ताज़ा खबर
 

यह लहर काफी दिन पीक पर रहेगी, एकदम से न गिरेगा कोविड संक्रमण का ग्राफ

सीनियर साइंटीस्ट शाहिद जमील ने अनुमान लगाया कि कोविड से मरने वालों की असली संख्या बहुत ज्यादा, हमारी लापरवाहियों से वाइरस का नया वैरिएंट इतना कत्लोगारद मचा रहा।

नई दिल्ली | Updated: May 18, 2021 6:22 PM
तस्वीर का प्रयोग प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।(express file photo)

वरिष्ठ वाइरस वैज्ञानिक शाहिद जमील ने कहा है कि कोविड की दूसरी लहर की पीक एकदम से नीचे न गिरेगी। शिखर छूने के बाद इसका ग्राफ देर तक फ्लैट रेखा के रूप में चलेगा।

उल्लेखनीय है कि जमील कोरोना के नए-नए रूपों यानी वैरिएंट्स खोजने के लिए बने उच्च स्तरीय वैज्ञानिक सलाहकार दल के अध्यक्ष थे। उन्होंने कुछ दिन पहले सरकार की नीतियों की आलोचना की थी और सोमवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

इस्तीफा देने से कुछ दिन पहले उन्होंने एक्सप्लेंड.लाइव पोर्टल के साथ कोविड पर चर्चा की थी। इस चर्चा में उन्होंने रोगियों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि पर बात की थी और बताया था कि संख्या में कब गिरावट आ सकती है।

वार्ता के क्रम में उन्होंने माना कि कोविड संक्रमण कर्व फ्लैट होता जा रहा है। लेकिन ध्यान देने की बात है कि यह बहुत ऊंचाई पर पहुंच कर फ्लैट हुआ है। मतलब यह कि संख्या में वृद्धि थमी तो है लेकिन तब जब यह बहुत ज्यादा बढ़ चुकी थी। आगे क्या हो सकता है, यह अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी। थोड़ा देखते हैं कि पीक कब नीचे का रुख करता है। पर इतना तो साफ दिख ही रहा है कि अब अगर उठान है भी तो उसमें पहले वाली तेजी नहीं। अप्रैल में आंकड़े पांच गुना बढ़े थे। शुरुआत 80 हजार से हुई थी और ये चार लाख तक जा पहुंचे। ग्राफ में यह वृद्धि 60 डिग्री के कोण पर उठान दिखा रही है। ऐसे में हम संतोष कर सकते हैं कि अब वृद्धि नहीं हो रही है। लेकिन हमको यह नहीं भूलना है कि यह संख्या वृद्धि बहुत ऊंचाई पर जा कर थमी है। हमे अब बहुत सावधानी से चलना होगा ताकि यह ग्राफ नीचे और सिर्फ नीचे की तरफ जाए।

दूसरी लहर में हम वाइरस के ज्यादा खतरनाक वैरिएंट को खोज रहे हैं। पहली लहर वाला वाइरस तो नए वैरिएंट की तुलना में बहुत भला था। यह इसी घातक वैरिएंट का ही काम है कि संक्रमण संख्या आसमान को छू गई। लेकिन हमें यह नहीं भूलना होगा कि कोविड से मची कत्लोगारत के लिए सिर्फ यह वाइरस ही दोषी है। दरअसल, इसमें हमारी चूक शामिल है। हमने वाइरस को मनमानी करने का अवसर दे दिया। और, अवसर भी जल्दी फैलने का। वाइरस अब भी लोगों को संक्रमित करता घूम रहा है। अब भी ऐसे ढेरों लोग हैं जिन्हें यह आसानी से संक्रमित कर सकता है। यही कारण है कि पीक पर आकर ग्राफ समतल रेखा में चल रहा है। इसका यह भी मतलब है कि यह रेखा जब झुकेगी तो बहुत धीमे-धीमे, न कि उलटे वी की तरह—एकदम से झम्म। इसके नीचे उतरते-उतरते जुलाई गुजर ही नहीं अगस्त भी आ सकता है।

मृतकों की गिनती

कोरोना काल से पहले देश में मृत्यु दर 2019 में हजार में 7.3 थी। इसको प्रतिदिन होने वाली मौतों में बदलते हैं तो संख्या आती है 27,600। इस वक्त कोरोना से हर रोज औसतन 4000 मौतें हो रही हैं। 4000 की यह संख्या 27,600 का 15 प्रतिशत बैठती है। इसका अर्थ हुआ कि मौतों की संख्या में सिर्फ 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अब देखिए 15 प्रतिशत की वृद्धि इतनी छोटी है कि श्मशान और कब्रस्तान इन मौतों से सहज ही निपट सकते हैं। इतना फर्क नजर भी नहीं आएगा। लेकिन यहां तो श्मशानों और कब्रस्तानों में अंत्येष्टि के लिए लाइन लगी है। यह तभी हो सकता है जब सिस्टम चरमरा जाए। जमील कहते हैं मुझे लगता है—और यह अनुमान भर है कि जब तक घाटों-श्मशानों में शवों की आवक दुगनी न हो जाए, यह स्थिति नहीं आ सकती। इस लॉजिक को आगे बढ़ाइए तो प्रतीत होता है कि मृतकों की संख्या पांच से दस गुनी ज्यादा हो सकती है।

वरिष्ठ वैज्ञानिक ने मृतक संख्या में गड़बड़ी के कारण भी बताए हैं। कहते हैं कि सामान्य दिनों में भी अपने देश में मौतों का पंजीकरण ठीक से नहीं होता। तिस पर कोविड पाज़िटिव टेस्ट कराना भी तो आसान नहीं रह गया। उन उनका क्या जो कोविड टेस्ट के बिना ही मर गए। उसका क्या जब कोई कोविड मरीज हार्ट अटैक से मर गया। वैज्ञानिक का कहना है कि मरने वालों की संख्या कम करके बताई जा रही है। ऐसा पूरे देश में हो रहा है।

ऐसा हुआ कैसे

क्रिकेट की भाषा में कहें तो हमने अपनी निगाह गेंद पर से हटा ली थी। पिछले साल सितंबर के बाद संक्रमण घटता रहा, हम दशहरा, दिवाली और बिहार के चुनाव में मस्त रहे। नेता बोलने लगेः भारत ने कोरोना को जीत लिया है। यह बात इन नेताओं ने नहीं देखा कि यूरोप में भी जिन देशों में कोरोना खत्म हो गया था, वे भी दूसरी लहर से जूझ रहे हैं। लोग गप्पें हांकने लगे कि कोरोना हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि हम लोग तो बचपन से बीसीजी आदि कई टीके लगवा डालते हैं। मलेरिया भी झेलते हैं और ढेरों क्लोरोक्विन खा डालते हैं।

फिर हम इन बेसिरपैर की गप्पों पर विश्वास भी करने लगे। शादियों का मौसम आया। जमकर धूम मचने लगी। स्थानीय निकाय के चुनाव आए, राज्यों के चुनावा आए—हम सब कराते चले गए। कुंभ आया तो वह भी करा डाला।

इस सबके बीच कोरोना ने नया वैरिएंट बना डाला था। वह लोगों के बीच घूम रहा था। हालांकि इस वैरिएंट की जानकारी दिसंबर में हुई थी लेकिन उसकी मौजूदगी इतने निम्न स्तर पर थी कि ध्यान ही नहीं दिया गया। इसी बेध्यानी का नतीजा सबके सामने है।

Next Stories
1 देखिए, तूफान के बीच पेड़ के नीचे आने से कैसे बाल-बाल बची महिला, सेकंड भर की देर होती तो..
2 कोरोना से लड़ते हुए भी लोगों की जान बचा रहे थे डॉ.केके अग्रवाल, ‘जुगाड़ू OPD’ का कॉन्सेप्ट दे बोले थे- द शो मस्ट गो ऑन…
3 हमारे यहां सब काबू में है- CM योगी ने ठोंका था दावा; HC ने कहा- UP के छोटे शहरों में “राम भरोसे” है मेडिकल सिस्टम
ये  पढ़ा क्या?
X