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कोरोना: सप्लाई चेन में दिक्कत से महंगी हो रही वैक्सीन, मिलने में भी हो रही देरी

कुछ अड़चनों के बावजूद कोविड वैक्सीनों के वितरण में काफी हद तक लय एकजुटता आ गई थी। लेकिन केंद्र सरकार द्वारा एक मई को किए गए खरीद के विकेंद्रीकरण के फैसले से सप्लाई चेन में नए अवरोध खड़े हो गए हैं।

एक लाभार्थी को वैक्सीन देती स्वास्थ्यकर्मी। (पीटीआई)।

कुछ अड़चनों के बावजूद कोविड वैक्सीनों के वितरण में काफी हद तक लय एकजुटता आ गई थी। लेकिन केंद्र सरकार द्वारा एक मई को किए गए खरीद के विकेंद्रीकरण के फैसले से सप्लाई चेन में नए अवरोध खड़े हो गए हैं। पहले मॉडल था साइकिल पहिए के धुरे और तीलियों जैसा। अब कोई पैमाना नहीं। राज्यों व प्राइवेट अस्पतालों के सामने माल लाने और भंडारण की लॉजिस्टिक दिक्कतें भी हैं।

इन बातों का बहुत महत्व है। क्योंकि राज्य हों या प्राइवेट अस्पताल अथवा कारपोरेट सब को अब सब कुछ खुद ही करना है। वैक्सीन लाना है। स्टोर करना है। फिर उन्हें लगाना भी है। तिस पर वैक्सीन खरीद पर तो राशनिंग भी लग चुकी है। यही नहीं वैक्सीन के मैन्यूफैक्चरर और टीका लगवाने वाले के बीच होने वाले सफर में नई-नई दिक्कतें भी आ रही हैं। इन दिक्कतों का फल अंततः वैक्सीन लगवाने वाला ही भुगतेगा। वैक्सीन मिलने में विलंब होगा और वह महंगी भी मिलेगी।

एक मई से पहले वाली व्यवस्था सॉलिड थी। सार्वभौमिक टीकाकरण प्रोग्राम का आधारभूत ढांचा था ही। इसके तहत देश भर में 29,000 कोल्ड चेन सेंटर थे जहां वैक्सीन को संस्तुत तापमान पर रखे जाने की सुविधा थी। वैक्सीन बनाने वालों को एक मई से पहले सुविधा यह भी थी कि उनके सामने एक ही ग्राहक था—केंद्र सरकार। उसका ऑर्डर मिला नहीं कि माल की शिपिंग की प्रक्रिया शुरू।

सीरम इंस्टीट्यूट वैक्सीन बनाता था। उनको रेफ्रिजरेटेड ट्रक में रख कर पुणे एयरपोर्ट भेजता था। वहां से वैक्सीनें केंद्र द्वारा पहले से तय ठिकानों को जाने वाली फ्लाइट पर लाद दी जाती थीं। कमोबेश इसी प्रक्रिया का पालन कोवैक्सीन बनाने वाली हैदराबादी कंपनी भारत बायोटेक भी करती थी। फर्क बस इतना था कि इसकी चार यूनिटें हैदराबाद और बेंगलुरू में अलग-अलग स्थित हैं।

16 जनवरी को शुरू हुई टीकाकरण मुहिम होने से पहले वैक्सीनों को इंडिगो, स्पाइसजेट, गोएयर, विस्तारा और एयर इंडिया की सामान्य उड़ानों के कारगो से भेजा गया था। चूंकि हवाई भाड़ा ज्यादा होता है इसलिए वैक्सीनों का अगला सफर रेफ्रिजरेटेड ट्रक पर होता था। ये ट्रक वैक्सीनों को दिल्ली, करनाल, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता में स्थित बड़े-बड़े गोदामों तक ले जाते थे जहां से ये डिमांड के मुताबिक विभिन्न राज्यों को जाती थीं। इस प्रकार बड़े डिपो से छोटे डिपो होते हुए ये वैकसीने सीएचसी और पीएचसी तक पहुंच जाती थीं।

अब एक मई के बाद केंद्र को उत्पादन का पचास प्रतिशत ही वैक्सीन निर्माता देगा। केंद्र यह माल लेकर राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों को देगा। यह वितरण राज्य में एक्टिव कोविड केस और राज्य प्रशासन की वैक्सीन लगाने में तेजी के आधार पर होगा। इसमें क्राइटेरिया में वेस्टेज वैक्सीन भी गिनी जाएंगी।

केंद्र को पचास परसेंट माल देने वाले निर्माता को अभी राज्यों और प्राइवेट अस्पतालों को भी देखना होगा। इसमें दिक्कतें आएंगी जिनका असर अंततः टीकाकरण अभियान पर पड़ेगा। कोविन के डेटा के मुताबिक देश में वैक्सीनेशन के लिए सरकारी ठिकानों की संख्या 58,259 है जबकि प्राइवेट केंद्र सिर्फ 2,305 ही हैं।

केंद्र द्वारा खरीदी और राज्यों को वितरित की गई वैक्सीनों के साथ साइकिल का धुरी और तीलियों वाला मॉडल अब भी काम करता रहेगा। लेकिन जो माल राज्य खरीदेंगे उनके साथ? केंद्र के पास बड़ा भंडार था जहां से राज्य जरूरत का माल ले लेता था। राज्यों के पास तो इतने बड़े भंडार हैं ही नहीं। राज्यों को खरीदारी यह ध्यान में रखकर करनी होगी कि राज्य के भंडार कितना माल सही टेम्परेचर पर रख पाएंगे।

ऐसे ही प्राइवेट अस्पतालों को भी वैक्सीन बनाने वालों और कोल्ड चेन फर्म्स के साथ मिलकर काम करना होगा। उन्हें याद रखना होगा कि 18 से 44 आयु वर्ग में साठ करोड़ लोग हैं जो वैक्सीन के पात्र हैं।

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