकर उसे लागू कराने में सक्षम है जो 1991 के बाद से कभी संभव नहीं हुआ था। और दूसरा भारत का बाजार अमेरिका सरीखे देश की आर्थिक मुश्किलों को भी दूर कर सकता है। भारत के भीतर बसने वाले इस दो भारत का ही कमाल है कि भारत दुनिया का एकमात्र देश है, जहां आने वाले वक्तमें रेलवे में पांच से 10 लाख करोड़ का निवेश होना है। सड़क निर्माण में दो लाख करोड़ से ज्यादा का निवेश होना है।

बंदरगाहों को विकसित करने में भी 3-4 लाख करोड़ लगेंगे। इसी तरह सैकडों एयरपोर्ट बनाने में भी तीन से चार लाख करोड़ का निवेश किया जाना है। वहीं भारतीय सेना की जरूरत जो अगले दस बरस की है, वह भी करीब 130 बिलियन डॉलर की है। यानी पहली बार भारत सरकार की आस विदेशी निवेश को लेकर लगी है तो दुनिया की आस भारत में पैसा लगाने को लेकर जगी है। वजह यह कि प्रधानमंत्री मोदी ने खुले संकेत दिए हैं कि भारत विकास के रास्ते को पकड़ने के लिए आर्थिक सीमाएं तोड़ने को तैयार है और दुनिया भर के देश चाहें तो भारत में पूंजी लगा सकते हैं।

असल में यह रास्ता मोदी सरकार की जरूरत है और यह जरूरत विकसित देशों को भारत में लाने को मजबूर करेगा। विकसित देशों की मजबूरी है कि वे अपने देश में बुनियादी ढांचे का काम पूरा कर चुके हंै और तमाम विदेशी कंपनियों के सामने मंदी का संकट बरकरार है। यहां तक की चीन के सामने भी संकट है कि अगर अमेरिका के आर्थिक हालात नहीं सुधरे तो फिर उसके यहां उत्पादित माल का होगा क्या। ऐसे में ‘मेक इन इंडिया’ का रास्ता विदेशी निवेश के लिए खुलता है तो अमेरिका, जापान, फ्रांस या चीन सरीखे देश कमाई भी कर सकते हैं।

अब जरा कल्पना कीजिए दुनिया के तमाम ताकतवर या कहें जो विकसित देश भारत में निवेश करना चाहते हैं, उनके आसरे दिल्ली की झुग्गी बस्तियों का कोई रास्ता निकलेगा नहीं। बिजली, पानी, सड़क की लड़ाई थमेगी नहीं। बल्कि इसके बाद देश में खेती और ग्रामीण भारत के सामने अस्तित्व का संकट जरूर मंडराने लगेगा। मौजूदा सरकार जिस रास्ते पर निकल रही है उसमें वह गरीब भारत या फिर किसान, मजदूर या ग्रामीण भारत की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में कैसे काम करेगी, यह किसी बालीवुड की फिल्म की तरह लगता है। फिल्मों में ही नायक तीन घंटे में ‘पोयटिक जस्टिस’ कर देता है। वैसे यह तर्क दिया जा सकता है कि दुनिया की पूंजी जब भारत में आएगी तो उसके मुनाफे से ग्रामीण भारत का जीवन भी सुधारा जा सकता है।

यानी मोदी सरकार का अगला कदम गरीब भारत को मुख्यधारा से जोड़ने का होगा। और असल परीक्षा तभी होगी। लेकिन यह परीक्षा तो हर प्रधानमंत्री ने अपनी सत्ता के लिए दी ही है। उसे कटघरे में खड़ा भी किया गया है। नेहरू ने लालकिले से पहले भाषण में नागरिकों को प्रदेश, भाषा, संप्रदाय, जाति से ऊपर मुल्क को रखने की सलाह दी थी। वहीं 15 अगस्त 1947 को कोलकाता के बेलीघाट में अंधेरे घर में बैठे महात्मा गांधी ने गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी को यह कहकर लौटा दिया कि अंधेरे को रोशनी की जगमग से दूरकर आजादी के जश्न का वक्त अभी नहीं आया है।

सत्तर के दशक में जिन खनिज संसाधनों को इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय संपत्ति माना, उसे सोनिया गांधी के दौर में मनमोहन सिंह ने मुनाफे के धंधे के लिए सबसे उपयोगी माना। बाजार सिर्फ जमीन के नीचे ही नहीं बना बल्कि ऊपर रहने वाले ग्रामीण आदिवासियों, खेतिहर किसानों और मजदूरों को भी लील गया। लेकिन ताकतवर राजनीतिक सत्ता ने इसे दुनिया के बाजार के सामने भारत को मजबूत और विकसित करने का ऐसा राग छेड़ा कि देश के तीस फीसद उपभोक्ताओं को खुले तौर पर लगने लगा कि बाकी 70 फीसदी आबादी के जिंदा रहने का मतलब क्या है। सरोकार तो दूर, संवाद तक खत्म हुआ।

मोदी सरकार कुछ कदम और आगे बढ़ी। लेकिन पहली बार उसने इस हकीकत को समझा कि चुनावी जीत से बड़ी कोई आॅक्सीजन होती नहीं है और चुनावी जीत ही हर कमजोरी को छिपाते हुए सत्ता का विकल्प कभी खड़ा होने नहीं देती है। यानी बीते 67 बरस की सबसे बड़ी उपलब्धि देश में राजनीतिक ताकत का न सिर्फ बढ़ना है, बल्कि राजनीतिक सत्ता को ही हर क्षेत्र का पर्याय मानना भी है। असर यही है कि 1947 में भारत की जितनी जनसंख्या थी, उसका तीन गुना हिंदुस्तान 2015 में दो जून की रोटी के लिए राजनीतिक सत्ता की तरफ टकटकी लगाकर देखता है। इसी का असर है कि दिल्ली में जो भी सरकार बने या जिस भी राजनीतिक दल को जनता वोट दे, हर किसी को केंद्र की सत्ता के पलटने के हर अंदाज तो याद हैं।

फिर 2014 के चुनाव में जिस जनादेश का गुणगान दुनिया भर में हो रहा है, उसी जनादेश से बनी सरकार की सांस चुनाव के न्यूनतम नारों को पूरा करने में क्यों फूल रही है। और दिल्ली में न्यूनतम जरूरतें पूरी हो जाएंगी, यह कहने के लिए और कोई नहीं केंद्र सरकार के दीवाने-खास के केबिनेट मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक दीवाने-आम हो चले हैं। चुनावी जीत असफल नीतियों पर भी परदा डाल देती है यह देश की सियासत की नई रवायत है।

 

पुण्य प्रसून वाजपेयी (टिप्पणीकार आजतक से संबद्ध हैं)

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