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तीन तलाक के खिलाफ खड़ी हुर्इं मुस्लिम महिलाएं, ‘महिला विरोधी’ प्रथा बता कोर्ट से की रोक लगाने की मांग

इस महीने के अंत में कानून मंत्रालय सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर अपना जवाब दाखिल करेगा।
Author नई दिल्ली | September 26, 2016 05:41 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है। (पीटीआई फाइल फोटो)

केंद्र सरकार की ओर से तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सख्त रुख अपनाने की संभावना के बीच देश की कुछ प्रमुख मुसलिम महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने रविवार को कहा कि सरकार को देश की सबसे बड़ी अदालत में इस ‘महिला विरोधी’ प्रथा का विरोध करना चाहिए और इस पर रोक सुनिश्चित कराना चाहिए। सरकार के सूत्रों के हवाले से खबर आई है कि सरकार अदालत में यह पक्ष रखेगी कि एक साथ तीन तलाक को शरीयत के तहत अपरिहार्य और अपरिवर्तनीय बताना ‘पूरी तरह गलत’ है और यह ‘अनुचित, अतार्किक और भेदभावपूर्ण है’ क्योंकि दुनिया के कई मुसलिम देशों में शादी के कानून को लेकर नियमन की व्यवस्था है। इस महीने के अंत में कानून मंत्रालय सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर अपना जवाब दाखिल करेगा।

‘भारतीय मुसलिम महिला आंदोलन’ की सह-संस्थापक नूरजहां सफिया नियाज ने कहा, ‘आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड को खुद तीन तलाक की व्यवस्था को खत्म करने के लिए प्रयास करना चाहिए था, पर उसने ऐसा नहीं किया। अब सरकार को इस बारे में सख्त रुख अपनाना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट में मुसलिम महिलाओं के अधिकार की बात करनी चाहिए।’सामाजिक कार्यकर्ता और स्तंभकार नाइश हसन का कहना है, ‘शाह बानो मामले के समय ही पर्सनल लॉ बोर्ड को एक साथ तीन तलाक के मसले पर सोचना चाहिए था। ये लोग जो उस समय कर रहे थे, वही बात अब कर रहे हैं। ये मुसलिम महिलाओं को उनका हक नहीं देना चाहते।’

नाइश हसन ने कहा, ‘अब सरकार अगर एक साथ तीन तलाक की व्यवस्था के खिलाफ कोई कदम उठाने जा रही है तो हम इसका स्वागत करते हैं। हमारी मांग है कि सरकार मुसलिम महिलाओं के अधिकार के पक्ष में रूख अपनाए।’ मुसलिम और दलित महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए काम करने वाले संगठन ‘तहरीक-ए-निसवां’ की अध्यक्ष ताहिरा हसन का कहना है कि एक साथ तीन तलाक की व्यवस्था महिला विरोधी है और सरकार को इस पर रोक के लिए प्रयास करने चाहिए। ताहिरा ने कहा, ‘मेरी समझ में यह नहीं आता कि पर्सनल लॉ बोर्ड में बैठे मौलाना लोग एक साथ तीन तलाक की पैरवी क्यों कर रहे हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश और कई मुसलिम देशों में इस पर रोक लग चुकी है। इस महिला विरोधी व्यवस्था का खत्म होना जरूरी है।’

सूत्रों के अनुसार केंद्र की यह भी सोच है कि इस मुद्दे को समान नागरिक संहिता के चश्मे से नहीं देखा जाए, बल्कि इसे लैंगिक न्याय और महिलाओं की बुनियादी स्वतंत्रता के मुद्दे के तौर पर देखा जाना चाहिए। गृहमंत्री राजनाथ सिंह, वित्तमंत्री अरुण जेटली, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर और महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने पिछले हफ्ते बैठक की थी और एक साथ तीन तलाक कहने (तलाक-ए-बिदअत) पर सुप्रीम कोर्ट में सरकार के संभावित रुख पर चर्चा की थी। इन मंत्रियों ने बहुपत्नी प्रथा और ‘निकाह हलाला’ पर भी चर्चा की थी। निकाह हलाला में तलाक के बाद अगर महिला और पुरुष को फिर से आपस में शादी करनी हो तो उसके लिए जरूरी होता है कि महिला किसी अन्य से शादी करे और उसके बाद फिर नए शौहर को तलाक दे कर पूर्व पति से शादी करे।

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  1. K
    ks
    Oct 9, 2016 at 9:15 am
    جہاں بھی اسلام terriost وہاں موجود ہے. whrere اسلام میں مسئلہ ہے یا اسلام کو ایک مسئلہ پرامن ذہن میں سوچنا ہے
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    1. R
      Rashid Saleem
      Oct 9, 2016 at 8:52 am
      اسلام مذہب دنیا کے تمام مذاہب میں سب سے اعلی ہے اور قرآنِ اور حدیث میں جو قوانین دیۓ گئے ہیں اس پر عمل کرنے سے ایک اچھا اور عمدہ معاشرے کاقیام عمل میں آتا ہے اگر معاشرے میں اس پر عمل نہیں ہو رہا ہے اور سرکار مسلمانوں سے ہمدردی رکھتی ہے تو اس کے لیے قانون بنانے کے بجاۓ اسلامی قانون کو یعنی قرآنِ اور حدیث کو پڑھنے اور اس کو سمجھانے کے مواقع فراہم کرانے چاہیے نہ کہ ایک خراب قانون بنا کر جس سے لاکھوں ہندو پہلے ہی پریشان ہیں اور وہ اسلامی قانون کو اچھا بتاتے ہیں سب کے لیے اسلامی قانون نافذ ہو
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