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दस में से नौ प्रवासी मजदूरों का पैसा कंपनियों में फंसा, भुगतान का कर रहे इंतजार, एक-एक का 1.35 लाख रुपये तक है बकाया!

अनिल ने कहा, "अब बहुत राहत है। यह मुझे कुछ समय के लिए अनिश्चितता को दूर करने में मदद करेगा। मैं इन पैसों से राशन खरीदूंगा, अपने बच्चों की शिक्षा के लिए भुगतान करूंगा और भविष्य के लिए बचत भी करूंगा।"

Author Translated By प्रमोद प्रवीण नई दिल्ली | Updated: May 30, 2020 10:04 AM
लॉकडाउन के कठिन समय में उनके लिए यह राशि वरदान से कम नहीं है। (indian express file)

बेंगलुरु की एक कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने वाले झारखंड के डाल्टेनगंज निवासी अनिल गुप्ता (32) ने राहत की सांस ली है क्योंकि उसके सब कॉन्ट्रैक्टर ने दो महीने की बकाया राशि 40,000 रुपये का भुगतान कर दिया है। इसके लिए अनिल गुप्ता और उसके अन्य साथियों ने विरोध-प्रदर्शन किया तो कंपनी ने उन्हें धमकी दी। बाद में ये लोग अधिकारियों के पास शिकायत लेकर पहुंच गए। अंतत: अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद उन्हें बकाया राशि मिल गई। लॉकडाउन के कठिन समय में उनके लिए यह राशि वरदान से कम नहीं है।

इंडियन एक्सप्रेस से फोन पर बातचीत में अनिल ने कहा, “अब बहुत राहत है। यह मुझे कुछ समय के लिए अनिश्चितता को दूर करने में मदद करेगा। मैं इन पैसों से राशन खरीदूंगा, अपने बच्चों की शिक्षा के लिए भुगतान करूंगा और भविष्य के लिए बचत भी करूंगा।” गुप्ता लॉकडाउन खत्म होने के बाद फिर से बेंगलुरू जाने की सोच रहे हैं। हालांकि, बकाया राशि मिलने के मामले में अनिल गुप्ता भाग्यशाली हैं क्योंकि इंडियन एक्सप्रेस ने दस ऐसे प्रवासी श्रमिकों से बातचीत की जो दूसरे प्रदेशों में काम करते थे लेकिन उनमें से 9 को कोई बकाया राशि का भुगतान नहीं हो सका है। दस में से नौ लोगों को अभी भी बकाया राशि का इंतजार है।

रुस्तम अली और दो अन्य लोग जो क्रमशः ड्राइवर और क्लीनर के रूप में बेंगलुरु में एक ही निर्माण स्थल पर काम करते थे, 1.35 लाख रुपये तक के बकाए का इंतजार कर रहे हैं। अली ने दरभंगा, बिहार वापस आने के लिए कर्ज लिया, और फिलहाल दरभंगा में एक क्वारंटीन सेंटर पर आइसोलेशन में है। फोन पर उसने बताया, “मेरा भाई तमिलनाडु में काम करता है। उसने 3000 रुपये भेजे हैं। इसी से फिलहाल हमारे परिवार का राशन और गुजर बसर चल रहा है।”

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20 साल के पिंकेश यादव की भी यही कहानी है। वह गुजरात की एक धागा मिल में काम करता था लेकिन पिछले 42 दिनों से उसका वेतन बकाया है। जब उसने बकाया भुगतान का दबाव बनाया तो कंपनी ने उससे नाता तोड़ लिया। यादव समेत अन्य नौ कर्मचारियों से उस कंपनी ने कागज पर लिखवा लिया, “हम सब अपनी मर्जी से छोड़ के जा रहे हैं, अगर हमें कुछ परेशानी होती है, उसके जिम्मेदार खुद हैं और कंपनी मैनेजमेंट की जिम्मेदारी नहीं होगी।”

प्रवासी मजदूर संकट की बात करने वाले स्ट्रैंडेड वर्कर्स एक्शन नेटवर्क के पास उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 25,345 प्रवासी मजदूरों में से 83.3 प्रतिशत लोग लॉकडाउन के दौरान भुगतान प्राप्त नहीं कर पाए।

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