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COVID-19: सिर्फ बार-बार हाथ धोने से न चलेगा काम!

लांसेट की वायु-संचरित-संक्रमण थ्योरी के मुताबिक बंद जगहें खतरनाक, हवादार जगह में रहने में ज्यादा बचाव।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (क्रेडिट-फ्रीपिक)।

कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि कोरोना वायरस हवा के जरिए फैलता है। लेकिन, सच यह भी है कि कुछ अध्ययन इस बात को अंतिम रूप से प्रामाणिक नहीं मानते। ऐसा विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्ययन में भी पाया गया था। अब एक नया अध्ययन सामने आया है जो कहता है कि कोरोना वायरस के प्रसार का प्राथमिक रूट हवा ही है। यह निष्कर्ष मेडिकल जर्नल ‘द लांसेट’ की टीम का है। विशेषज्ञों की यह टीम इस निष्कर्ष तक पुराने अध्ययनों के अध्ययन के बाद पहुंची है। द लांसेट का कहना है कि उसका आकलन पुख्ता, तर्कपूर्ण प्रमाणों पर आधारित है।

इस निष्कर्ष के मायने: अगर कोरोना वायरस का फैलाव हवा के जरिए हो रहा है तब तो हमे इससे लड़ने के लिए उठाए जा रहे कदमों के बारे में फिर से सोचना होगा। कहा जाता आया है कि कोरोना खांसने-छींकने से निकली बड़ी बूंदों से फैलता है। मगर यह नहीं सोचा जाता रहा कि वायरस प्राथमिक तौर पर हवा पर ही सवार है। मतलब, यह कि रोकथाम के लिए किए गए अब तक के उपाय नाकाफी हैं। द लांसेट के अध्ययन की लीडर डॉ तृषा ग्रीनअलग का कहना है कि हमको साफ-सफाई तो रखनी ही चाहिए लेकिन कोरोनो पर अंकुश के लिए बार-बार हाथ धोने और गहरी सफाई आदि पर उतना ज्यादा ज़ोर देने की नहीं।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से संबद्ध डा तृषा ने एक ईमेल में बताया कि वायरस से बचने के लिए हमें घर हो या दफ्तर, सभी जगह वेंटिलेशन यानी वायु संचार का भरपूर बंदोबस्त करना चाहिए। मतलब ताजी हवा के लिए खिड़कियां और रोशनदान हो।

अपने स्थान पर वायु की स्वच्छता के लिए कार्बनडाइआक्साइड की मात्रा जांचने वाले यंत्र भी लगा सकते हैं। जहां ज़रूरी हो वहां एयर फिल्टर भी हो। और, सबसे बड़ी बात जब बंद जगह यानी इनडोर हों तो मास्क पहन लें। मास्क भी अच्छे वाले, जो नाक और मुंह पर चिपक के फिट होते हैं।

डॉ तृषा जापानियों के तीन तरीकों को बताती हैः

1. किसी के साथ चिपक कर नहीं उठना-बैठना

2. भीड़भाड़ वाली जगह में नहीं जाना

3. छोटी और बंद जगह में नहीं जाना

पहले से हो चुकी रिसर्च के अध्ययन के दौरान ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा के छह विशेषज्ञों ने प्रमाणों की ऐसी दस धाराओं को पहचाना जो कोरोना वायरस के वायु आधारित संचरण की परिकल्पना को बल देते हों।

1. कोरोना वायरस के तेज़ प्रसार में सुपर-स्प्रेडिंग मामलों की महती भूमिका रही है। सच तो यह है कि महामारी के फैलने में प्राथमिक योगदान म्यूजिक कन्सर्ट और क्रूज़ शिप में हजारों सैलानियों की मस्ती जैसी घटनाओं का ही रहा है। इन जगहों पर छींक और खांसी की बूंदों की थ्योरी प्रसार को ठीक से समझा नहीं पाती।

2. क्वारंटाइन के लिए खोले गए होटलों में अगल-बगल में रह रहे लोगों के बीच करोना वायरस का संचरण पाया गया।

3. दो तिहाई और शायद पचास प्रतिशत संक्रमणों के लिए वे एसिम्टोमैटिक लोग दोषी हैं जो जिनमें बीमारी के खांसी टाइप कोई लक्षण नहीं हैं। साफ हैः ये लोग न खांसते थे और न छींकते थे। मतलब उनके मुंह से छींटे निकल कर दूसरों के अंदर गए ही नहीं। ऐसे में संक्रमण का तरीका वायु ही हो सकता है।

4. कोरोना वायरस का संक्रमण खुली जगह की बनिस्बत बंद जगह यानी इनडोर ज्यादा देखने को मिला है। लेकिन ऐसे स्थानों में जैसे ही वेंटीलेशन बढ़ता है, संक्रमण घटने लगता है।

5. अस्पतालों में वे स्वास्थ्यकर्मी भी चपेट में आए जो पीपीईकिट में काम कर रहे थे। पीपीई किट मुंह से निकले छींटों से तो बचाव कर लेती है लेकिन एयरोसोल से नहीं।

6. कोरोना वायरस लैब्स में प्रयोगों के दौरान हवा में तीन-तीन घंटे तक पा गया है। कोविड के मरीज के कमरे की हवा में वायरस मिल चुका है। यहां तक कि संक्रमित व्यक्ति की कार की हवा से भी।

7. यह वायरस कोविड मरीजों के अस्पताल के एयरफिल्टर और डक्ट में भी पाया जा चुका है। ये ऐसी जगहें हैं जहां तक सिर्फ एयरसोल के जरिए ही पहुंचा जा सकता है।

8. एक मामले में पिंजरे में रखे उन स्वस्थ जानवरों में भी संक्रमण फैल गया जो संक्रमित जानवरों के पिंजरे से बिलकुल अलग रखे गए थे। लेकिन दोनों पिंजरे एक एयर डक्ट से जुड़े हुए थे।

9. कोरोना वायरस के वायु-संचरित संक्रमण की थ्योरी का अभी तक पक्की तौर पर खंडन नहीं हो सका है। कुछ मामलों में ऐसा देखने को जरूर मिला है कि हवा साझा करने के बाद एक कमरे में रहने वाले इनफेक्टेड नहीं हुए। पर इसके पीछे अनेक कारण हो सकते हैं। जैसे कि संक्रमित व्यक्ति में वायरल लोड कितना था।

10. इस बात के बहुत कम प्रमाण हैं कि संक्रमण बीमार व्यक्ति की श्वासनली से निकली बूंदों से मुख्यतः फैलता है।

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