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दिल्ली चुनाव: मतदान से पहले मात के अंदेशे में घिरी भाजपा

चुनाव परिणाम आना तो दूर रहा, अभी तक दिल्ली विधानसभा चुनाव में मतदान भी नहीं हुआ है, पर प्रचार के अंतिम चरण में भाजपा रक्षात्मक भूमिक में आ गई है। वह अपनी हार स्वीकारती नजर आ रही है। अपेक्षित चुनाव नतीजों के लिए उसने अपनी रणनीति तैयार करनी शुरू कर दी है। हालात इतने बदतर […]

Author February 6, 2015 11:16 am
चुनाव परिणाम आना तो दूर रहा, अभी तक दिल्ली विधानसभा चुनाव में मतदान भी नहीं हुआ है, पर प्रचार के अंतिम चरण में भाजपा रक्षात्मक भूमिक में आ गई है। (फ़ोटो-पीटीआई)

चुनाव परिणाम आना तो दूर रहा, अभी तक दिल्ली विधानसभा चुनाव में मतदान भी नहीं हुआ है, पर प्रचार के अंतिम चरण में भाजपा रक्षात्मक भूमिक में आ गई है। वह अपनी हार स्वीकारती नजर आ रही है। अपेक्षित चुनाव नतीजों के लिए उसने अपनी रणनीति तैयार करनी शुरू कर दी है। हालात इतने बदतर हैं कि राम की पार्टी को राम-रहीम की शरण में जाना पड़ गया है।

चंद दिन पहले तक आक्रामक रुख अपनाती आई भाजपा का रवैया अचानक बदल गया है। ऐसा लगता है कि वह खुद अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नहीं है। इसलिए उसके वरिष्ठ नेताओं के बयान बदलने लगे हैं। पहले मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार किरण बेदी ने, एक इंटरव्यू में यह पूछने पर कि चुनाव हार जाने पर वे क्या करेंगी, कहा कि उनके पास हावर्ड व आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों से भाषण देने के निमंत्रण हैं। वे हारने पर वहां भाषण देने चली जाएंगी। ऐसा कहकर उन्होने जहां एक ओर यह माना कि वे हार भी सकती हैं, वहीं यह भी साबित कर दिया कि वे राजनीति में डैपुटेशन पर आई हैं।


यह किसी से छिपा नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना चुके हैं। प्रचार की सारी कमान उन्होंने ही संभाली हुई है।

इसलिए हार का मतलब उनकी सरकार के कामकाज के प्रति दिल्ली के मतदाता की प्रतिक्रिया मानी जाएगी। दिल्ली में मतदान से दो दिन पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि राजधानी के चुनाव परिणाम को नरेंद्र मोदी सरकार के कामकाज पर जनमत संग्रह के तौर पर नहीं देखा जाए।

विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को स्पष्ट बहुमत दर्शाने के कई सर्वेक्षणों को खारिज करते हुए शाह ने विश्वास व्यक्त किया कि दिल्ली में काफी बड़े बहुमत से भाजपा सरकार बनाएगी और किरण बेदी मुख्यमंत्री होंगी। यह सही है कि यह मुख्यमंत्री पद के लिए चुनाव है।


वहीं केंद्रीय मंत्री एम वेंकैया नायडू ने कहा कि प्रत्येक विधानसभा चुनाव को प्रधानमंत्री पर जनमत से जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है। मेरी टिप्पणी को अलग मायने देने के लिए उन लोगों ने इसे घुमा दिया है जिन्हें दिल्ली के चुनाव में अपनी हार निश्चित लग रही है। यह चुनाव मुख्यमंत्री के लिए है, प्रधानमंत्री के लिए नहीं। नरेंद्र मोदी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। यह राज्य का चुनाव है। आप मुख्यमंत्री चुनने जा रहे हैं, प्रधानमंत्री नहीं। यह भाजपा बनाम शेष है।

इससे पहले नरेंद्र मोदी के भाषणों में चिंता की झलक देखी जा सकती है। वे उत्तर पूर्व के लोगों को भाजपा के दृष्टिपत्र में प्रवासी लिखे जाने के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांग चुके हैं। तमाम चुनाव सर्वेक्षणों मे पार्टी की हार दिखाए जाने से वे इतने ज्यादा खफा हैं कि उन्हें यह कहने के लिए बाध्य होना पड़ा कि कुछ बाजारू लोग सर्वेक्षण करवा रहे हैं। जब मैं वाराणसी से चुनाव लड़ा था, तब भी ऐसे सर्वेक्षणों में मेरे तीन लाख मतों से हारने की बात कही गई थी। आप के प्रति सरकारी कर्मचारियों के बढ़ते झुकाव को देखते हुए उन्हें यह भी कहना पड़ा कि कुछ विरोधी दल रिटायर होने की उम्र 60 से 58 साल करने की अफवाह उड़ा रहे हैं।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी लोकसभा चुनाव मे मोदी द्वारा विदेशों से काला धन वापस लाने और हर नागरिक के खाते में 15-15 लाख रुपए जमा करवाने के वादे पर सफाई देते हुए कह रहे हैं कि यह तो बस एक चुनावी जुमला था। इसका मतलब गरीबों का कल्याण था। मालूम हो कि प्रचार के दौरान अरविंद केजरीवाल ने मोदी को यह कहते हुए घेरा था कि उन्होंने करोड़ो लोगों के खाते तो खुलवा दिए पर उसमें 15 लाख रुपए जमा नहीं हुए।

उधर वरिष्ठ पार्टी सासंद शत्रुघ्न सिन्हा का यह कहना कि हर तरफ केजरीवाल छाया हुआ है, बहुत मायने रखता है। मोदी की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा है कि नकारात्मक राजनीति नहीं करनी चाहिए। अगर जीत के लिए नेता को ताली मिलती है तो हार के लिए उसे गाली भी मिलनी चाहिए। स्पष्ट है कि वे क्या कहना चाहते हैं।

नैतिकता, शुचिता व पारदर्शिता की दुहाई देती आई भाजपा की बदहवासी का अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि महिलाओं के शोषण, पत्रकार की हत्या, व सैकड़ों की तादाद में पुरुषों को नपुंसक बनाने के आरोप में घिरे डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत सिंह राम रहीम का उसे सहारा लेना पड़ा है। उनका दावा है कि डेरे के 12 लाख समर्थक भाजपा को वोट देंगे। मालूम हो कि उनकी विवादास्पद फिल्म मैसेंजर आफ गॉड, जिस पर सेंसर बोर्ड ने रोक लगा दी थी, उसे अपीलेंट ट्रिब्यूनल ने हरी झंडी दिखा दी है। भाजपा के ही कुछ नेता यह कहने लगे हैं कि अब बाबा मैसेंजर आॅफ भाजपा बन गए हैं। जो पार्टी कभी राम का सहारा लेती थी उसे अब राम-रहीम का सहारा लेना पड़ रहा है।

 

 

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