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जानिए कैसे गोरक्षकों की वजह से बर्बाद हो रहा है राजस्थान का गऊ-व्यापार

बीते तीन सालों के दौरान रेलवे ट्रैक पर एक्सीडेंट में मरने वाली गायों की संख्या में 112% की बढ़ोत्तरी हुई है। साल 2015-16 में जहां यह आंकड़ा 2,183 था, वहीं साल 2017-18 में यह आंकड़ा 362% बढ़कर 10 हजार से ज्यादा हो गया।

गऊ व्यापार में बीते कुछ सालों के दौरान भारी गिरावट आयी है।

देश के अलग-अलग हिस्सों में घटी मॉब लिंचिंग की घटनाओं के बाद राजस्थान में गऊ व्यापार में भारी गिरावट देखी गई है। दरअसल बीते सालों के दौरान गो-तस्करी के आरोप में कथित गोरक्षकों की भीड़ ने कई लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी है। जिसके बाद से लोग गायों को लाने ले-जाने में डरने लगे हैं। यही वजह है कि गऊ-व्यापार में बीते कुछ सालों में भारी कमी आयी है। बता दें कि भारत में पशुओं की खरीद-फरोख्त के लिए मशहूर और इस मामले में देश के दूसरे सबसे बड़े बाजार, जो कि राजस्थान के तिलवाड़ा इलाके में आयोजित होता है, उसमें बीते 6 सालों के दौरान पशुओं की बिक्री में 95% की भारी भरकम गिरावट आयी है। इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2011 में इस बाजार में जहां 7430 गायों की बिक्री हुई थी और करीब 1.35 करोड़ रुपए का व्यापार हुआ था। वहीं साल 2017 में इस बाजार में सिर्फ 342 पशुओं की बिक्री हुई और व्यापार घटकर सिर्फ 7.3 लाख रुपए रह गया है।

इसके अलावा राजस्थान में गायों की पारंपरिक ब्रीड थरपरकार के भविष्य पर भी संकट के बादल छा गए हैं। राजस्थान के बॉर्डर इलाके बाड़मेर और जोधपुर के ग्रामीण इलाकों में 95% मुस्लिम समुदाय के लोगों ने डर के चलते गऊ-व्यापार छोड़ दिया है। मई, 2014 से लेकर मार्च, 2018 के बीच गाय से जुड़ी हिंसा में 9 राज्यों में 45 लोगों की मौत हो चुकी है। अकेले राजस्थान में मॉब लिंचिंग की 10 घटनाएं हुई हैं। साल 2010 से अभी तक के आंकड़ों की बात करें तो देश के 22 राज्यों में गाय संबंधी हिंसा के 127 मामले सामने आए हैं। इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार, जिनमें से 98 प्रतिशत मामले साल 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद दर्ज किए गए हैं।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में गोरक्षा अधिनियम लागू हो गया है। जिसके चलते इन राज्यों में किसान अब बूढ़ी होती गायों को बेच नहीं पा रहे हैं। वह उन्हें आवारा छोड़ रहे हैं। इसका असर ये हो रहा है कि ये आवारा पशु किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, देश में 2,727 रजिस्टर्ड गौशालाएं हैं। लेकिन उनमें भी चारे और जगह की कमी है। इसी साल फरवरी माह में जयपुर में हिंगोनिया गौशाला में करीब 500 गायों की भूख से मौत की खबर सामने आयी थी।

अगस्त 2018 में इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार, बीते तीन सालों के दौरान रेलवे ट्रैक पर एक्सीडेंट में मरने वाली गायों की संख्या में 112% की बढ़ोत्तरी हुई है। साल 2015-16 में जहां यह आंकड़ा 2,183 था, वहीं साल 2017-18 में यह आंकड़ा 362% बढ़कर 10 हजार से ज्यादा हो गया। अहम बात ये है कि ट्रेन एक्सीडेंट में गायों की मौत की सबसे ज्यादा घटनाएं भाजपा के शासनकाल वाले हिंदी पट्टी के राज्यों में हुई। राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत का दावा है कि साल 2013 से लेकर 2018 तक देश में 70,000 गायों की मौत हुई है। थार जागरुक नागरिक मंच के संयोजक भुवनेश जैन का कहना है कि यहां का मुस्लिम समुदाय बीफ नहीं खाता है, लेकिन हिंदू अतिवादियों की कार्रवाई के चलते बीते 5 सालों में इन इलाकों की सामाजिक- आर्थिक संरचनाओं में बड़ा बदलाव आया है। मुस्लिम समुदाय के लोग गऊ-व्यापार छोड़कर जीविका के लिए अन्य काम कर रहे हैं।

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