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Delhi Assembly Election 2020: शीला युग के अंत का संकेत है यह चुनाव

Delhi Assembly Election 2020:

Author नई दिल्ली | Published on: January 22, 2020 4:04 AM
सोनिया गांधी ने वर्ष 1998 के लोकसभा चुनाव में दीक्षित को यूपी से लाकर पूर्वी दिल्ली संसदीय क्षेत्र से पार्टी का उम्मीदवार बनाया।

Delhi Assembly Election 2020: कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पिछले साल अस्सी की उम्र में शीला दीक्षित को कांग्रेस की कमान सौंपकर जहां लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन को सुधारने की पहल की थी, वहीं यह भी सोच थी कि पार्टी दिल्ली विधानसभा में भी जोरदार तरीके से वापसी करेगी। दीक्षित की अगुआई में लड़े गए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को पछाड़कर जब दूसरी जगह पाई तो इस संभावना बल मिला। लेकिन दीक्षित के निधन के बाद यह संकेत भी मिल रहा है कि सूबे की सियासत से शीला दीक्षित युग का अंत हो गया है।

सोनिया गांधी ने वर्ष 1998 के लोकसभा चुनाव में दीक्षित को यूपी से लाकर पूर्वी दिल्ली संसदीय क्षेत्र से पार्टी का उम्मीदवार बनाया और उस चुनाव में दीक्षित की हार के बावजूद उनको विधानसभा चुनाव से ठीक पहले प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया। दीक्षित ने अपने पार्टी प्रमुख के फैसले को सही साबित करते हुए विधानसभा चुनाव में सूबे की सत्ता भाजपा के हाथों से ले ली। उसके बाद न केवल कांग्रेस, बल्कि समूची दिल्ली की सियासत में उनका दबदबा कायम हो गया। वर्ष 1998 की उस जीत के बाद 2013 की हार तक दीक्षित ने डेढ़ दशक तक दिल्ली में हुकूमत चलाई।

कांग्रेस ने दिल्ली विधानसभा के इस चुनाव के लिए ‘कांग्रेस वाली दिल्ली’ का नारा दिया और शीला सरकार द्वारा हासिल उपलब्धियों का ही जिक्र किया। पार्टी यह चुनाव दिल्लीवालों को अपने पुराने शासन की याद दिलाकर लड़ रही है लेकिन अपने प्रचार प्रसार में वह शीला दीक्षित को शो केश करने से बचती हुई दिखाई दे रही है। उसके चुनाव प्रचार में उसकी डेढ़ दशक की हुकूमत को थीम जरूर बनाया गया है लेकिन समूचे प्रचार से दीक्षित की धमक गायब होती जान पड़ रही है। कांग्रेस ने इस बार टिकटों के बंटवारे में दीक्षित के करीबी और उनकी सरकार में मंत्री रह चुके मंगतराम सिंघल, रमाकांत गोस्वामी, किरण वालिया आदि नेताओं को टिकट नहीं मिल दिया है।

दीक्षित के अपने परिवार से भी कोई चुनाव मैदान में नहीं उतरा। दीक्षित के निर्वाचन क्षेत्र नई दिल्ली से चुनाव लड़ने को लेकर पूछने पर दीक्षित की बेटी लतिका ने कहा कि यह मामला उनके और पार्टी हाईकमान के बीच का है और वे इस बारे में किसी से कुछ भी नहीं बताना चाहतीं। उन्हें चुनाव लड़ाने की चर्चा जोरदार थी लेकिन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सामने आखिरकार पार्टी ने रमेश सब्बरवाल को टिकट दे दिया। लतिका या उनके परिवार का कोई अन्य व्यक्ति चुनाव लड़ने का इच्छुक भी नहीं बताया गया।

जानकारों का कहना है कि इसमें कोई दो राय नहीं कि वर्ष 2010 में दिल्ली में हुए राष्टÑमंडल खेलों की तैयारियों के क्रम में शीला दीक्षित की अगुआई वाली सरकार ने राजधानी को चमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। रिंग रोड बाईपास, बारापुला एलिवेटिड रोड, एअरपोर्ट का नवीनीकरण, कनॉट प्लेस का सौंदर्यीकरण सहित कई ऐसे काम हुए जिसने दिल्ली को नई पहचान दी। राष्टÑमंडल खेलों के शुभारंभ के लिए हुए जलसे में दीक्षित के नाम पर कई बार तालियां बजाई गर्इं। लेकिन खेलों के आयोजन के बाद 2013 में हुए चुनाव में दीक्षित और उनकी अगुआई में कांग्रेस की हार के बाद उनके करिश्मे पर सवाल उठे। केजरीवाल ने न केवल दीक्षित के निर्वाचन क्षेत्र नई दिल्ली पर कब्जा जमा लिया, बल्कि दिल्ली की सियासत के भी पर्यायवाची हो गए। इस चुनाव में कांग्रेस का रुख भी यही संकेत दे रहा है कि सूबे की सियासत से शीला युग का अंत हो गया है।

अजय पांडेय

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