नौकरियों का टोटा: लॉकडाउन के 5 महीने में 83 लाख लोग बने मनरेगा मजदूर, एक साल में 36% की बढ़ोत्तरी, टूटा सात साल का रिकॉर्ड

कोरोना काल में मनरेगा प्रवासी मजदूरों के लिए वरदान साबित हुआ है। चालू वित्त वर्ष के पहले पांच महीनों के दौरान इस योजना के तहत 83 लाख से अधिक नए परिवारों को जॉब कार्ड जारी किए गए हैं।

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कोरोना काल में मनरेगा प्रवासी मजदूरों के लिए वरदान साबित हुआ है। (File Photo)

कोरोना संकट के चलते देश की अर्थव्यवस्था खस्ता हो चुकी है। जिसके चलते बेरोजगारी बहुत तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में कोरोना काल में मनरेगा प्रवासी मजदूरों के लिए वरदान साबित हुआ है। चालू वित्त वर्ष के पहले पांच महीनों के दौरान इस योजना के तहत 83 लाख से अधिक नए परिवारों को जॉब कार्ड जारी किए गए हैं। गौरतलब है कि 1 अप्रैल से 3 सितंबर के बीच जो संख्या सामने आई है यह पिछले सात वर्षों के वार्षिक वृद्धि से अधिक है

पूरे 2019-20 वर्ष में 64.70 लाख नए जॉब कार्ड जारी किए गए थे। यह उसमें 28.32 प्रतिशत की छलांग है। नए जॉब कार्डों में तेज वृद्धि तब आई जब कोरोना के चलते पूर्व देश में लॉकडाउन लागू कर दिया गया और प्रवासी मजदूरों को मजबूर होकर बड़ी संख्या में अपने गांव लौटना पड़ा। 83.02 लाख नए जॉब कार्ड में से सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में 21.09 लाख, उसके बाद बिहार में 11.22 लाख, पश्चिम बंगाल में 6.82 लाख, राजस्थान में 6.58 लाख और मध्य प्रदेश में 5.56 लाख लोग शामिल हुए हैं। इसमें बड़ी संख्या में अपने गांव लौटने वाले प्रवासी मजदूर शामिल हैं।

मनरेगा के तहत, प्रत्येक ग्रामीण परिवार एक जॉब कार्ड का हकदार होता है, जिसमें घर के सभी वयस्क सदस्यों के नाम और फोटो होते हैं जो काम कर सकते हैं। मनरेगा के नियमों के अनुसार, अगर किसी घर के लोग स्थायी रूप से शहरी क्षेत्रों में चले गए हैं या किसी और ग्राम पंचायत में चले गए हैं तो उनका जॉब कार्ड रद्द किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में जॉब कार्ड डुप्लिकेट मान लिया जाएगा और जाली दस्तावेजों के आधार पर पंजीकृत समझ लिया जाएगा।

डेटा से पता चलता है कि इस वित्तीय वर्ष में अब तक 10.39 लाख नरेगा जॉब कार्ड रद्द किए गए हैं। वहीं साल 2019-20 में 13.97 लाख कार्ड रद्द किए गए थे। 3 सितंबर, 2020 तक देश में जॉब कार्डों की संचयी संख्या 14.36 करोड़ है।

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