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दलित नहीं था महिषासुर, पढ़ें असुरों के राजा के बारे में कई और रहस्‍य

ऋग्वेद के छठे मंडल के 27वें सूक्त में वरशिखा नामक "असुर" का उल्लेख मिलता है। जिनके नगर का उल्लेख "इरावती" या "हरियूपिय" के रूप में मिलता है, जिसे विद्वान "हड़प्पा" की सभ्यता से जोड़कर देखते हैं।

बंगाल के पुरुलिया में होती है महिषासुर की पूजा।

मानव संसाधन मंत्री स्‍मृति ईरानी ने 24 फरवरी को जेएनयू विवाद के बारे में भाषण देते हुए महिषासुर और मां दुर्गा का जिक्र किया था। हर कोई इस मुद्दे पर अपनी राय दे रहा है। लेकिन महिषासुर विवाद का सच आखिर है क्‍या? इसके लिए हमें प्राचीन ग्रंथों और इतिहास की तलहटी में जाना होगा। मार्कण्डेय पुराण में महिषासुर और दुर्गा बार-बार उल्लेख होता है और उसके दामन से एकत्रित किए गए सप्तशती यानि 700 श्लोकों का यदि अनुवाद करने का प्रयास किया जाए तो किसी महिष-असुर का दुर्गा के द्वारा संहार करने की कथा प्राप्त होगी, पर जिस तरह किसी ई-मेल आईडी या उसके पासवर्ड का या केमेस्ट्री के सूत्रों का कोई शाब्दिक या साहित्यिक अर्थ नहीं होता। उसी तरह महिषासुर और दुर्गा के वो 700 श्लोक भी उस कालखंड का कोई वैज्ञानिक फार्म्‍यूला प्रतीत होते हैं, जिसके शब्दों का सीधा कोई अर्थ न होकर, उन शब्दों का संयोजन किसी वैज्ञानिक आधार होगा।

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यदि उन अनुवादों को ही मूल भाव मान लिया जाए, तब भी तथ्य कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। आज का महिषासुर निश्चित रूप से मूल नाम न होकर किसी नाम का अपभ्रंश प्रतीत होता है। जैसे त्रेता का ब्राह्मण विद्वान दसग्रिव या दशानन, जिसने ऋषियों द्वारा स्वयं के लिए राम की उपाधि को ठुकरा कर “रमन” (राम का मनन करने वाला) कहलाना स्वीकार किया, जो कालांतर में बिगड़ कर रावण हो गया या जैसे द्वापर के “सुयोधन”, “सुशासन”, और “सुशीला”, बिगड़ी ज़ुबान के कारण दुर्योधन, दुशासन और दु:शिला कहलाए। कालांतर में शायद में महिषासुर के साथ भी यही हुआ। किसी भी अपभ्रंश में तथ्यों और जानकारी की कमी और भावुकता की प्रधानता होती है। आसुरिता या असुरता जो स्वयं किसी शब्द का अपभ्रंश है, दरअसल एक जीवन शैली है, एक जीवन पद्धति है। कोई अपने शरीर की आवश्यकता के अनुसार नर्म शैय्या पर सोना पसंद करता है, कोई भूमि पर सोने को अनिवार्य मानता है। कोई धोती या लुंगी में सहज होता है, तो कोई पैंट या पायजामे को सभ्यता की पोशाक मानता है। इसी प्रकार सभ्यता के विस्तार में कुछ वर्गों ने समाज को सुर और असुर में बांटा। उन्होंने स्वयं को देव और विरोधियों को दानव और असुर बतलाया। मूलतः कला, साहित्य और संगीत से जुड़े लोगों ने तब के तकनीकी विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और गणितज्ञों में सुर, कला और माधुर्य की कमी का उल्लेख करके उन्हें असुर कहा। तब वाहन के रूप में अश्व, उष्ट्र, नंदी, महिष जैसे पशुओं का प्रयोग होता था। महिषासुर का महिष उस शासक के वाहन का भी संकेत हो सकता है।

ऋग्वेद के छठे मंडल के 27वें सूक्त में वरशिखा नामक “असुर” का उल्लेख मिलता है। जिनके नगर का उल्लेख “इरावती” या “हरियूपिय” के रूप में मिलता है, जिसे विद्वान “हड़प्पा” की सभ्यता से जोड़कर देखते हैं। ऋग्वेद में असुरों को मायावी यानि तब के विज्ञान अर्थात् माया शक्ति और तन्त्र शक्ति से समृद्ध माना।

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कुछ मान्यताएं असुरों को अनुसूरिया या असीरिया यानि सुमेरिया के साथ फ़ारस और इरान के मूल निवासी भी मानती हैं, जो देहवाद, भौतिकवाद और तब के विज्ञान यानि तंत्र का अनुसरण करते थे, जिसके कारण उन्होंने ढेरों समर्थक तो जुटाए पर इसके साथ उन्होंने बहुत विरोधी और आलोचक भी बना लिए। मगर उस काल खंड में वर्ण व्यवस्था नहीं होने से जातियों का प्राकट्य नहीं हुआ था। जाति व्यवस्था तो सभ्यता के विकास के बहुत बाद मनु से उपजी, इसलिए महिषासुर के दलित होने की बात खुद-ब-खुद खारिज हो जाती है। बाद में ब्राह्मण ऋषि पुलस्‍त्‍य के दौहित्र और ऋषि विश्रवा का पुत्र “रमन” यानि रावण अपनी वैज्ञानिक और तांत्रिक निष्ठा के साथ भौतिकवाद से लगाव के कारण ही ब्राह्मण जाति होते हुए भी असुर कहलाया। कहीं कहीं मूल निवासियों को आक्रांताओं के प्रत्युत्तर में हिंसक होने के कारण भी असुर कहा गया।

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