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कांग्रेस के संग तालमेल नहीं करेगी माकपा, येचुरी ने की इस्तीफे की पेशकश

महासचिव सीताराम येचुरी की ओर से पेश मसविदे में भाजपा के खिलाफ लड़ाई में कांग्रेस समेत तमाम धर्मनिरपेक्ष दलों को साथ लेकर एक वाम लोकतांत्रिक मोर्चा बनाने की बात कही गई थी।

Author कोलकाता | January 22, 2018 10:43 AM
सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी। (फाइल फोटो)

माकपा की केंद्रीय समिति की बैठक के तीसरे व आखिरी दिन रविवार को भारी हंगामे के बीच राजनीतिक मसविदे पर हुए मतविभाजन में पूर्व महासचिव प्रकाश करात गुट की ओर से पेश प्रस्तावों को हरी झंडी मिल गई। इससे तय हो गया है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी कांग्रेस के साथ कोई तालमेल नहीं करेगी। महासचिव सीताराम येचुरी की ओर से पेश मसविदे में भाजपा के खिलाफ लड़ाई में कांग्रेस समेत तमाम धर्मनिरपेक्ष दलों को साथ लेकर एक वाम लोकतांत्रिक मोर्चा बनाने की बात कही गई थी। येचुरी के प्रस्ताव के पक्ष में 31 और विपक्ष में 55 वोट पड़े। केंद्रीय समिति की बैठक में अपने मसविदे पर मुहर नहीं लगने से नाराज येचुरी ने बाद में पोलित ब्यूरो की बैठक में अपने पद से इस्तीफा देने की भी पेशकश की। लेकिन पार्टी के दूसरे नेताओं ने यह कह कर फिलहाल उनको मना लिया कि इससे अंदरूनी मतभेद सार्वजनिक हो जाएंगे और लोगों में गलत संदेश जाएगा।
केंद्रीय समिति की बैठक के पहले दो दिनों के दौरान येचुरी गुट की तमाम कोशिशों के बावजूद जब मसविदे पर सहमति नहीं बनी तो तीसरे दिन इस पर मतदान का फैसला किया गया। भारी हंगामे के बीच हुए मतदान में समिति के सदस्यों ने करात गुट के मसविदे पर मुहर लगा दी। कांग्रेस के साथ तालमेल के मुद्दे पर येचुरी व करात के बीच उभरे मतभेदों की वजह से ही अबकी बैठक में दो अलग-अलग राजनीतिक मसविदे पेश किए गए थे। इससे पहले वर्ष 1964 में ही वामपंथी पार्टी की बैठक में दो अलग-अलग मसविदे पेश किए गए थे। तब उसका नतीजा इस पार्टी के विभाजन और भाकपा के जन्म के तौर पर सामने आया था।

माकपा सूत्रों ने बताया कि रविवार की बैठक में पारित प्रस्तावों को अप्रैल में हैदराबाद में होने वाली पार्टी कांग्रेस में पेश किया जाएगा। इस तीन-दिनी बैठक में पार्टी और इसके दो प्रमुख नेताओं- येचुरी व करात के बीच जारी मतभेद खुल कर सामने आ गए। माकपा के एक नेता ने बताया कि येचुरी के मसविदे में भाजपा के राजनीतिक विकल्प के तौर पर कांग्रेस समेत तमाम धर्मनिरपेक्ष ताकतों को साथ लेकर एक वाम लोकतांत्रिक मोर्चा के गठन का प्रस्ताव था। लेकिन करात गुट को कांग्रेस के साथ पर भारी आपत्ति थी। येचुरी गुट ने विरोधियों को साथ लेने के लिए अपने मसविदे में फेरबदल करते हुए सत्तारुढ़ दलों का साथ नहीं लेने, लेकिन आगे चल कर तालमेल का विकल्प खुला रखने का सुझाव दिया था। लेकिन करात गुट कांग्रेस को साथ नहीं लेने पर अड़ा रहा। उसकी दलील थी कि वर्ष 2019 के चुनावों में कांग्रेस के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कोई तालमेल नहीं होना चाहिए। सूत्रों ने बताया कि येचुरी आखिर तक मतविभाजन को टालने का प्रयास करते रहे। लेकिन करात गुट की दलील थी कि लंबे समय से जारी इस विवाद को सुलझाने के लिए मतदान ही एकमात्र समाधान है। एक माकपा नेता ने बताया कि येचुरी गुट भी फिलहाल समझौते के मूड में नहीं है। वह पार्टी कांग्रेस में भी मसविदे में संशोधन पर जोर देगा। ध्यान रहे कि करात गुट 2016 के बंगाल विधानसभा चुनावों से पहले भी यहां कांग्रेस के साथ तालमेल के खिलाफ था। लेकिन प्रदेश माकपा नेताओं ने केंद्रीय नेतृत्व के निर्देशों की अनदेखी करते हुए कांग्रेस के साथ अनौपचारिक तालमेल किया था। उसके बाद राज्य में होने वाले विभिन्न चुनावों व उपचुनावों में भाजपा वामपंथी दलों से दूसरे नंबर की पार्टी होने का तमगा छीनती रही है।

 

 

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