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सुप्रीम कोर्ट का आदेश-विधायक, सांसदों के खिलाफ मामलों के लिए बने अलग अदालत

केंद्र ने कोर्ट को बताया कि वह नेताओं से संबंधित मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए विशेष अदालतों के गठन के खिलाफ नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट। (फाइल फोटो)

राजनीति को अपराध मुक्त बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार से फास्ट ट्रैक कोर्ट की तर्ज पर सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों के लिए विशेष अदालत बनाई जाएं। कोर्ट ने सरकार से कहा कि राजनीति को अपराध मुक्त होना चाहिए। कोर्ट ने केंद्र को ऐसी विशेष अदालतों के गठन की योजना और इस मद में निर्धारित की जाने वाली राशि के बारे में अवगत कराने का भी निर्देश दिया। केंद्र ने कोर्ट को बताया कि वह नेताओं से संबंधित मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए विशेष अदालतों के गठन के खिलाफ नहीं है। साथ ही कोर्ट ने केन्द्र को उन 1581 सांसदों और विधायकों से संबंधित मामलों का विवरण पेश करने का निर्देश दिया जिन्होंने 2014 के आम चुनावों के समय नामांकन पत्र दाखिल करते समय अपने हलफनामे में इनकी जानकारी दी थी। शीर्ष अदालत ने सरकार से पूछा है कि इन 1,581 मामलों में कितने का निस्तारण एक वर्ष में किया गया है और कितने आरोपियों को दोषी या निर्दोष ठहराया गया है। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की पीठ ने 2014 से अब तक नेताओं के खिलाफ दायर आपराधिक मामलों और उनके निपटारे से संबंधित विवरण भी केन्द्र से मांगा है।

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सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को छह सप्ताह के भीतर ये जानकारी देने का निर्देश दिया और याचिका की सुनवाई 13 दिसंबर के लिये स्थगित कर दी। सुप्रीम कोर्ट उस याचिका की सुनवाई कर रही थी, जिसमें दोषी नेताओं पर जिंदगीभर के लिए चुनाव लड़ने पर बैन लगाने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान केंद्र ने पीठ को सूचित किया कि आपराधिक मामलों में दोषी ठहराये गए नेताओं को आजीवन अयोग्य घोषित करने की हिमायत करने वाली चुनाव आयोग और विधि आयोग की सिफारिशों पर विचार हो रहा है।

सुप्रीम कोर्ट जन प्रतिनिधित्व कानून के प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित किये जाने की मांग को लेकर अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई कर रहा था जो दोषी ठहराये गये नेताओं को सजा पूरी होने के बाद छह साल तक चुनाव के अयोग्य बनाता है।

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