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SC को केंद्र की नसीहत, कहा- आपके आदेश संसद कर सकती है खारिज

अभी एक दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से कहा था कि मानवाधिकारों के उल्लंघन को अदालत चुपचाप नहीं देख सकती।

केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में कहा-सुप्रीम कोर्ट जितने आदेश चाहे पास कर सकती है लेकिन संसद उनको उलटने का अधिकार रखती है

सरकार ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट जितने आदेश चाहे कर सकती है लेकिन संसद को उन निर्णयों को उलटने का अधिकार है। सरकार की यह बात एटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने गुरुवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान कही। इस मामले में मद्रास बार एसोसिएशन ने ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स (रेशनलाइज़ेशन्स एण्ड कन्डीशन्स ऑफ सर्विस) ऑर्डनेंस 2021 की धारा 12 और 13 तथा फाइनेंस एक्ट 2017 की धारा 184 व 186 (2) को चुनौती दी है।

सुनवाई के दौरान विवाद का एक बड़ा बिंदु यह रहा कि अगर फाइनेंस एक्ट की धारा 184 (11) को किसी मामले पर रिट्रोस्पेक्टिव रूप (बैक डेट से) लागू किया जाए तो क्या ऐसा करना सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का उल्लंघन होगा। इस पर जस्टिस हेमंत गुप्ता ने केंद्र सरकार से कहाः अगर आप कानून पास कर रहे हैं तो उससे क्या इस अदालत के निर्णय अमान्य नहीं हो जाते? इस पर एटॉर्नी जनरल ने कहा, हुजूर मुझे आपको यह बताते हुए खेद हो रहा है लेकिन आप चाहे जितने आदेश पास कर लें, लेकिन संसद कह सकती है कि आपके निर्णय देश हित में नहीं और वह तदनुसार कानून बना सकती है।

इस पर जस्टिस रवीन्द्र भट्ट ने कहा कि इसके बावजूद संसद यह नहीं तय कर सकती कि अदालत द्वार पास किया गया किस आदेश को लागू करना है और किसे नहीं। ..अगर आप यह कह रहे हैं कि हम किसी कानून को रद्द नहीं कर सकते तब तो यह मारबरी से पहले वाले काल में जाना हो जाएगा। हम कभी किसी कानून को सीमित कर देते हैं, या उसे सही ठहराते हैं या फिर उसे रद्द ही कर देते हैं। हर शाखा संविधान की व्याख्या करने का काम कर रही है। अगर अदालत कहती है कि कोई कानून संविधान सम्मत नहीं है तो फिर वह संविधान सम्मत नहीं है।

बहस के बीच जस्टिस एल नागेश्वर राव ने भी अपने साथियों के जैसी ही चिंताएं जताईं और कहा कि अगर केंद्र सरकार कोई मुकदमा हारती है तो वह कानून पास करने का विषय नहीं हो सकता।

उल्लेखनीय है कि यह लगातार दूसरा दिन है जब केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट आमने-सामने खड़े हैं। अभी कल ही कोविड वैक्सीन मामले की सुओ मोटो सुनवाई करते हुए केंद्र पर एक गंभीर टिप्पणी की थी कि अगर मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा होगा तो अदालत चुपचाप नहीं देखती रह सकती। संविधान में ऐसा सोचा ही नहीं गया। सुप्रीम कोर्ट का यह बयान केंद्र सरकार के उस बयान से जोड़ कर देखा जा रहा है जब कुछ दिन पहले उसने कहा था कि न्यायपालिका को खुद को अधिशासी (एक्जीक्यूटिव) निर्णयों से दूर रहना चाहिए।

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