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दिल्ली के दंगल में उलटा पड़ रहा भाजपा का दांव

दिल्ली में भाजपा के सभी दांव उलटे पड़ रहे हैं। लोकसभा चुनाव के समय या उसके तुरंत बाद दिल्ली विधानसभा का चुनाव एकतरफा हो सकता था। तब भाजपा नेतृत्व जोड़-तोड़ करके सरकार बनाए या विधानसभा चुनाव कराने के विकल्प पर फैसला पांच महीने तक नहीं ले पाई। इतना ही नहीं दो बार में हुए चार […]

Author January 30, 2015 7:00 PM
Delhi Election: पूर्व पुलिस अधिकारी ने कहा कि अन्ना आंदोलन के दौरान भी उन्हें उनकी नकारात्मकता महसूस होती थी।(तस्वीर-पीटीआई)

दिल्ली में भाजपा के सभी दांव उलटे पड़ रहे हैं। लोकसभा चुनाव के समय या उसके तुरंत बाद दिल्ली विधानसभा का चुनाव एकतरफा हो सकता था। तब भाजपा नेतृत्व जोड़-तोड़ करके सरकार बनाए या विधानसभा चुनाव कराने के विकल्प पर फैसला पांच महीने तक नहीं ले पाई। इतना ही नहीं दो बार में हुए चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के साथ भी चुनाव कराने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। उनमें तीन में भाजपा की सरकार बन गई और चौथे जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने में भाजपा लगी हुई है। भाजपा नेताओं को लगता था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। इसलिए चाहे जब चुनाव होंगे भाजपा की एकतरफा जीत होगी।

भाजपा की प्रतिद्वंद्वी आम आदमी पार्टी (आप) के चुनाव अभियान को भाजपा नेता गंभीरता से नहीं ले रहे थे। कहा जा रहा था कि प्रधानमंत्री के नाम पर ही चुनाव होना है, किसी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित नहीं करना है। संसद के शीतकालीन सत्र में देश भर के भाजपा सांसदों से दिल्ली भर में नुक्कड़ सभा कराई गई। उसके बेअसर होने पर कहा गया कि मोदी की एक सभा ही विरोधी दलों के प्रचार की हवा निकाल देगी, हुआ इसका उलटा। दस जनवरी की प्रधानमंत्री की सभा में भीड़ कम आने से भाजपा नेताओं के हाथ से तोते उड़ गए।

आनन-फानन में पूर्व आइपीएस अधिकारी किरण बेदी को 15 जनवरी को भाजपा में शामिल कराकर उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। बेदी की घोषणा से आप के लोगों को एक झटका तो लगा क्योंकि बेदी उनकी ही पुरानी सहयोगी थीं। लेकिन वे तुरंत संभल गए। आप नेता अरविंद केजरीवाल की सभा में बदस्तूर भारी भीड़ का आना जारी रहा। भाजपा का सारा गणित कांग्रेस की ताकत बढ़ने से भी था। वैसे 24.50 फीसद वोट कांग्रेस को पिछले विधानसभा चुनाव में आने पर भी त्रिशंकु विधानसभा बनी थी। चार सीटों की कमी से भाजपा की सरकार नहीं बन पाई। फिर भी माना जा रहा था कि कांग्रेस के मुकाबले में आने से आप के वोट बंटेगे और कम वोट लाकर भी भाजपा पूर्ण बहुमत पा लेगी। तेजतरार्र पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन को 12 जनवरी को कांग्रेस की कमान मिलने पर ऐसा वातावरण बनता दिख रहा था। एक तो मीडिया में आ रहे सर्वेक्षणों ने और कांग्रेस के आपसी कलह ने उसे कमजोर हालत में पहुंचा दिया है। वैसे माना जाता है कि कांग्रेस के उम्मीदवार आखिरी हफ्ते में ही चुनाव लड़ते हैं, वह आखिरी हफ्ता भी आने ही वाला है।

जो गलती पिछली बार प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल के रहते चुनाव से दो महीने पहले डाक्टर हर्षवर्धन को मुख्यमंत्री घोषित करके भाजपा ने की थी उससे बड़ी गलती इस बार चुनाव से तीन हफ्ते पहले किरण बेदी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाकर की है। यह सही है कि मोदी का भाजपा पर पूरा कब्जा हो गया है और कोई भी इधर-उधर करने की कोशिश करेगा तो उसे पैदल कर दिया जाएगा। डाक्टर हर्षवर्धन तो पार्टी के पुराने नेता थे। 2008 के चुनाव में उनके प्रदेश अध्यक्ष रहते विजय कुमार मल्होत्रा को भाजपा ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था। तब भाजपा 33 फीसद से ज्यादा वोट लेकर 32 सीट जीत पाई थी। किरण बेदी तो बाहरी हैं। पार्टी में आते ही वे चिरपरिचित पुलिस अधिकारी के अंदाज में लोगों को निर्देश देने लगी हैं। पार्टी के अनुशासन का डंडा चलते रहने के बावजूद हर इलाके में भारी भीतरघात हो रहा है। अनेक बाहरी लोगों को पार्टी में शामिल कराते ही सीधे टिकट पकड़ा दिया गया है।

भाजपा हाईकमान यानी मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को पता चल गया कि बेदी भी जीत की गारंटी नहीं हैं। अब वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली की अगुआई में दो दर्जन मंत्रियों को दिल्ली में लगाया गया है। पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्रियों के अलावा वहां के अनेक मंत्री दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं। खुद प्रधानमंत्री दिल्ली के चारों कोनों में चार सभाएं करने वाले हैं। गली-गली भाजपा के बड़े नेता घूमने लगे हैं लेकिन उनका मतदाताओं से कितना संपर्क है या वे आप के नेता केजरीवाल की कितनी काट कर पाते हैं यह आने वाले दिनों में पता चलेगा। पहले कहा जा रहा था कि काफी पहले से चुनाव अभियान चलाने से आप के उम्मीदवार थक जाएंगे। उनके पास पैसे कम हैं। वे भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों का मुकाबला नहीं कर पाएंगे। चाहे चालाकी से या राजनीतिक मजबूरी से आप ने भी कई साधन-संपन्न उम्मीदवार उतारे हैं। उनका लाभ पार्टी को आर्थिक मोर्चे पर मिल रहा है।

लोकसभा चुनाव से अब तक भाजपा दिल्ली में प्रयोग ही कर रही है। पहले उसके नेता सरकार बनाने में लगे, फिर जगहंसाई और भविष्य के चुनाव पर गलत असर होने के डर से भाजपा ने जोड़-तोड़ करके दिल्ली में सरकार बनाने के बजाए विधानसभा भंग कराकर मध्यावधि चुनाव में जाना तय कर लिया। तीन नवंबर को भाजपा संसदाय बोर्ड ने 25 नवंबर को होने वाले तीन विधानसभा सीटों के उम्मीदवार तय करने के बजाए दिल्ली में चुनाव में जाना तय किया। उस पर मंत्रिमंडल की मुहर चार को लगी। आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस ने तो शुरू से ही जोड़-तोड़ से सरकार बनाने के बजाए मध्यावधि चुनाव की मांग की थी। आप की ही याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में विधानसभा भंग करने पर सुनवाई चल रही थी।

सुप्रीम कोर्ट ने ही उपराज्यपाल की सबसे बड़े दल भाजपा की सरकार बनाने की संभावनाओं पर चर्चा करने के लिए 30 अक्तूबर की तारीख पर दस नवंबर तक का समय दिया था। अदालत की अगली सुनवाई 11 नवंबर को होनी थी। भाजपा का संकट यह था कि अगर 11 तक सरकार नहीं बनती है तब भी उसे चुनाव में ही जाना होगा और यह कोई गारंटी नहीं थी कि तीनों उपचुनाव वह जीत ही लेती। विधानसभा भंग होने के बाद से आप ने तो चुनाव अभियान में तेजी ला दिया और भाजपा प्रयोग में लग गई। अब तक के अनेक प्रयोगों के बावजूद भाजपा का राजनीतिक ग्राफ लगातार गिर रहा है। इससे भाजपा नेताओं की परेशानी लगातार बढ़ रही है। दिल्ली का चुनाव तो आप और कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण है ही भाजपा और खास करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है।

 

मनोज मिश्र

 

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