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कोविड-19 और सुरक्षात्मक एहतियात: खौफ से न घिर जाए बचपन

कराटे, संगीत या नाटक की आनलाइन कक्षाओं में सक्रिय रहने वाला बच्चा गणित और विज्ञान की कक्षाओं में रुचि नहीं ले पा रहा है। इन विषयों को ठीक से समझने के लिए शिक्षकों का भौतिक रूप से सामने होना जरूरी होता है। लेकिन अभी कुछ समय के लिए ऐसा संभव नहीं है। इसलिए बच्चों पर इसे लेकर किसी तरह का दबाव नहीं बनाना ही ठीक है। हां जो अभिभावक अपने बच्चों को समय देकर मदद कर सकते हैं उन्हें जरूर करना चाहिए।

बच्चों के कोमल मस्तिष्क में कोरोना का भय गहरा आघात कर रहा है। उन्हें इससे बचाने की जरूरत है।

सविता का पांच साल का बच्चा मध्य मार्च से स्कूल नहीं गया है। बीते पांच महीने से वह घर के अंदर कैद है। सविता को लगा कि अब उसे अपने बच्चे को थोड़ा बाहर निकालना चाहिए। लेकिन जैसे ही वो बच्चे को लेकर बाहर जाने लगी वो जोर-जोर से रोने लगा कि मैं बाहर नहीं जाऊंगा, कोरोना मुझे मार देगा। घर से बाहर निकलने को लेकर बच्चे का यह डर सविता के लिए खासी चिंता का विषय बन गया। उसने उम्मीद नहीं की थी कि शुरुआती दौर में बच्चे को बाहर निकलने के लिए वो उसके मन में जैसा डर बिठाती थी, वह बच्चे के दिमाग को इतना ज्यादा प्रभावित करेगा।

बीमारी को न बताएं राक्षस
दुनिया भर के बाल मनोवैज्ञानिकों ने इस बात पर चिंता जताई है कि ज्यादातर घरों में बच्चों को इस बीमारी को लेकर ठीक से प्रशिक्षित नहीं किया। बच्चों को बाहर जाने से रोकने के लिए कोरोना को भूत बताना और तुम्हें खा जाएगा जैसे अवैज्ञानिक तरीकों ने उनके दिमाग पर विपरीत असर डाला। टीवी पर भी कोरोना के राक्षसरूपी चित्रण ने बच्चों को और असमंजस में डाल दिया। टीवी पर चल रहे मृत्यु के आंकड़े और अन्य तरह के विपरित माहौल ने उन्हें इस बात को लेकर भी डरा दिया कि कहीं उनके मम्मी-पापा, नाना-नानी, दादा-दादी भी कोरोना के कारण मर तो नहीं जाएंगे और वो अकेले तो नहीं रह जाएंगे।

सावधानी न हो डरावनी
कोरोना एक ऐसी बीमारी बन गया कि जितनी मुंह उतनी बातें। इस नए विषाणु के बारे में जब डॉक्टर या वैज्ञानिकों को ही सही तरीके से नहीं पता तो टीवी पर दी जानेवाली सलाह और घर-परिवार के अपने-अपने नीम हकीम खतरे जान वाली हालत ने बच्चों के मामले में बहुत नुकसान किया है।

अब जो गलतियां हमसे हो चुकी हैं उसकी भरपाई तो हो नहीं सकती लेकिन अभी रास्ता काफी लंबा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस बात की चेतावनी दे चुका है कि कम से कम दो साल तक हमें कोरोना से बचने के लिए सुरक्षात्मक उपाय अपनाते रहने होंगे। ऐसे में अब हमें आगे के लिए बच्चों को वैज्ञानिक नजरिए से तैयार करना होगा। क्रेच और स्कूल तो अभी बंद हैं लेकिन ज्यादातर अभिभावकों के दफ्तर खुल चुके हैं। अभी तक हुए काम-काज के नुकसान की भरपाई के लिए बड़ों पर काम का बोझ बढ़ चुका है तो बच्चों का और अकेले पड़ जाना तय है।

बालमन को समझें
पांच महीने से टीवी और वीडियो गेम पर ही निर्भर होकर बच्चे ऊब चुके हैं। उस पर छोटे बच्चों की आनलाइन कक्षाओं ने उनके दिमाग को और बोझिल बना दिया है। ज्यादातर शिक्षकों से लेकर अभिभावकों तक की शिकायत है कि स्क्रीन की पढ़ाई पर बच्चा ध्यान नहीं दे पाता है और उसके मानसिक भटकाव को रोकना बहुत मुश्किल हो जाता है।

कराटे, संगीत या नाटक की आनलाइन कक्षाओं में सक्रिय रहने वाला बच्चा गणित और विज्ञान की कक्षाओं में रुचि नहीं ले पा रहा है। इन विषयों को ठीक से समझने के लिए शिक्षकों का भौतिक रूप से सामने होना जरूरी होता है। लेकिन अभी कुछ समय के लिए ऐसा संभव नहीं है। इसलिए बच्चों पर इसे लेकर किसी तरह का दबाव नहीं बनाना ही ठीक है। हां जो अभिभावक अपने बच्चों को समय देकर मदद कर सकते हैं उन्हें जरूर करना चाहिए।

तैयारी में ही समझदारी
’बच्चे अभी खेल के मैदान से दूर हैं तो घर में उनके लिए इस तरह के खेल के इंतजाम किए जाएं कि उनकी शारीरिक सक्रियता बढ़े। लेकिन ज्यादातर लोगों के घरों में इतनी जगह भी नहीं होती। ये वक्त शारीरिक दूरी का है मानसिक दूरी का नहीं।

मोहल्लों, हाउसिंग सोसायटियों में रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन इस बात को लेकर रणनीति बनाएं कि किस तरह शारीरिक दूरी और अन्य रक्षात्मक उपायों को अपनाते हुए बच्चों के लिए घर से बाहर सक्रिय होने का इंतजाम किया जाए।
बच्चों की सेहत को लेकर अभिभावकों की फिक्र को समझा जा सकता है लेकिन वे इसे बालमन के खौफ में न बदलने दें। हर बच्चे की अपनी खास जरूरत होती है और उसकी परेशानियां दूसरों से अलग होती है।
अभिभावक बाल मनोवैज्ञानिकों के संपर्क में रहें ताकि हर बच्चे को उसकी जरूरत के हिसाब से समाधान मिल सके। ल्ल
(यह लेख सिर्फ सामान्य जानकारी और जागरूकता के लिए है। उपचार या स्वास्थ्य संबंधी सलाह के लिए विशेषज्ञ की मदद लें)

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