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डीम्ड मेडिकल कॉलेज: एक करोड़ की फीस देने के बावजूद 50 हजार रुपये की नौकरी भी नसीब नहीं

देश में डीम्ड मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की पढ़ाई करने वाले छात्र को 50 हजार रुपये महीना की नौकरी भी नहीं मिल पार रही है। वहीं, ये कॉलेज छात्रों से सालाना 20 से 22 लाख रुपये तक फीस वसूल रहे हैं।

Author नई दिल्ली | June 24, 2019 10:24 AM
सबसे महंगे कॉलेजों में से एक पुणे के डीवाई मेडिकल कॉलेज के स्टूडेंट्स को 7 लाख का पैकेज मिला। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

देश में लगभग एक करोड़ रुपये फीस वसूलने वाले डीम्ड एमबीबीएस कॉलेज का प्लेसमेंट का रिकॉर्ड बहुत निराश करने वाला है। इन कॉलेजों से पढ़ाई पूरी करने वाले मेडिकल ग्रेजुएट स्टूडेंट्स को 50 हजार रुपये महीना की नौकरी भी बमुश्किल ही मिल पा रही है। ये बात इन कॉलेजों के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआईआरएफ) रैंकिंग के लिए दिए गए आंकड़ों से सामने आई है।

इन आंकड़ों पर नजर डालने से पता लगता है कि एक डीम्ड मेडिकल कॉलेज को छोड़कर किसी भी मेडिकल कॉलेज का एवरेज प्लेसमेंट छह लाख रुपये सालाना भी नहीं है। हिंदुस्तान की खबर के अनुसार एमबीबीएस के लिए सालाना 22.5 लाख रुपये फीस वसूलने वाले चेन्नई के एसआरएम मेडिकल कॉलेज के 85 स्टूडेंट्स में से 70 स्टूडेंट्स को अलग-अलग कॉलेजों में प्लेसमेंट के दौरान औसत 3.50 लाख रुपये वेतन ऑफर हुआ।

इस तरह यह राशि महीने के 30 हजार रुपये से भी कम होती है। वहीं कॉलेज में 15 स्टूडेंट्स ने पीजी कोर्स की पढ़ाई के लिए अपना रजिस्ट्रेशन कराया। इसी तरह सालाना 22 लाख रुपये फीस लेने वाले चेन्नई के सविता मेडिकल कॉलेज के 87 स्टूडेंट्स का प्लेसमेंट हुआ। इन्हें 4.2 लाख रुपये का औसत पैकेज मिला। सबसे अधिक 7 लाख रुपये का पैकेज पुणे के डीवाई पाटिल मेडिकल कॉलेज के स्टूडेंट्स को औसतन 7 लाख रुपये का पैकेज मिला।

डीवाई पाटिल कॉलेज को एमबीबीएस के लिए सबसे महंगे कॉलेजों में से एक माना जाता है। इस संबंध में पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. अनंत भान का कहना है कि संभव है कि यह छात्र शहर से बाहर जाने को इच्छुक नहीं होंगे। अनंत भान के का कहना है कि बड़े शहरों में जहां डॉक्टरों की संख्या अधिक है वहां पैकेज कम मिल रहा है।

मेडिकल कॉलेजों को अपने छात्रों को उन स्थानों में नौकरी के लिए प्रेरित करना चाहिए जहां डॉक्टरों की कमी है।  देश में वैसे भी देश में डॉक्टरों की भारी कमी है। देश में अभी 11.49 लाख सरकारी डॉक्टर हैं। इस तरह 11 हजार लोगों पर महज 1 डॉक्टर ही उपलब्ध है। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार 1000 लोगों पर 1 डॉक्टर होना चाहिए।

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