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हताशा में उखड़ते कदम

संयुक्त परिवारों में आमतौर पर बच्चा सबका होता था, इसलिए अगर माता-पिता किसी बात को नहीं सुन रहे हैं, नहीं समझा पा रहे हैं, डांट रहे हैं, तो दादा जी सुनने, बचाने को थे।

पिछले दिनों राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट आई थी। उसमें बताया गया था कि भारत में बच्चों की आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं। 2017 से 2019 तक चौबीस हजार बच्चों ने आत्महत्या की। इसमें लड़के-लड़कियां दोनों शामिल थे। इसमें बड़ा कारण परीक्षा में फेल होना था। सोचिए कि फेल होने से ज्यादा आसान बच्चे को अपनी जान देना लगा। इसके अलावा प्रेम में विफल होना, कोई बीमारी या यौन शोषण भी आत्महत्या के कारण बने।

आखिर बच्चे से यह दूरी कैसे बनी होगी कि घर वाले समय पर जान ही नहीं सके कि बच्चे के मन में क्या चल रहा है। आठ साल तक के बच्चे आत्महत्या जैसे कदम उठाएं, तो कुछ तो गड़बड़ है। उनके हाथ में किसी चाकलेट या मोबाइल पकड़ाने से ज्यादा जरूरी है, उनके मन को पढ़ना। वे इतने अकेले क्यों हैं कि जिन मुसीबतों से गुजर रहे हैं, उन्हें माता-पिता को न बता पाएं। उनकी डांट के डर से जान दे दें। माता-पिता और स्कूल दोनों ही अपनी जान क्यों छुड़ाएं। माता-पिता सोच लें कि बच्चे की जिम्मेदारी स्कूल की और स्कूल सोचें कि उनकी जिम्मेदारी सिर्फ पढ़ाना।

संयुक्त परिवारों में आमतौर पर बच्चा सबका होता था, इसलिए अगर माता-पिता किसी बात को नहीं सुन रहे हैं, नहीं समझा पा रहे हैं, डांट रहे हैं, तो दादा जी सुनने, बचाने को थे। चाचा से कोई सहारा मिल जाता था। बुआ दुलार कर समस्या का हल कर देती थीं। एकल परिवारों में ऐसी कोई शृंखला नहीं, जहां बच्चा दौड़ कर जा सके। कोई तो हो जो उसकी सुन ले। जहां उसे डांट या मारपीट का खतरा न सताए।

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