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विशेष: अक्षर आस्था

जिस देश के बाहर-भीतर सभी आकाशों में युगों से अक्षर ब्रह्मा का नाद आपूरित होता रहा हो, उस देश की जनकल्याणी अंतरात्मा को आसन देने के लिए इसी से अक्षत से बढ़कर कोई सामग्री उपयुक्त नहीं समझी गई और वह अक्षत संस्कृत व्याकरण की महिमा से बराबर बहुवचन में केवल इसीलिए प्रयुक्त होता रहा कि बहुजन-हिताय का बोध उससे होता रहे।

हल्दी, दूब इस देश की संस्कृति को रूप और सौंदर्य स्पर्श देते रहे हैं, कमल गंध देता रहा है; पर दधि-अच्छत, रस तथा शब्द देते रहे हैं।

हल्दी, दूब इस देश की संस्कृति को रूप और सौंदर्य स्पर्श देते रहे हैं, कमल गंध देता रहा है; पर दधि-अच्छत, रस तथा शब्द देते रहे हैं। जिस प्रकार शब्द से आकाश भर जाता है, उसी प्रकार से अक्षत से अर्चन की थाली भर जाती है। जिस देश के बाहर-भीतर सभी आकाशों में युगों से अक्षर ब्रह्मा का नाद आपूरित होता रहा हो, उस देश की जनकल्याणी अंतरात्मा को आसन देने के लिए इसी से अक्षत से बढ़कर कोई सामग्री उपयुक्त नहीं समझी गई और वह अक्षत संस्कृत व्याकरण की महिमा से बराबर बहुवचन में केवल इसीलिए प्रयुक्त होता रहा कि बहुजन-हिताय का बोध उससे होता रहे।

…सौभाग्य, तितिक्षा, स्नेह तथा परिपूर्णता के लिए आग्रह-रूप में संस्कृति की पूजा की थाली हल्दी, दूब और दधि-अच्छत से सजाई जाती रही है और सजाई जाती रहेगी, पर उस पूजा का मर्म उसी को खुलेगा, जो लोक-जीवन की मंगल-साधना में अपने को तन्मय कर सकेगा और वह तन्मयता ग्रामसेवक या गांव साथी बनने से नहीं आएगी, उसे पाने के लिए मन से गंवार बनना होगा, शहरी संस्कारों को एकदम धो देना होगा। बिना उसके, हल्दी, दूब और दहि अर्थशून्य आडंबर ही लगेंगे। ये सभी मंगलद्रव्य अभिव्यंजन हैं, अभिधान नहीं।

अभिधान को प्रकट करने में हम दोष मानते हैं और अभिव्यंजन के लिए सहृदयता की जरूरत पड़ती है, बिना उसके उसका उल्लास बनकर आस्वाद्य नहीं होता। आज संस्कृति का अभिधान तो है, जो न होता तो अच्छा होता; पर उसका अभिव्यंजन नहीं है, उस अभिव्यंजन को न पाकर ही साहित्य रिक्त है, सांस्कृतिक जीवन भी मृदंग की भांति मुखर होते हुए भी खोखला है।
(डॉ. विद्यानिवास मिश्र के प्रसिद्ध निबंध ‘हल्दी-दूब और दधि-अच्छत’ का संपादित अंश)

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