चुनावी दांवः पूर्वांचलियों के हाथ दिल्ली का चुनाव

दिल्ली की राजनीति का गणित बदलने वाले पूर्वांचल (बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड आदि के मूल निवासी) के प्रवासियों का दस फरवरी को होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव में अहमियत बढ़ गई है। तभी तो केंद्र की भाजपा की अगुआई वाली राजग सरकार ने दिल्ली की करीब 1800 कॉलोनियों में मालिकाना हक देने के लिए संसद में कानून बना डाले।

वैसे तो पूर्वांचल के माने जाने वाले नेता अलग-अलग भूमिका में अपने बूते दिल्ली की राजनीति में रहे लेकिन 1997 में निगम पार्षद और 1998 में विधायक बने महाबल मिश्र का लाभ कांग्रेस को मिला। वे 2009 में पश्चिमी दिल्ली से सांसद बने, लेकिन कांग्रेस के कमजोर होने का लाभ 2012 में बनी ‘आप’ ने उठाया। 2013 के विधानसभा चुनाव में उसे पूर्वांचल का साथ मिला और 2015 में तो पूर्वांचल के लोगों ने एकतरफा ‘आप’ को वोट किया।

हर चौथा या पांचवां मतदाता पूर्वांचल का प्रवासी

यह माना जाता है कि दिल्ली का हर चौथा या पांचवा मतदाता पूर्वांचल का प्रवासी है। दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 50 में पूर्वांचल के प्रवासी 20 से 60 फीसद तक हो गए हैं। पहले इन्हीं मतदाताओं के बूते कांग्रेस ने 15 साल दिल्ली पर राज किया और इन मतदाताओं के ही भारी समर्थन से 2015 के विधानसभा चुनाव में ‘आप’ को 70 सदस्यों वाली विधानसभा में 67 सीटें मिली थीं। दिल्ली में कांग्रेस को दो दशक से पूरबियों की अहमियत समझ में आई। उन्हें खुश करने के लिए 2000 में दिल्ली की कांग्रेस सरकार ने छठ के दिन एच्छिक अवकाश घोषित किया। शीला दीक्षित सरकार ने बिहार से बाहर पहली बार दिल्ली में मैथिली भोजपुरी अकादमी बना दी। भाजपा को यह राजनीति देर से समझ में आई और लगातार राजनीतिक दबाव के कारण 2014 में राष्ट्रपति शासन में बिहार और झारखंड के बाद दिल्ली तीसरा राज्य बना जहां छठ के दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया। इसी दबाव में पहले 2014 में लोकसभा टिकट और 2016 में बिहार मूल के भोजपुरी कलाकार मनोज तिवारी को दिल्ली भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया। भाजपा को उसका लाभ मिला। भाजपा 2017 में लगातार तीसरी बार नगर निगमों के चुनाव जीत गई।

दिल्ली की राजनीति का गणित बदलने वाले पूर्वांचल (बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड आदि के मूल निवासी) के प्रवासियों का दस फरवरी को होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव में अहमियत बढ़ गई है। तभी तो केंद्र की भाजपा की अगुआई वाली राजग सरकार ने दिल्ली की करीब 1800 कॉलोनियों में मालिकाना हक देने के लिए संसद में कानून बना डाले। इससे दिल्ली पर राज करने वाली आम आदमी पार्टी (आप) इतना परेशान हुई कि वह पहले की तरह केंद्र सरकार पर हमला बोलने लगी, जबकि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से भी पिछड़कर तीसरे नंबर पर जाने के बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके लोग केंद्र सरकार के खिलाफ बोलना बंद करके सरकारी खजाने से मुफ्त सुविधाएं देने की झड़ी लगा दी थी। माना जाता है कि पिछले दो विधानसभा चुनावों में प्रवासियों ने कांग्रेस के बजाए ‘आप’ का समर्थन किया। भाजपा ने भी अपना वोट औसत बढ़ाने के लिए तीन साल से भोजपुरी कलाकार मनोज तिवारी को पार्टी की दिल्ली भाजपा की कमान दे दी। इसी अक्तूबर में कांग्रेस ने भी बिहार के मूल निवासी क्रिकेट खिलाड़ी कीर्ति आजाद को दिल्ली कांग्रेस की चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाया।

दिल्ली में भाजपा 1998 में दिल्ली सरकार से बाहर हुई, तब से वह कभी विधानसभा चुनाव नहीं जीत पाई। भाजपा खास वर्ग की पार्टी मानी जाती है। गैर भाजपा मतों का ठीक से विभाजन होने पर ही भाजपा विधानसभा या नगर निगम चुनाव जीत पाती है। 1993 में दिल्ली विधानसभा के चुनाव में उसे करीब 43 फीसद वोट मिले तब वह सत्ता में आई। उसके बाद उसका वोट औसत लोकसभा चुनावों के अलावा कभी भी 36-37 फीसद से बढ़ा ही नहीं। भोजपुरी समाज के प्रमुख अजीत दूबे कहते हैं कि 2015 के विधानसभा चुनाव और 2017 के नगर निगम चुनाव ने साबित कर दिया कि अब दिल्ली में रहने वाले ज्यादातर प्रवासी दिल्ली के मतदाता बन गए हैं। अब प्रवासियों को सत्ता में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।

वैसे तो पूर्वांचल के माने जाने वाले नेता अलग-अलग भूमिका में अपने बूते दिल्ली की राजनीति में रहे लेकिन 1997 में निगम पार्षद और 1998 में विधायक बने महाबल मिश्र का लाभ कांग्रेस को मिला। वे 2009 में पश्चिमी दिल्ली से सांसद बने, लेकिन कांग्रेस के कमजोर होने का लाभ 2012 में बनी ‘आप’ ने उठाया। 2013 के विधानसभा चुनाव में उसे पूर्वांचल का साथ मिला और 2015 में तो पूर्वांचल के लोगों ने एकतरफा ‘आप’ को वोट किया। ‘आप’ ने अपने वोट पक्के करने के लिए दिल्ली के सरकारी स्कूलों में मैथिली की पढ़ाई शुरू करने की घोषणा की और भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल कराने के लिए केंद्र सरकार को पत्र लिखा, छठ घाटों की संख्या बढ़ाई।

बावजूद इसके मनोज तिवारी के तीन साल से प्रदेश अध्यक्ष रहने से आप को आने वाले विधानसभा चुनाव में बड़ी चुनौती तो माना ही जा रहा है। इसलिए मुख्यमंत्री केजरीवाल केंद्रीय नेताओं के अलावा मनोज तिवारी पर सीधा हमला करते रहते हैं। शीला दीक्षित अपने काम से प्रवासियों में भी लोकप्रिय थीं। कांग्रेस को देरी से समझ में आया कि किसी पूर्वांचल के नेता पर भरोसा किया जाए। कांग्रेस में नए कीर्ति आजाद की भले ही दिल्ली की राजनीति में बड़ी दखल नहीं रही है। वे गोल मार्केट से 1993 में भाजपा के टिकट पर विधायक बनने के बाद से बिहार से और इस बार कांग्रेस के टिकट पर झारखंड से चुनाव लड़ते रहे हैं। पहले उन्हें ही प्रदेश अध्यक्ष बनाने की चर्चा थी फिर अनुभवी नेता सुभाष चोपड़ा को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर उन्हें चुनाव अभियान की जिम्मेदारी दी गई।

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