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विशेष: कम हो गए मेंढक, बढ़ रहीं बीमारियां

छत्तीसगढ़ में बिलासपुर के गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में हुए एक अध्ययन में पाया गया है कि देश में मेंढकों की विभिन्न प्रजातियों की संख्या तेजी से कम हो रही है। शोध के नाम पर और कीटनाशकों के चलते बड़ी संख्या में मेंढकों का खात्मा हुआ है। यही मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया जैसी कई घातक बीमारियों के विस्तार का कारण बन गया है।

मेंढकों की घटती संख्या जैव प्रौद्योगिकी के लिहाज के बेहद नुकसानदायक है।

देश में मेंढक कम होने से बीमारियां बेकाबू हो रही हैं। प्रदूषण, प्रयोगशालाओं में शोध के लिए मेंढकों के उपयोग और फसलों पर बढ़ते कीटनाशकों के उपयोग के कारण मेंढकों की संख्या में गिरावट देखी गई है। ऐसे में कई तरह की मौसमी और विषाणुजनित बीमारियों- मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया जैसी घातक बीमारियों का विस्तार हो रहा है।

छत्तीसगढ़ में बिलासपुर के गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्राणी विज्ञान विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. कोमल सिंह सुमन प्रकृति में मेंढकों की मौजूदगी पर शोध कर रहे हैं। चार साल से मेंढकों के संरक्षण के लिए मुहिम भी चला रहे हैं। डॉ. सिंह का कहना है कि शोध के नाम पर और कीटनाशकों के चलते बड़ी संख्या में मेंढकों का खात्मा हुआ है। यही मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया जैसी कई घातक बीमारियों के विस्तार का कारण बन गया है।

यह स्थिति सिर्फ शोध के इलाकों, यानी छत्तीसगढ़ के विभिन्न इलाकों तक ही सीमित नहीं है। पूरे देश के विभिन्न इलाकों में मेंढकों की संख्या तेजी से कम हो रही है। डॉ. कोमल देश के अलग-अलग इलाकों में जाकर मेंढकों को बचाने की लोगों से अपील कर रहे हैं। संरक्षण को लेकर चलाई जा रही इस मुहिम में पांच सौ से अधिक लोग जुड़ चुके हैं। डॉ. कोमल कहते हैं कि अब घर व आसपास बारिश के दिनों में मेंढकों के टर्राने, यानी टर्र-टर्र की आवाज सुनाई कम देती है। मेंढकों के कम होने से डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियों के वाहक मच्छरों और फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट, टिड्डे, बीटल्स, कनखजूरा, चींटी, दीमक और मकड़ी तेजी से पनपने लगे हैं। प्रदूषण के कारण मेंढक कम हुए हैं। खेतों में कीटनाशक उनके लिए सबसे खतरनाक साबित हो रहे हैं। इंसानी हस्तक्षेप इन उभयचर जंतुओं की मौत की सबसे बड़ी वजह है।बरसात मेंढकों का प्रजनन काल होता है। ये पानी को शुद्ध रखते हैं। मेंढक में करीब दो सौ प्रकार के लाभकारी अल्केलाइड पाए जाते हैं।

बंगाल, सिक्किम, असम व गोवा में लोग इसका भोजन में इस्तेमाल करते हैं। 1980 के करीब भारत से मेंढ़कों का निर्यात किया जाता था। केंद्र सरकार ने अब इस निर्यात पर रोक लगा दी है। डॉ. कोमल सिंह सुमन कहते हैं कि प्रकृति में मेंढक की मौजूदगी अनिवार्य है। 1982 में देश से 25 सौ टन से अधिक मेंढक निर्यात किए गए थे। बाद में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। मेंढक उस समय से कम होते जा रहे हैं। शोध के लिए मेंढकों का इस्तेमाल करते हैं। प्रयोगशालाओं में जीव विज्ञान की पढ़ाई के लिए मेंढकों का डिसेक्शन किया जाता है। ऐसे में संख्या घटने लगी है। खेतों में कीटनाशक के चलते भी मेंढकों की संख्या कम हुई है।

इस बीच, नरसिंहपुर से भारतीय वन सेवा के एक अधिकारी परवीन कासवान ने मेंढकों को लेकर ट्विटर पर अच्छी खबर साझा की है। ट्विटर पर उन्होंने एक छोटा वीडियो साझा किया है, जिसमें इन उभयचरों को एक छोटे से जलाशय में घूमते और कूदते देखा जा सकता है। यह वीडियो पीले यानी बुलफ्रॉग मेंढकों का है, जिसे जानकार अब विलुप्त मानने लगे थे।

कासवान ने कहा कि भारतीय बुलफ्रॉग में मादाओं को आकर्षित करने के लिए मानसून के दौरान रंग बदलने की क्षमता होती है। कासवान ने ट्विटर पर लिखा, ‘क्या आपने कभी पीले मेंढक देखे हैं। यह नरसिंहपुर में देखे गए भारतीय बुलफ्रॉग हैं। वे मानसून के दौरान पीले रंग में बदलते हैं मादाओं को आकर्षित करने के लिए।’ बुलफ्रॉग भारत, बांग्लादेश, म्यांमा, नेपाल, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में पाए जाने वाले मेंढकों की बड़ी प्रजाति है। य एक ट्वीट में कासवान ने स्पष्ट किया है कि बड़े समूहों में बुलफ्रॉग की उपस्थिति का कोविड-19 या टिड्डियों के हमले से कोई संबंध नहीं है। उनका यह व्यवहार सामान्य है। भारतीय बुलफ्रॉग आमतौर पर चमकीले पीले रंग के नहीं होते हैं, लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक, प्रजनन काल के दौरान नर रंग बदल सकते हैं।

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