पश्चिम बंगाल में सत्ता गंवाने के करीब एक महीने बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में बढ़ती अंदरूनी कलह और नेताओं के बगावती तेवरों के बीच सीपीएम के राज्य सचिव और पूर्व सांसद मोहम्मद सलीम ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने दावा किया कि टीएमसी में टूट पहले से तय था और यह पार्टी अब तेजी से बिखर रही है।
द इंडियन एक्सप्रेस के इंटरव्यू में सलीम ने कहा कि टीएमसी के पास न तो कोई स्पष्ट विचारधारा है, न कोई ठोस राजनीतिक कार्यक्रम और न ही लंबे समय का लक्ष्य। ऐसे में उसका टिके रहना मुश्किल था। उन्होंने कहा, “मैं पहले ही कह चुका था कि यह पार्टी गर्मियों में जिस तेजी से बर्फ पिघलती है, उससे भी अधिक तेजी से पिघलेगी। टीएमसी का गठन वामपंथ को हराने और बंगाल में भाजपा-आरएसएस के लिए रास्ता तैयार करने के लिए हुआ था। अब उसका उद्देश्य पूरा हो चुका है, इसलिए उसकी ‘एक्सपायरी डेट’ आ गई है।”
TMC में टूट की वजह क्या?
टीएमसी में जारी टूट पर सलीम ने कहा कि यह स्वाभाविक है। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी नेतृत्व के खिलाफ कई तरह के गंभीर आरोप और विवाद रहे हैं, जिसके कारण संगठन के भीतर असंतोष बढ़ा। टीएमसी के बागी विधायकों के नेता ऋतब्रत बनर्जी को लेकर पूछे गए सवाल पर सलीम ने तंज कसते हुए कहा, “ऋतु यानी मौसम। वह हर मौसम के आदमी हैं। जब असली विपक्ष ही नहीं होगा तो असली नेता प्रतिपक्ष कैसे होगा?”
2011 में वाममोर्चा की हार पर क्या बोले?
सलीम ने कहा कि 2016 के विधानसभा चुनाव में वामपंथी दलों की वापसी की संभावना बन रही थी, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के इशारे पर लगभग 100 सीटों पर वोटों के ट्रांसफर को लेकर एक “अलिखित समझौता” हुआ था। उन्होंने दावा किया कि भाजपा नेता दिलीप घोष और पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती भी इस तरह के संकेत दे चुके हैं। उमा भारती ने यह तक कहा था कि अगर ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनीं तो उन्हें याद रखना चाहिए कि इसमें आरएसएस की भी भूमिका रही है।
मोहम्मद सलीम ने आरोप लगाया कि पिछले 15 वर्षों में नेशनल मीडिया और दिल्ली के उदारवादी बुद्धिजीवी ममता बनर्जी सरकार और टीएमसी की कार्यशैली को सही ढंग से समझने में विफल रहे। उनके अनुसार, टीएमसी शासन में सिर्फ भ्रष्टाचार ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और विपक्षी राजनीति को भी कमजोर किया गया।
उन्होंने कहा कि टीएमसी ने पुलिस, धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल कर विपक्ष को खत्म करने की कोशिश की। सलीम के मुताबिक, पार्टी में ऐसी व्यवस्था विकसित हो गई थी जिसमें शीर्ष नेताओं के पोस्टर लगाकर स्थानीय स्तर पर कुछ भी किया जा सकता था। टीएमसी शासनकाल में अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिलता था। उन्होंने आरोप लगाया कि प्राकृतिक संसाधनों की लूट, विपक्ष पर हमले और सांप्रदायिक राजनीति टीएमसी शासन की पहचान बन गई थी।
सलीम ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि सुवेंदु अधिकारी भी टीएमसी की उसी राजनीतिक संस्कृति की उपज हैं। उनके अनुसार, भाजपा में भी आंतरिक लोकतंत्र, अनुशासन और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता की कमी दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि आज बंगाल में जो विपक्ष दिखाई दे रहा है, वह वास्तविक विपक्ष नहीं है। सलीम का आरोप है कि जिन नेताओं को विपक्ष के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, वे हमेशा सत्ता के साथ रहे हैं और कभी संघर्षशील विपक्ष की भूमिका में नहीं रहे। उन्होंने कहा कि ये नेता पहले टीएमसी में सत्ता के लिए आए थे और अब भाजपा भी वास्तविक विपक्ष के लिए जगह नहीं छोड़ना चाहती।
ममता बनर्जी पर टिप्पणी करते हुए सलीम ने कहा कि उन्होंने संघर्ष कर पार्टी बनाई और सत्ता तक पहुंचीं, लेकिन बाद के वर्षों में उनका पूरा राजनीतिक मॉडल परिवार और उत्तराधिकारियों के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गया। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य किसी टीवी धारावाहिक की तरह “स्क्रिप्टेड” नजर आता है, जहां विपक्ष की भूमिकाएं भी तय की जा रही हैं। सलीम के अनुसार, बंगाल की राजनीति में वास्तविक विपक्ष की भूमिका निभाने की क्षमता अब भी वामपंथी दलों के पास है, जो सड़क पर संघर्ष की राजनीति कर रहे हैं।
क्या CPI(M) फिर से विपक्ष की मुख्य ताकत बनेगी?
फाल्टा उपचुनाव और टीएमसी में टूट के बाद सीपीएम की संभावनाओं पर सलीम ने कहा कि बंगाल में मजबूत विपक्ष की हमेशा जरूरत रही है। उन्होंने दावा किया कि सड़क पर संघर्ष की राजनीति आज भी वामपंथ ही कर रहा है। सलीम ने कहा, “हम बुलडोजर राजनीति, अल्पसंख्यकों के मुद्दों और महंगाई के खिलाफ लगातार आंदोलन कर रहे हैं। जबकि कई अन्य नेता सिर्फ अपनी राजनीतिक और व्यक्तिगत सुरक्षा चाहते हैं।”
भाजपा पर भी साधा निशाना
उन्होंने भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें उत्तर प्रदेश में कांग्रेस शासन के अंतिम वर्षों की याद आती है, जब एन. डी. तिवारी मुख्यमंत्री थे। उन्होंने कहा कि तिवारी अक्सर निर्देश लेने के लिए लखनऊ से दिल्ली जाया करते थे, जिसके कारण लोगों ने उन्हें “न्यू दिल्ली तिवारी” कहना शुरू कर दिया था। सलीम के मुताबिक, इसका कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हुआ और कुछ ही समय बाद पार्टी ने राज्य में अपनी पकड़ खो दी।
उन्होंने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल की वर्तमान सरकार भी स्वतंत्र रूप से फैसले लेने के बजाय दिल्ली और नागपुर से निर्देश लेने वाली सरकार बनती जा रही है। सलीम ने कहा कि भाजपा और आरएसएस के मूल एजेंडे को लागू करने की जल्दबाजी साफ दिखाई दे रही है।
पशुपालन और गोवंश से जुड़े मुद्दों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि बंगाल में इन नीतियों का विरोध केवल मुस्लिम समुदाय की ओर से नहीं हो रहा है, बल्कि उन लोगों की ओर से भी हो रहा है जिनकी आजीविका पशुपालन और मवेशी पालन पर निर्भर है। उनका कहना था कि यदि इस क्षेत्र को नुकसान पहुंचता है तो हजारों परिवारों की रोजी-रोटी प्रभावित होगी।
सलीम ने आरोप लगाया कि भाजपा हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति करना चाहती थी, लेकिन जमीनी स्तर पर विरोध उन लोगों की ओर से सामने आया है जो इस कारोबार और आजीविका से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में सांस्कृतिक और आर्थिक मुद्दे एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, बल्कि दोनों आपस में जुड़े हुए हैं और भविष्य की राजनीति में यह संबंध और अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
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पश्चिम बंगाल चुनाव में बीजेपी से करारी हार के एक महीने के अंदर ही तृणमूल कांग्रेस (TMC) में बगावत हो गई है। टीएमसी में हुई टूट ने ना केवल संगठनात्मक नेतृत्व को हिला दिया है बल्कि पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के साथ अब कुछ ही नेता बचे हैं। इनमें से अधिकतर टीएमसी मुखिया के पुराने वफादार माने जाते हैं। पूरी खबर पढ़ें…
