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सीवीसी व सीबीआइ लोकपाल के दायरे में हों: समिति

भ्रष्टाचार रोधक विभिन्न सरकारी इकाइयों के कार्यों में परस्पर दोहराव को देखते हुए संसदीय समिति ने सोमवार को केंद्रीय सतर्कता आयोग और सीबीआइ की भ्रष्टाचार रोधी शाखा को भ्रष्टाचार के मामलों से निपटने में सीधे लोकपाल के नियंत्रण में लाने की सिफारिश की..

Author नई दिल्ली | December 8, 2015 1:23 AM
भारतीय संसद (Express photo by Ravi Kanojia)

भ्रष्टाचार रोधक विभिन्न सरकारी इकाइयों के कार्यों में परस्पर दोहराव को देखते हुए संसदीय समिति ने सोमवार को केंद्रीय सतर्कता आयोग और सीबीआइ की भ्रष्टाचार रोधी शाखा को भ्रष्टाचार के मामलों से निपटने में सीधे लोकपाल के नियंत्रण में लाने की सिफारिश की। समिति ने लोकपाल के अध्यक्ष और सदस्यों के चयन में लोकसभा में विपक्ष का कोई मान्य नेता नहीं होने पर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को चयन समिति में सदस्य शामिल करने का भी सुझाव दिया। संसद इस सिफारिश को मान लेती है तो इससे प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली लोकपाल चयन समिति में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को शामिल करने का रास्ता साफ हो जाएगा।

संसद के दोनों सदनों में सोमवार को पेश की गई रिपोर्ट में कहा गया है- समिति का विचार है कि सीवीसी और सीबीआइ की संस्थाओं (जहां तक इनकी भ्रष्टाचार निरोधक कार्रवाई का संबंध है) को पूरी तरह लोकपाल के साथ एकीकृत किया जाए। इसमें भ्रष्टाचार रोधी निगरानी संस्था लोकपाल को शीर्ष स्तर पर रखा जाए और सीवीसी व सीबीआइ (भ्रष्टाचार रोधी शाखा) सीधे इसके नियंत्रण में काम करें। लोकपाल और सीवीसी के कार्यों को साफतौर से बताया जाए। इनके कार्यों और शक्तियों के बीच आपसी दोहराव का समाधान किया जाए। लोकपाल को जांच, अन्वेषण और अभियोजन के लिए इन संगठनों का उपयोग करना चाहिए।

कांग्रेस सदस्य ईएम सुदर्शन नचियप्पन की अध्यक्षता वाली कार्मिक, लोक शिकायत, विधि व न्याय संबंधी संसद की स्थायी समिति ने महसूस किया है कि कर्मचारियों और नेताओं समेत लोकसेवकों की संपत्ति और देनदारियों का सार्वजनिक खुलासा जरूरी नहीं है। सरकारी कर्मचारियों के संपत्ति और देनदारियों की घोषणा के बारे में समिति ने मौजूदा नियमों की समीक्षा की सिफारिश करते हुए कहा है कि ये नियम शंका और अविश्वास की औपनिवेशिक सोच को दर्शाते हैं। इन नियमों को इस समय भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सुरक्षा चक्र के बजाय सरकारी कर्मचारियों को परेशान करने के लिए अधिक इस्तेमाल किया जा रहा है।

ऐसी घोषणाओं के लिए प्रावधानों में समरूपता का सुझाव देते हुए समिति ने सिफारिश की है कि किसी लोकसेवक की उसके ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति और देनदारियों का पता लगाने के लिए डिजिटल निगरानी साफ्टवेयर का प्रयोग किया जा सकता है। लोकपाल, लोकायुक्त व अन्य संबंधित विधि (संशोधन) विधेयक 2014 को पिछले साल 22 दिसंबर को जांच-परख के लिए समिति को भेजा गया था। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि लोकपाल के लिए एक एकीकृत ढांचा होना चाहिए। इसका मुख्यालय यहां सीवीसी मुख्यालय के भीतर स्थापित होना चाहिए।

खोज और चयन समितियों के बारे में संसदीय समिति ने कहा है कि कोई स्थान खाली है तो उसके भरे जाने तक कोई फैसला नहीं लिया जाना चाहिए। खोज और चयन समिति में कोई स्थान खाली होने पर उसे तुरंत नहीं भरे जाने का उसे कोई कारण नजर नहीं आता। समिति इसी के अनुसार सिफारिश करती है कि विधेयक में तदनुसार सुधार किया जा सकता है।

लोकपाल चयन समिति के सदस्यों में लोकसभा अध्यक्ष, निचले सदन में विपक्ष का नेता, भारत के प्रधान न्यायाधीश व उनकी ओर से नामित शीर्ष अदालत का कोई न्यायाधीश और प्रख्यात न्यायविद, जिन्हें राष्ट्रपति मनोनीत कर सकते हैं, शामिल हैं। रिपोर्ट कहती है- समिति का विचार है कि जब भी कोई सदस्य चयन समिति या खोज समिति की बैठक में शामिल होने में सक्षम नहीं है तो उसे चयन या खोज समिति को अपने विचार लिखित में भेजने का पर्याप्त मौका दिया जाना चाहिए। अनुपस्थित सदस्य के ऐसे विचारों को समिति की ओर से फैसला लेते समय ध्यान में रखा जाना चाहिए। कुछ दुर्लभ हालात में, जहां अनुपस्थित सदस्य को उचित मौका देने के बावजूद वह लिखित में चयन या खोज समिति को अपने विचार भेजने में नाकाम रहता है तो उसकी गैरमौजूदगी के कारणों को रिकार्ड करने के बाद उनकी अनुपस्थिति में भी फैसला किया जा सकता है।

चयन समिति में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को शामिल करने के मुद्दे पर समिति ने केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के चयन के लिए सीवीसी अधिनियम के समान प्रावधानों का हवाला दिया। समिति ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि मौजूदा लोकसभा में कोई मान्य विपक्ष का नेता नहीं है। ऐसी स्थिति भविष्य में भी आ सकती है। लोकपाल अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप विपक्ष के नेता की अनुपस्थिति में लोकपाल की चयन समिति का गठन करना संभव नहीं है। ऐसी स्थिति से पार पाने के लिए प्रस्ताव किया गया है कि जहां विपक्ष का नेता नहीं है वहां सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को चयन समिति का सदस्य बनाया जाएगा।

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