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सामयिक: घर का हो जाना दफ्तर

महिलाएं ज्यादा परेशान हो रही हैं क्योंकि कहा जा रहा है कि यह महामारी सबसे पहले उनकी नौकरी लील लेगी। नौकरी बची भी तो उसकी शर्तें क्या होंगी, कहा नहीं जा सकता। जैसे-तैसे औरतें घर से बाहर निकली थीं, लेकिन ऐसा लगता है कि कहीं दफ्तरों की बाहरी दुनिया से खदेड़कर उन्हें फिर से तो घर में बंद नहीं कर दिया जाएगा।

लॉकडाउन ने सबको घर में पहुंचा दिया। सबका काम घर से हो रहा है।

कोविड-19 के खतरे के साथ देश-दुनिया में जो नए हालात बने हैं, उसमें साफ लग रहा है कि आगे हमारे जीवन में, हमारे परिवेश में बहुत कुछ वैसा नहीं रहने वाला, जैसा पहले था। दरअसल, इस महामारी के साथ सेहत की हमारी चिंताओं के कारण न सिर्फ हमारी जीवनशैली बदलने जा रही है बल्कि शहरी जीवन में कामकाज का पूरा अभ्यास बदल रहा है। यह बदलाव नए अवसरों के साथ नए जोखिम भी साथ लेकर आएगा। घर और दफ्तर के बीच के फर्क को पाटते हुए विकसित हो रही कार्य संस्कृति को लेकर सामयिक विमर्श। 

पिछले दिनों एक नजदीकी रिश्तेदार लड़के ने कहा- पता नहीं अब हम दफ्तर कब से जा पाएंगे। इन दिनों भी घर में रहकर कम से कम नौ-दस घंटे काम करते हैं। पहले भी करते थे। लेकिन अब दिनभर घर में रहते हैं, लेकिन कोई आराम का समय नहीं मिलता है। खाने और चाय पीने का समय भी मुश्किल से मिलता है। पहले के मुकाबले काम के घंटे बहुत बढ़ गए हैं। कब सुबह होती है और कब शाम, कुछ पता ही नहीं चलता।

शरीर में इतनी थकान भरी रहती है कि लगता है कि कोई बड़ा भारी मेहनत का काम किया है। जबकि पहले तो दफ्तर जाते थे, आते थे, उसमें भी समय लगता था। लेकिन अब तो न कहीं आ रहे हैं, न जा रहे हैं। दिनभर घर में हैं, फिर भी थकान से परेशान हैं। मन भी नहीं लगता है। पहले छुट्टी का हमेशा इंतजार रहता था। सोचते थे कि ‘वीक एंडस’ में खूब आराम करेंगे, लेकिन अब घर में रहते हुए कभी पलक तक नहीं झपकती है। क्या पता अब वे दिन लौटेंगे कि नहीं।

स्थिति नई, बहस नई
कंप्यूटर इंजीनियर इस लड़के की चिंता वाजिब भी है। ऐसी चिंता करने वाला वो अकेला नहीं है। जब से पूर्णबंदी शुरू हुई है, बहुत से लोग घर से ही काम कर रहे हैं। कंपनियों को घर से काम कराने में अब अपार संभावनाएं भी नजर आने लगी हैं। पूरी दुनिया में इस बात पर बहस छिड़ी हुई है कि घर से काम कराने के कितने फायदे हैं। घर से काम कराने को ‘एंप्लाई फ्रेंडली’ कहा जा रहा है। लेकिन सच यह है कि अब तक बहुत सी कंपनियां घर से काम करने के विकल्प हफ्ते में एक या दो दिन के लिए ही देती थीं। बहुत से कार्यक्षेत्रों के लिए माना जाता था कि उनमें घर से काम नहीं हो सकता, लेकिन पूर्णबंदी और तकनीकी दक्षता ने बता दिया है कि अब घर से कोई भी काम हो सकता है, यहां तक कि बीमार का इलाज भी।

ऐसे में कंपनियों को लग रहा है कि आखिर इतने लंबे-चौड़े दफ्तरी परिसर और साम्राज्य फैलाने की क्या जरूरत है, जबकि पूरा का पूरा दफ्तर एक कंप्यूटर या मोबाइल फोन में ही समा सकता है। तब न इतने बड़े दफ्तर को किराए पर लेने या खरीदने की जरूरत है, न ही फिर उसके रख-रखाव की। कर्मचारियों के लिए तमाम तरह की सुविधाएं जुटाने की भी दरकार नहीं। अगर कर्मचारियों का आपस में मनमुटाव हो जाए तो उन्हें हल कराने की भी चिंता नहीं। किसी स्त्री के साथ कोई अन्याय हो जाए, तो उसका समाधान निकालने और कोई ऊंच- नीच हो जाए, तो दशकों की साधना से तैयार ब्रांड के नष्ट हो जाने की चिंता करने की भी जरूरत नहीं है।

दरअसल, ये सब बातें तभी होती हैं जब कर्मचारी आपस में मिलते-जुलते हैं, बातचीत करते हैं। घर से काम करने पर न मिलेंगे-जुलेंगे और न ही ऐसा होगा। इसके अलावा जब ये सारे ऊपरी खर्चे बच जाएंगे, तो कंपनियों को भारी मुनाफा होगा। उनकी लागत कम आएगी।

कंपनियों के लिए अवसर
कोरोना जैसी महामारी और उसके कारण दुनियाभर में पूर्णबंदी के फैसलों ने जैसे कंपनियों के लिए भारी मुनाफे के द्वार खोल दिए हैं। हाल ही में एक बड़ी परामर्श देने वाली कंपनी ने घोषणा की है कि आने वाले दिनों में जब स्थितियां सामान्य हो जाएंगी, तब भी दो साल तक उसके पचहत्तर फीसद कर्मचारी अब घर से ही काम करेंगे। इस तरह दफ्तर को खरीदने या किराए पर लेने के खर्चे, परिवहन, दूरभाष, बिजली आदि के तमाम खर्चे बच सकेंगे।
कंपनी का कहना है कि इससे वे महिला कर्मचारी भी कंपनी के साथ जुड़ सकेंगी, जो किन्हीं कारणों से घर से बाहर नौकरी करने नहीं आ पाती हैं। यह आइटी और उससे जुड़े तमाम उद्योगों में अब एक नए चलन के तौर पर लागू होगा। लोगों का समय और आने-जाने का खर्चा बचेगा तो वे कम तनख्व्वाह में भी काम करने को तैयार हो जाएंगे। कंपनी के अनुसार, इससे सड़कों पर जाम भी कम लगेगा। इससे यह भी होगा कि लोग बड़े शहरों से छोटे शहरों में चले जाएंगे। वहां उन्हें किराया भी कम देना पड़ेगा। उनके खर्चे भी कम हो जाएंगे।

चिंता का दूसरा पक्ष
वैसे इस कंपनी ने भविष्य के इस चलन के दूसरे पक्ष की तरफ भी ध्यान दिलाया है। बड़ा सवाल है कि शहरों में चलने वाला होटल उद्योग, परिवहन, मनोरंजन, शादी से जुड़ा उद्योग, रीयल एस्टेट, सौंदर्य उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, फिटनेस उद्योग आदि का क्या होगा। कंपनी की मानें तो ये सारे क्षेत्र जो पिछले दो-तीन दशक में फले-फूले हैं, वे सब बैठ जाएंगे। इनमें से अधिकतर उद्योग मध्यवर्ग की उठान के साथ ही बढ़े थे। चूंकि अब मध्यवर्ग पर ही तमाम तरह के खतरे मंडरा रहे हैं तो इन उद्योगों का भी भगवान ही मालिक है।

इन दिनों घर से जो लोग काम कर रहे हैं, वे बता रहे हैं कि पहले तो वे कम से कम सात-आठ बजे तक घर के लिए निकल लेते थे। घर तक अपने कंप्यूटर के साथ दफ्तर का काम भी आता था, लेकिन कुछ ऐसा समय भी होता था जब वे अपने, अपने परिवार के बारे में भी सोच सकते थे। मगर अब वह समय नहीं निकल पा रहा है।

हाल ही में मई दिवस निकला है। इसे मनाने के लिए कुछ दशक पहले तक बड़ी-बड़ी रैलियां हुआ करती थीं। मई दिवस ही वह अवसर था जब मजदूरों ने अपने अधिकारों की मांग की थी। काम के घंटे तय करने के लिए आंदोलन किया गया था। लेकिन आज इतने दिनों बाद हम जैसे उसी दौर में लौट आए हैं। तकनीक ने हमें दफ्तर का चौबीस घंटे का गुलाम बना दिया है। हमारे आराम और परिवार के साथ बीतने वाले समय को भी छीन लिया है। आगे आने वाले दिनों में जब घर से ही काम करना होगा तो यह कितना मुश्किल भरा होगा, यह सोचा जा सकता है।

पहले आसानी, अब आफत
पिछले दिनों जब सरकार ने कुछ क्षेत्रों में राहत दी, काम करने और कुछ फीसद कर्मचारियों को दफ्तर जाने की इजाजत दी, तो लोगों को बहुत खुशी महसूस हुई। एक लड़की ने कहा कि ऐसा लग रहा है, जैसे न जाने कितने दिनों की कैद के बाद घर से बाहर निकले हैं। यह वही लड़की है, जो अकसर यह शिकायत करती रहती थी कि दफ्तर जा-जाकर परेशान हो गई है। दिल्ली से गुरुग्राम आने-जाने में ही चार-पांच घंटे लग जाते हैं। ऐसे में कब क्या करें, यही समझ में नहीं आता। ऐसा लगता है कि घर तो सिर्फ सोने के लिए ही आते हैं।

यही वह लड़की थी जो कहती थी कि कितना अच्छा हो कि कभी दफ्तर ही नहीं जाना पड़े। घर बैठे ही काम हो जाया करे। लेकिन अब इस लड़की और उसके जैसे सैकड़ों युवाओं को इस बात की चिंता खाए जा रही है कि कहीं उन्हें भी तो अब हमेशा के लिए घर में रहकर काम नहीं करना पड़ेगा। कहां तो घर से काम करना बहुत आसान लगता था, मगर अब वही डरा रहा है।

अंदेशों की आधी दुनिया
अकसर बदली हुई दुनिया के नियम मनुष्य अपनी जीवटता के कारण अपना लेता है। उनके साथ अभ्यस्त होने की कोशिश करता है। आज दफ्तर न जाकर घर से काम करने की बातों से चाहे युवा हों, चाहे प्रौढ़, सब थरथरा रहे हैं। महिलाएं ज्यादा परेशान हो रही हैं क्योंकि कहा जा रहा है कि यह महामारी सबसे पहले उनकी नौकरी लील लेगी। नौकरी बची भी तो उसकी शर्तें क्या होंगी, कहा नहीं जा सकता। जैसे-तैसे औरतें घर से बाहर निकली थीं, लेकिन ऐसा लगता है कि कहीं दफ्तरों की बाहरी दुनिया से खदेड़कर उन्हें फिर से तो घर में बंद नहीं कर दिया जाएगा।

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